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Sagar Saini
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Sagar Saini
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . कबीर साहिब जी का शास्त्र प्रमाणित तत्वज्ञान आज का समाज परमात्मा कबीर जी को एक सामान्य संत समझता है जबकि अपनी महिमा बताते हुए परमात्मा कबीर जी ने हमें बताया कि वही सृष्टि के रचनहार हैं और चारों युगों में आते हैं अपनी प्यारी आत्माओं को मिलते हैं जो युगों- युगों से परमात्मा प्राप्ति के लिए भटक रहे हैं। आज तक हम जो भी साधना भक्ति करते आ रहे थे। उससे ना तो सुख की प्राप्ति होती है और ना ही मोक्ष की। जितने भी संत, गुरु व महामंडलेश्वर हुए हैं उन्हें स्वर्ग तक की ही जानकारी है। परंतु कबीर परमेश्वर ने हमें सतलोक के विषय में बताया कि ऊपर एक ऐसा लोक है जहां कोई कष्ट नहीं है सुख ही सुख है। जिस की गवाही संत गरीबदास जी ने अपनी वाणी में दी है। संखों लहर मेहर की ऊपजैं, कहर नहीं जहाँ कोई। दास गरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई। कबीर परमेश्वर ने ही यथार्थ ज्ञान बताया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश की जन्म और मृत्यु होती है, ये अविनाशी नहीं हैं। यही प्रमाण श्रीमद्देवी भागवत पुराण, स्कंद 3, अध्याय 5 में है। कबीर परमेश्वर ने बताया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भी जन्म तथा मृत्यु होती है। इनकी माता दुर्गा तथा पिता काल (ब्रह्म) हैं। कबीर, मां अष्टंगी पिता निरंजन, ये जम दारुण वंशन अंजन। तीन पुत्र अष्टंगी जाए, ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराए।। जहां हम रह रहे हैं यह काल का लोक हैं यह 21 ब्रह्मांडों का स्वामी हैं इस काल को एक लाख मानव शरीरधारी प्राणियों का आहार करने का शाप लगा है काल (ब्रह्म) इक्कीस ब्रह्मण्ड के प्राणियों को तप्तशिला पर भून कर खाता है। इसीलिए जन्म-मृत्यु तथा अन्य दुःखदाई योनियों में पीड़ित करता है तथा अपने तीनों पुत्रों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से उत्पत्ति, स्थिति, पालन तथा संहार करवा कर अपना आहार तैयार करवाता है। जितने भी धर्मगुरु हुए हैं उनका कहना है कि मनुष्य को अपने किये कर्मों को भोगकर ही पूरा करना पड़ता है। जबकि यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि परमात्मा साधक के घोर से घोर पापों का भी नाश कर देता है ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में स्पष्ट है कि यदि रोगी की जीवन शक्ति नष्ट हो गई हो और रोगी मृत्यु के समीप पहुंच गया हो तो भी परमात्मा उसको सही करके सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है। आज वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज के रूप में पूर्ण संत (तत्वदर्शी) संत की भूमिका निभाने वाले कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि स्वयं पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी आये हुए हैं उनका लक्ष्य है संपूर्ण विश्व के सभी मानव समाज को अपने शास्त्रों से परिचित कराकर एक परमात्मा की सत भक्ति करवाकर मोक्ष प्रदान करना अपने निज घर सतलोक ले जाना है। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . हमे कर्म फल ही मिलता है कबीर, कर्म फांस छूटे नहीं, केतो करो उपाय। सद्गुरू मिले तो उबरै, नहीं तो प्रलय जाय।। परमेश्वर कबीर साहेब जी कहते हैं, अन्य प्रभु तो केवल किए कर्म का फल ही दे सकते हैं। जैसे प्राणी को दुःख तो पाप से होता है तथा सुख पुण्य से। आपको पाप कर्म के कारण कष्ट था। यह आपके प्रारब्ध में लिखा था। यह किसी भी अन्य भगवान से ठीक नहीं हो सकता था। पाप केवल पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही काट