नरेश चंद्र सनातनी
553 views
6 days ago
🚩 खुला पत्र : हिंदू-सिख भाईचारे को तोड़ने वालों के नाम 🚩 “चगद-दंग चौंका, हगद-दंग हनुमंता। जगद-दंग जोधा, महा तेजवंता॥” श्री दशम ग्रंथ साहिब में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा हनुमान जी के वीर स्वरूप का यह वर्णन केवल शब्द नहीं, बल्कि उस साझा आध्यात्मिक विरासत का प्रमाण है जिसने सदियों से हिंदू और सिख समाज को एक सूत्र में बांध रखा है। गुरु साहिब ने हनुमान जी को महान योद्धा, अद्भुत पराक्रमी और आदर्श सेवक के रूप में प्रस्तुत किया। आज कुछ कट्टरपंथी मानसिकता के लोग हिंदू-सिख भाईचारे में जहर घोलने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणियाँ कर इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। ऐसे लोगों को इतिहास पढ़ने और अपनी औक़ात में रहने की आवश्यकता है। सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी का जन्म एक हिंदू बेदी खत्री परिवार में हुआ था। उनके बाद के सभी नौ गुरु भी हिंदू परिवारों से संबंधित थे। यह इतिहास किसी से छुपा नहीं है। सिख धर्म और सनातन संस्कृति का रिश्ता विरोध का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता का रहा है। जब औरंगजेब जबरन कश्मीरी हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवा रहा था, तब कश्मीरी पंडितों की पुकार पर नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी ने दिल्ली के चांदनी चौक में अपना शीश बलिदान कर दिया। उन्हें “हिंद की चादर” इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। यह बलिदान केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत की आत्मा की रक्षा के लिए था। दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने “चण्डी दी वार” में “प्रथम भगवती सिमर कै…” लिखकर शक्ति स्वरूपा माता का स्मरण किया। उन्होंने अन्याय के विरुद्ध लड़ने और धर्म की रक्षा का संदेश दिया। यही सनातन और सिख परंपरा का साझा स्वरूप है। हनुमान जी को शिव जी का अवतार माना जाता है। वीरता, निष्ठा और धर्म रक्षा का जो स्वरूप हनुमान जी में दिखाई देता है, वही स्वरूप सिख इतिहास के योद्धाओं में भी दिखाई देता है। हिमालय की गोद में स्थित पवित्र हेमकुंड साहिब इसका जीवंत उदाहरण है। सिखों के लिए यह गुरु गोबिंद सिंह जी की तपस्थली है, वहीं हिंदुओं के लिए यह भगवान लक्ष्मण जी की साधना से जुड़ा पवित्र स्थल माना जाता है। इसी प्रकार मणिकरण साहिब में गुरुद्वारा साहिब और हिंदू मंदिर साथ-साथ स्थित हैं। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ तपस्या करते थे और बाद में गुरु नानक देव जी भी उस पवित्र स्थान पर पहुंचे। कालका माता मंदिर के साथ गुरुद्वारा साहिब, ज्वाला माता देवी में आज भी श्रद्धा से घी चढ़ाने आने वाले सिख परिवार, नयनादेवी और देश के अनेक धार्मिक स्थल इस साझा विरासत की मिसाल हैं। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से पंजाब में हिंदू और सिख परिवारों का रिश्ता बेहद गहरा रहा है। पीढ़ियों से कई हिंदू परिवारों में सबसे बड़े बेटे को सिख धर्म के अनुसार खालसा पंथ में शामिल करने की परंपरा रही है। आज भी मेरे जन्म स्थान अंबाला के घेल गांव में लगभग हर घर में एक हिंदू परिवार का बच्चा सिख स्वरूप में सजाया जाता है। यह भाईचारा किसी राजनीति से नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और साझा इतिहास से बना है। सिख गुरुओं ने कभी किसी धर्म के अपमान की शिक्षा नहीं दी। उन्होंने मानवता, साहस, सेवा और धर्म रक्षा का मार्ग दिखाया। जो लोग हिंदू-सिख एकता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे न गुरु साहिबानों की विचारधारा समझ पाए हैं और न भारत की आत्मा। हमारी साझा विरासत करुणा, सहिष्णुता, बलिदान और आध्यात्मिक ज्ञान की विरासत है। हिंदू और सिख सदियों से एक-दूसरे की आस्था और सम्मान की रक्षा करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे। हिंदू-सिख भाईचारा अमर था, अमर है और अमर रहेगा। 🇮🇳🙏 — वीरेश शांडिल्य अंतरराष्ट्रीय प्रमुख, विश्व हिन्दू तख्त राष्ट्रीय अध्यक्ष, एंटी टेररिस्ट फ्रंट इंडिया #जागो और जगाओ