#✋भगवान भैरव🌸
🔥 अहंकार का पतन: जब हनुमान जी ने पहचानी रावण की 'असली' बीमारी! 🚩
परम ज्ञानी हनुमान जी ने लंकापति रावण की असली बीमारी (अहंकार) पहचान ली थी और उसे उचित उपचार भी बताया था—
"मोह मूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान!"
अभिमान से नाता रखना यानी किसी मधुमेह (Diabetes) के रोगी का रसगुल्ले से प्रेम करना! परंतु रावण ने इस अनमोल सीख का उपहास उड़ाते हुए कहा— "मिला हमहिं कपि गुर बड़ ग्यानी!"
दृष्टि का भेद: अभिमान बनाम भक्ति
अहंकार के मद में चूर होकर जो रावण स्वयं को 'ज्ञानीनाम् अग्रगण्यं, बुद्धिमताम् वरिष्ठं' मानता था, वह भगवान को पहचान न सका, लेकिन राक्षसों ने पहचान लिया: "साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।"
रावण ने अभिमान वश प्रभु को साधारण मनुष्य समझा— "अग जग नाथ मनुज करि जाना।"
वहीं दूसरी ओर, जिनके कोमल चरण कमलों को देखते ही हनुमान जी पहचान गए थे:
"कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहुँ बन स्वामी?
जग कारन तारन भव भंजन धरनि भार। कि तुम अखिल भुवन पति, लीन्ह मनुज अवतार!"
रावण का खोखला भ्रम
रावण ठहाके मारकर प्रभु श्रीराम का उपहास करता था— "लघु तापस कर बाग बिलासा!"
मुझ त्रैलोक्य विजयी पर एक तपस्वी के विजय की कामना करना ऐसा है, जैसे— "भूमि गिरा कर गहत अकासा!" (यानी पृथ्वी पर गिरे हुए का आकाश को हाथ में पकड़ने की कामना करना)।
अहंकार रूपी मोतियाबिंद हो जाए, तो श्रीराम के चरणारविंद कैसे दिख सकते हैं? भगवान शिव, माता पार्वती से रावण के इसी भ्रम का वर्णन करते हुए कहते हैं:
"उमा रावनहिं अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सुत उताना।"
(जैसे टिटहरी पक्षी को लगता है कि वह अपने पैरों से गिरते हुए आकाश को रोक लेगी!)
अहंकार का भयानक परिणाम
जिसके चलने से पृथ्वी कांप उठती थी— "चलत दसानन डोलति अवनी।"
वही बलशाली शरीर एक दिन अनाथ बनकर धूल फांक रहा था। महारानी मंदोदरी रावण के मृत शरीर को देखकर विलाप करते हुए कहती हैं:
"तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।।
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।"
जिस रावण को यह तक ज्ञात नहीं था कि उसके कितने पुत्र और पौत्र हैं, आज उसकी यह दुर्गति हुई कि— "रहा न कोउ कुल रोवनिहारा!"
रावण बनाम जटायु: एक महान सीख
रावण को अपने तामसी देह का अभिमान था। लेकिन जरा सोचिए! माता सीता के हरण का विरोध करने वाला जटायु कौन सा सात्विक भोजन करता था?
"गीध अधम खग आमिष भोगी!"
मरे हुए प्राणी को आहार बनाने वाले जटायु ने स्वाभिमान और परोपकार को सब कुछ माना। और दूसरी ओर, एक उत्तम कोटि के ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी रावण ने "तिय हरन" जैसा नीच अपराध किया।
परिणाम देखिए— उस अधम शरीर वाले जटायु की अंतिम क्रिया स्वयं भगवान श्रीराम ने अपने हाथों से की: "तेहि की क्रिया जथोचित निज कर किन्हीं राम!"
अनंत योगियों को रमाने वाले राम ने एक गीध को अपनाया, और त्रैलोक्य विजयी रावण अनाथ बनकर धूल में मिल गया।
सार:
अभिमान को सिर पर लेकर आप आगे तो बढ़ सकते हैं, लेकिन उसे सिर पर लिए वापस नहीं लौट सकते! इसलिए, अपने मन से अहंकार को उतार फेंकिए और हनुमान जी की बात मानिए:
✨ "भजहु राम! भजहु रघुनायक!" ✨
क्योंकि वही तो हैं— "कृपासिंधु भगवान!"
🙏 जय श्री राम! 🙏
🙏 जय श्री सीताराम! 🙏
🙏 जय श्री रामभक्त हनुमान! 🙏
. ॥ सियापति रामचंद्र की जय ॥
॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🙏👇
. 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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