सकता है। यदि हम पुर्ण संत की शरण मे नही है तो हमे अपना किया गया कर्म के हिसाब से फल मिलता है। हमने पुन्य कर्म किये तोअच्छा फल व पाप कर किये तो बुरा फल मिलता है । किये गये कर्म हमारे अपने होते है। हा यदि पुर्ण संत मिल जाता है तो पुर्ण संत हमारे सचित कर्म को काट सकता है। किसी गांव में एक गरीब किसान था। घर में उसकी पत्नी और वो दो ही लोग थे। उनके दिन गरीबी में गुजर रहे थे। किसान के पास कुल जमा एक गाय और दो बोरी अनाज ही था। पति-पत्नी दोनों ही दिन-रात अपने भाग्य को कोसते रहते, भगवान से शिकायत करते कि उन्हें इतना गरीब क्यों बनाया। इसी तरह से दोनों के दिन गुजर रहे थे। एक दिन गांव में एक साधु आया। वो गांव भर में भिक्षा मांगता हुआ उस किसान के घर भी पहुंचा। जैसे ही साधु ने किसान के घर आवाज लगाई, उसकी पत्नी और उसने अपने भाग्य को कोसना शुरू कर दिया। तुम्हें हम क्या दान दें महाराज, हमारा तो खुद का जीवन भिखारियों सा ही गुजर रहा है। ना कपड़े हैं ढंग के ना घर में अनाज है। भगवान हमारे साथ इतना अन्याय कर रहा है जबकि हमने तो किसी का कुछ बिगाड़ा भी नहीं है। साधु उनकी समस्या समझ गया। उसने कहा देवी भाग्य भगवान नहीं बनाता, हमारे कर्म ही भाग्य बनाते हैं। भगवान तो केवल कर्मों का फल दे रहा है। किसान और उसकी पत्नी ने फिर जवाब दिया बाबा हमने ऐसे कौन से पाप किए हैं जो ऐसा जीवन भुगत रहे हैं। हमने तो कभी कोई पाप किए ही नहीं लेकिन कभी भी घर में एक गाय और दो बोरी अनाज से ज्यादा कुछ रहता ही नहीं। साधु ने कहा अगर तुम ज्यादा धन चाहते हो तो मैं एक उपाय सुझाता हूं, अगर तुम मेरा कहना मानोगे तो जरूर तुम्हारे पास भी बहुत धन और सम्पत्ति होगी। दोनों पति-पत्नी साधु के चरणों में बैठ गए। दोनों ने कहा कि जो आप कहेंगे हम वो करेंगे। साधु ने कहा तो सबसे पहले अपनी ये गाय और दो बोरी अनाज इसे भी बाजार में जाकर बेच दो। पति-पत्नी दोनों सहम गए। महाराज अगर ये भी बेच दिया तो हमारे पास तो कुछ बचेगा ही नहीं, हम तो और कंगाल हो जाएंगे। दोनों ने जवाब दिया। साधु ने समझाया मैं जो कह रहा हूं वैसा करो, अगर नुकसान हुआ तो भरपाई मैं कर दूंगा, मैं तुम्हें फिर से एक गाय और दो बोरी अनाज ला दूंगा। डरते-डरते दोनों राजी हुए। किसान ने बाजार में जाकर गाय और अनाज को बेच दिया। धन लेकर घर लौटा। फिर साधु ने कहा अब एक काम करो, इस धन से उन गरीबों को भोजन कराओ जिनके पास खाने को कुछ नहीं है। किसान ने वैसा ही किया। कई गरीबों को भोजन करा दिया। ये बात गांव जमींदार को पता चली कि गरीब किसान ने अपनी गाय और अनाज बेचकर भूखों को खाना खिला दिया। उसने तुरंत अपने सेवक को भेजकर किसान के घर एक गाय और दो बोरी अनाज भिजवा दिया। साधु ने फिर किसान से कहा कि इसे भी बेचकर आओ और कल फिर गरीबों को भोजन कराओ। किसान ने फिर ऐसा ही किया। तो फिर किसी ने उस किसान को दान में एक गाय और दो बोरी अनाज भिजवा दिए। साधु के कहने पर किसान रोज गरीबों को इसी तरह भोजन कराता रहा और उसके यहां रोज दान आने लगा। लोग उसकी मदद करने लगे कि ये किसान गरीब होकर भी भूखों को भोजन कराता है। धीरे-धीरे उस किसान की ख्याति दूसरे गांवों में भी फैल गई। धीरे-धीरे दान आने का दायरा बढ़ता गया। बहुत दिन गुजर गए। किसान गरीब से सम्पन्न हो गया। उसने एक दिन साधु से पूछा कि अचानक मेरे भाग्य में इतना अनाज और धन कैसे आ गया। साधु ने उसे समझाया कि तू इस धन से दूसरों को भोजन करा रहा है ये उन्हीं के भाग्य का धन है जो भगवान तुझे दे रहे हैं। हमेशा अपनी असफलताओं और दुर्भाग्य के लिए भाग्य या भगवान को कोसना ठीक नहीं है। अपने कर्म बदलकर देख लें। संभव है कि हमारे कर्म ही ऐसे ना हो कि भाग्य उसमें साथ दे। