Govind Hashani
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5 days ago
डॉ. अनन्या सरकार द्वारा आपको दो-तीन दिन बुखार आया था। अगर आपने दवा नहीं भी ली होती, तो भी शरीर खुद ही ठीक हो जाता। लेकिन आप डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने शुरुआत में ही कई जांचें लिख दीं। जांचों में बुखार का कोई ठोस कारण नहीं मिला। लेकिन थोड़ा बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर दिखा — जो सामान्य लोगों में भी हो सकता है। बुखार तो उतर गया, लेकिन अब आप सिर्फ बुखार के मरीज नहीं रहे। डॉक्टर ने कहा: "आपका कोलेस्ट्रॉल ज्यादा है। शुगर भी थोड़ी बढ़ी हुई है। मतलब आप प्री-डायबिटिक हैं। इसके लिए दवाइयाँ लेनी होंगी।" इसके साथ ही खान-पान पर भी पाबंदियां लगा दी गईं। शायद आपने उन्हें पूरी तरह नहीं माना — लेकिन दवाइयाँ लेना नहीं भूले। तीन महीने बाद फिर जांच हुई। कोलेस्ट्रॉल थोड़ा कम हुआ, लेकिन अब ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ मिला। एक और दवा जोड़ दी गई। अब आप तीन दवाइयाँ लेने लगे। यह सुनकर आपकी चिंता बढ़ गई। "आगे क्या होगा?" इस चिंता से नींद उड़ गई। डॉक्टर ने नींद की गोली भी दे दी — अब दवाइयाँ हो गईं चार। सभी दवाइयाँ लेने से एसिडिटी और अपच शुरू हो गया। डॉक्टर बोले: "खाने से पहले खाली पेट एसिडिटी की गोली लें।" अब दवाइयाँ हो गईं पाँच। छह महीने बाद एक दिन छाती में दर्द हुआ और आप अस्पताल पहुंचे। पूरी जांच के बाद डॉक्टर ने कहा: "आप समय पर आ गए, नहीं तो बड़ी समस्या हो सकती थी।" फिर कई महंगी जांचें करवाई गईं। और कहा गया: "अभी की दवाइयाँ जारी रखें। लेकिन दिल के लिए दो और दवाइयाँ लें। और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट को भी दिखाएं।" अब दवाइयाँ हो गईं सात। दिल के डॉक्टर के कहने पर आप एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के पास गए। उन्होंने डायबिटीज के लिए एक और और थायरॉइड के लिए एक और दवा लिख दी। अब कुल दवाइयाँ हो गईं नौ। धीरे-धीरे आपको लगने लगा कि आप गंभीर मरीज हैं: • दिल के मरीज • डायबिटीज • नींद की समस्या • अपच • थायरॉइड • किडनी ... और यह सूची बढ़ती गई। किसी ने आपको यह नहीं बताया कि आप अपनी सेहत को मन की शक्ति, आत्मविश्वास और जीवनशैली में बदलाव से सुधार सकते हैं। लेकिन आपको बार-बार यह बताया गया कि आप कमजोर और बीमार हैं। छह महीने बाद दवाइयों के साइड इफेक्ट से पेशाब संबंधी समस्या शुरू हो गई। जांच में किडनी से जुड़ी समस्या की संभावना बताई गई। डॉक्टर ने फिर जांच करवाई और बोले: "क्रिएटिनिन थोड़ा बढ़ा है। लेकिन चिंता न करें — दवाइयाँ लेते रहें।" और दो दवाइयाँ जोड़ दीं। अब दवाइयाँ हो गईं ग्यारह। अब आप खाने से ज्यादा दवाइयाँ लेने लगे हैं, और इनके साइड इफेक्ट्स से धीरे-धीरे आपकी हालत बिगड़ रही है। अगर शुरुआत में डॉक्टर ने सिर्फ इतना कहा होता: "चिंता मत करें। हल्का बुखार है। दवा की जरूरत नहीं। आराम करें, पानी पिएं, ताजे फल-सब्जियां खाएं, सुबह टहलें — बस इतना ही काफी है।" तो क्या होता? लेकिन फिर डॉक्टर और दवा कंपनियों का व्यवसाय कैसे चलता? --- सबसे बड़ा सवाल: डॉक्टर किस आधार पर किसी को कोलेस्ट्रॉल, बीपी, डायबिटीज, दिल या किडनी का मरीज घोषित करते हैं? ये सीमाएं किसने तय की हैं? थोड़ा गहराई से समझते हैं: 1979 में डायबिटीज के लिए शुगर की सीमा 200 mg/dl मानी जाती थी। तब सिर्फ 3.5% लोग ही डायबिटिक माने जाते थे। 1997 में यह सीमा 126 mg/dl कर दी गई, जिससे अचानक डायबिटिक लोगों की संख्या बढ़कर 8% हो गई। 1999 में WHO ने इसे स्वीकार किया। 2003 में ADA ने प्री-डायबिटिक की सीमा 100 mg/dl तय की। इससे 27% लोग इस श्रेणी में आ गए। आज के अनुसार, भोजन के बाद 140 mg/dl शुगर वालों को भी डायबिटिक माना जाता है। इससे दुनिया की लगभग 50% आबादी को डायबिटिक घोषित किया जा रहा है — जिनमें कई लोग वास्तव में बीमार नहीं हैं। भारत में HbA1c को 5.5% करने की भी कोशिश हो रही है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि HbA1c 11% तक भी डायबिटिक नहीं मानना चाहिए। --- एक और उदाहरण: 2012 में एक बड़ी दवा कंपनी पर US सुप्रीम कोर्ट ने 3 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया। आरोप था कि उनकी डायबिटीज दवा से हार्ट अटैक का खतरा 43% बढ़ता है, यह जानते हुए भी जानकारी छुपाई गई। इस दौरान कंपनी ने 300 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। यही है आज का “अति-आधुनिक चिकित्सा विज्ञान”! सोचिए... और सोचने की शुरुआत कीजिए... --- ✅ इसे जरूर संभालकर रखें 🧏‍♂️🧏‍♀️ सब स्वस्थ और खुश रहें — यही शुभकामना है। #कडवा #कडवा सच #✍️कडवा सच ✍️ #जीवन की कड़वी सच्चाई