*ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय*
भगवान विष्णु दया के सागर हैं, वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु सतत प्रयत्नशील रहते हैं, उनकी रूप-माधुरी और वैभव अपार है।
भगवान विष्णु के वक्षःस्थल के दक्षिण भाग में श्रीवत्स अर्थात भृगु-पद का चिन्ह सुशोभित है। वे घनश्याम हैं तथा समस्त प्रपञ्च में अपनी अतर्क्य-शक्ति के प्रभाव से व्याप्त हैं।
गले में वे आजानुलम्बिनी वनमाला धारण किये हुए हैं, जिसमें समस्त ऋतुओं के सुन्दर सुगन्धित पुष्प ग्रथित हैं और मध्य में कदम्ब-कुसुम भी लगा हुआ है।
उनकी चार भुजाएं हैं और वे अपने चारों करकमलों में क्रमशः पाञ्चजन्य शङ्ख, सुदर्शनचक, कौमोदकी गदा और एक लीला-पद्म धारण किये हुए हैं। उनके मस्तक के ऊपर किरीट-मुकुट के रत्नों की किरणावली छिटक रही है। कानों में उनके मकराकृति कुण्डल चमक रहे हैं। बाहुओं में केयूर और मणिबन्धों (कलाइयों) में रत्न-खचित कंकण विराज रहे हैं। ग्रीवा पद्मराग-मणिमय कौतुभ-नामक रत्न की भी शोभा को बढ़ा रही है। कोमल मञ्जुल पीताम्बर धारण किये हुए हैं, उत्तरीय भी पीताम्बर का ही है। कटितट पर कलित काञ्ची की छटा अतिशय कमनीय है।
चरण-कमलों में सुवर्णमय मणिजटित नूपुर मुखरित हो रहे हैं। कहाँ तक कहें, त्रिलोकी में जितने भी दर्शनीय हैं, उन सबसे अधिक आकर्षक हैं वे। इतना आकर्षक होने पर भी उनमें बड़ी शान्ति है।
अतएव उन्हें एक बार देख लेने पर दर्शक के मन और नयनों में पुनः-पुनः उनका दर्शन करने की प्यास-सी बनी रहती है।
जो उनकी आराधन करते हैं, विष्णु भगवान उनके हृदयकमल की कर्णिका पर अपनी नखमणियों से सुशोभित चरण-कमलों की स्थापना करके स्वयं भी उनके अन्तःकरण में निवास करने लगते हैं। वे जब कृपा करके भक्त की ओर निहारते हैं, तब उनके अधर पर स्मित और नयनों में अनुराग भरा रहता है।
सदैव अपने भक्तों का सर्वार्थसिद्धि करने वाले हे श्रीहरि मैं आपका वंदन, नमन व पूजन करता हूँ।
प्रभू मैं आपकी शरण हूँ और आपने
गीता में स्वयं कहा भी है, *"जो मेरी शरण में आते हैं, वे भवसागर पार कर लेते हैं, क्योंकि जिस प्रकार किसी अबोध बच्चे की सारी जवाबदारी उसकी माता वहन करती है। उसी प्रकार मन और बुद्धि से जब भक्त भगवान के शरण में जाता है, तब उसकी सारी जिम्मेदारी वे खुद उठाते हैं।"*
जिस प्रकार इंद्र की लाख कृपा के बाद भी उल्टे घड़े में एक बूंद भी पानी नहीं जा सकता है, उसी प्रकार मन, बुद्धि से भोग करने वालों को भगवान का अनुराग नहीं मिल सकता।
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#श्री हरि विष्णु