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . देते को हर देत है कबीर, देते को हर देत है, जहां तहां से आन। नही तो मांगते फिरो, साहिब सुने ना कान।। कबीर साहिब जी कहते हैं कि जो व्यक्ति उचित पात्र को दानधर्म करता है, परमात्मा उसको हजारो गुणा लौटाते है। जो व्यक्ति दान धर्म नही करता उसको उस परमात्मा के दरवार से कुछ नही मिलता। हम देखते कि एक बच्चे का जन्म विश्व के बडे बडे घरानों मे होता है। बच्चा पैदा होते ही अरब खरब का मालिक हो जाता है। उसने जन्म के साथ नही कमाया और ना ही कोई ऐसा धर्म पुन किया। ये उसके पिछले जन्मों मे किये सद्कर्म और दान है जो अब जन्म के साथ ही राजा महाराज जैसे ठाट-बाट है। एक अन्य उदाहरण मे बताते है कि एक झुपड झोपड़ी मे पैदा बच्चा मा की गोद मे होता है और मा बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, या अन्य धार्मिक स्थलों पर भीख मांगती है। जब बच्चा छ- सात महिने का होता है तब मा के साथ हाथ निकाल कर भीख मांगनी शुरू कर देता है।उस बच्चे ने इस जन्म मे ऐसा पाप नही किया कि उसे भीख मांगनी पडे। ये सब पुर्व जन्म के किये कर्म का फल है। मनुष्य जन्म दो तरह से मिलते है। एक लख चौरासी योनि भुगतने के बाद मनुष्य जन्म मिलता है। एक पिछले जन्मों मे किये धर्म पुन्य व सद्भक्ति व सद्कर्म से मिलता है। जन्म मे पाप पुन्य की अनुपात से मनुष्य जीवन का लेखा जोखा लिखा जाता है। उसी के आधार पर जीवन जीता है। और अपने हिसाब से कर्म करता है। संत रामपाल जी महाराज कहते है कि जब मनुष्य को यदि सच्चा सतगुरू जो शाशत्रानुकुल साधना करवाये मिल जाता है तो उसके सभी पाप कर्म का खात्मा कर देता है। सतगुरु उस परमात्मा की प्राप्ति के लिये सद्भक्ति करवाता है। उससे संसारिक सुख मिलते है। कर्म भ्रम ब्रह्माण्ड के , फल मे कर दू नेश। जिन हमरी दुहाई दी, करो हमारे पेश।। सतगुरु की शरण ना मिले और पिछले जन्मों मे सद्भक्ति, सद्कर्म किये नही तो उसकी ऐसी हालात होती है जैसे साउथ अफ्रीका के इस बच्चे की है। फोटोग्राफर फोटो बनाते है मैगजीन मे छपती है। फोटोग्राफर को इनाम मिलता है मगर उस बच्चे का क्या मिला? यह तस्वीर याद है आपको? इसे नाम दिया गया था “The vulture and the little girl ” । इस तस्वीर में एक गिद्ध भूख से मर रही एक छोटी लड़की के मरने का इंतज़ार कर रहा है । इसे एक साउथ अफ्रीकन फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर ने 1993 में सूडान के अकाल के समय खींचा था। और इसके लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लेकिन कार्टर इस सम्मान का आनंद कुछ ही दिन उठा पाए क्योंकि कुछ महीनों बाद 33 वर्ष की आयु में उन्होंने अवसाद से आत्महत्या कर ली । क्या हुआ? दरअसल जब वे इस सम्मान का जश्न मना रहे थे तो सारी दुनिया में प्रमुख चैनल और नेटवर्क पर इसकी चर्चा हो रही थी । उनका अवसाद तब शुरू हुआ जब एक ‘फोन इंटरव्यू’ के दौरान किसी ने पूछा कि उस लड़की का क्या हुआ? कार्टर ने कहा कि वह देखने के लिए रुके नहीं क्यों कि उन्हें फ्लाइट पकड़नी थी। इस पर उस व्यक्ति ने कहा ” मैं आपको बता रहा हूँ कि उस दिन वहां दो गिद्ध थे जिसमें एक के हाथ में कैमरा था।” इस कथन के भाव ने कार्टर को इतना विचलित कर दिया कि वे अवसाद में चले गये और अंत में आत्महत्या कर ली। किसी भी स्थिति में कुछ हासिल करने से पहले मानवता आनी ही चाहिए। कार्टर आज जीवित होते अगर वे उस बच्ची को उठा कर यूनाईटेड नेशन्स के फीडिंग सेंटर तक पहुंचा देते जहां पहुंचने की वह कोशिश कर रही थी। भारतीय मीडिया न्यूज़ चैनलों से अरबों खरबों रुपए कमाते हैं वह इन प्रवासी श्रमिकों की केवल वीडियो बना रहे हैं न्यूज़ बना रहे हैं लेकिन उन्होंने किसी एक की भी सहायता नहीं की भारतीय मीडिया के गिद्धों को समर्पित Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . अज्ञानी गुरु को तुरंत