sn vyas
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25 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्य द्वारा राजकुमारों की शिक्षा, एकलव्य की गुरुभक्ति तथा आचार्य द्वारा शिष्यों की परीक्षा...(दिन 395) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत् परमं तदा । प्रेक्ष्य तं ब्रीडिताश्चासन् प्रशशंसुश्च सर्वशः ।। ४२ ।। वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे ।। ४२ ।। तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम्। ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ।। ४३ ।। राजन् ! तत्पश्चात् पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा ।। ४३ ।। न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् । अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान् कस्य वेत्युत ।। ४४ ।। उस समय उसका रूप बदल गया था। पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे - 'तुम कौन हो, किसके पुत्र हो?' ।। ४४ ।। एकलव्य उवाच निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् । द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ।। ४५ ।। एकलव्यने कहा-वीरो! आपलोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र तथा द्रोणाचार्यका शिष्य जानें। मैंने धनुर्वेदमें विशेष परिश्रम किया है ।। ४५ ।। वैशम्पायन उवाच ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः । यथावृत्तं वने सर्व द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ।। ४६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! वे पाण्डवलोग उस निषादका यथार्थ परिचय पाकर लौट आये और वनमें जो अद्भुत घटना घटी थी, वह सब उन्होंने द्रोणाचार्यसे कह सुनायी ।। ४६ ।। कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् । रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ।। ४७ ।। जनमेजय ! कुन्तीनन्दन अर्जुन बार-बार एकलव्यका स्मरण करते हुए एकान्तमें द्रोणसे मिलकर प्रेमपूर्वक यों बोले ।। ४७ ।। अर्जुन उवाच तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः । भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ।। ४८ ।। अर्जुनने कहा-आचार्य ! उस दिन तो आपने मुझ अकेलेको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा ।। ४८ ।। अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् । अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ।। ४९ ।। फिर आपका यह अन्य शिष्य निषादराजका पुत्र अस्त्र-विद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल और सम्पूर्ण लोकसे भी अधिक पराक्रमी कैसे हुआ? ।। ४९ ।। वैशम्पायन उवाच मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम्। सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान् ।। ५० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! आचार्य द्रोण उस निषादपुत्रके विषयमें दो घड़ीतक मानो कुछ सोचते-विचारते रहे; फिर कुछ निश्चय करके वे सव्यसाची अर्जुनको साथ ले उसके पास गये ।। ५० ।। ददर्श मलदिग्धाङ्ग जटिलं चीरवाससम् । एकलव्यं धनुष्याणिमस्यन्तमनिशं शरान् ।। ५१ ।। वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था। उसके शरीरपर मैल जम गया था। उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे ।। ५१ ।। एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् । अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ।। ५२ ।। इधर एकलव्यने आचार्य द्रोणको समीप आते देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और उनके दोनों चरण पकड़कर पृथ्वीपर माथा टेक दिया ।। ५२ ।। पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत् स निषादजः । निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ।। ५३ ।। फिर उस निषादकुमारने अपनेको शिष्यरूपसे उनके चरणोंमें समर्पित करके गुरु द्रोणकी विधिपूर्वक पूजा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया ।। ५३ ।। ततो द्रोणोऽब्रवीद् राजन्नेकलव्यमिदं वचः । यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम ।। ५४ ।। एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् । राजन् ! तब द्रोणाचार्यने एकलव्यसे यह बात कही- 'वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो'। यह सुनकर एकलव्य बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला ।। ५४३ ।। एकलव्य उवाच किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः ।। ५५ ।। न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम । एकलव्यने कहा- भगवन्! मैं आपको क्या दूँ? स्वयं गुरुदेव ही मुझे इसके लिये आज्ञा दें। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो गुरुके लिये अदेय हो ।। ५५३ ।। वैशम्पायन उवाच तमब्रवीत् त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति ।। ५६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब द्रोणाचार्यने उससे कहा- 'तुम मुझे दाहिने हाथका अँगूठा दे दो' ।। ५६ ।। एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् । प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्ये च नियतः सदा ।। ५७ ।। तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः । छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद् द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः ।। ५८ ।। द्रोणाचार्य का यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया ।। ५७-५८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️