त्याग दो झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार। द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार।। कबीर साहेब जी कहते हैं कि अज्ञानी गुरु के मत तथा स्थान को त्यागने में पल-भर की भी देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसके ज्ञान से सार-शब्द का मार्ग नहीं मिल सकता और इस संसार में बारंबार भटकते रहना पड़ेगा! कविर्देव ने अपनी वाणी में कहा है कि एक जीव को काल साधना से हटा कर पूर्ण गुरू के पास लाकर सत उपदेश दिलाने का पुण्य इतना होता है कि जितना करोड़ गाय-बकरें आदि प्राणियों को कसाई से छुटवाने का होता है। क्योंकि यह अबोध मानव शरीर धारी प्राणी गलत गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरूद्ध साधना से काल के जाल में फंसा रह कर न जाने कितने दुःखदाई चौरासी लाख योनियों के कष्ट को झेलता रहता है। जब यह जीवात्मा कविर्देव (कबीर साहेब) की शरण में पूरे गुरू के माध्यम से आ जाती है, नाम से जुड़ जाती है तो फिर इसका जन्म तथा मृत्यु का कष्ट सदा के लिए समाप्त हो जाता है और सतलोक में वास्तविक परम शांति को प्राप्त करता है। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी सत्संग मे बताते है कि सामवेद के श्लोक नं. 822 में बताया गया है कि जीव की मुक्ति तीन नामों से होगी। प्रथम ऊँ, दूसरा सतनाम (तत्) और तीसरा सारनाम (सत्)। यही गीता जी भी प्रमाण देती है कि - ऊँ-तत्-सत् और श्री गुरु ग्रन्थ साहेब भी इसी सतनाम जपने का इशारा कर रहा है। सतनाम-सतनाम कोई जपने का नाम नहीं है। यह तो उस नाम की तरफ इशारा कर रहा है जो एक सच्चा नाम है। इसी तरह यह सारनाम भी। अकेला ऊँ मन्त्र किसी काम का नहीं है। ये तीनों नाम व नाम देने की आज्ञा संत रामपाल जी महाराज जी को गुरुदेव जी स्वामी रामदेवानन्द जी महाराज जी द्वारा बकसीस है जो कबीर साहेब से पीढी दर पीढी चलती आ रही है। पहले आप सतसंग सुनो, सेवा करो जिससे आपका भक्ति रूपी खेत संवर जाएगा। कबीर, मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटैं हरि नाम। जैसे कुआँ जल बिना, खुदवाया किस काम।। कबीर, एक हरि के नाम बिना, ये राजा ऋषभ हो। माटी ढोवै कुम्हार की, घास न डालेको।। इसके पश्चात् अपने संवरे हुए खेत में बीज बोना होगा। शास्त्रों (कबीर साहेब की वाणी, वेद, गीता, पुराण, कुराण, धर्मदास साहेब आदि संतों की वाणी) के अध्ययन से मुक्ति नहीं होगी। इन सभी शास्त्रों का एक ही सार (निचोड़) है कि पूर्ण मुक्ति के लिए पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के प्रतिनिधि संत(जिनको उनके गुरु द्वारा नाम देने की आज्ञा भी हो) से नाम उपदेश ले कर आत्म कल्याण करवाना चाहिए। यदि नाम नहीं लिया तो - नाम बिना सूना नगर, पड़या सकल में शोर। लूट न लूटी बंदगी, हो गया हंसा भोर।। अदली आरती अदल अजूनी, नाम बिना है काया सूनी। झूठी काया खाल लुहारा, इंगला पिंगला सुषमन द्वारा।। कृतघ्नी भूले नर लोई, जा घट निश्चय नाम न होई। सो नर कीट पतंग भुजंगा, चैरासी में धर है अंगा। यदि बीज नहीं बीजा तो आत्मा रूपी खेत की गुड़ाई अर्थात् तैयारी करना व्यर्थ हुआ। कहने का अभिप्राय यह है कि इनसे आपको ज्ञान होगा जो कि आवश्यक है। परंतु पूर्ण गुरू द्वारा नाम उपदेश लेना अर्थात् बीज बीजना भी अति आवश्यक है। नाम भी वही जपना होगा जो कि गुरु नानक साहेब जी ने जपा, गरीबदास साहेब ने जपा, धर्मदास साहेब आदि संतों ने जपा। इसके अतिरिक्त अन्य नामों से जीव की मुक्ति नहीं होगी। इसलिए आप सभी ने नाम उपदेश लेकर अपना भक्ति रूपी धन जोड़ना प्रारम्भ करना चाहिए और अन्य सभी को भी बताना चाहिए। जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी। चूंकि न जाने कब और किस समय इस शरीर का पूरा होने का समय आ जाए। गुरु नानक देव जी भी कहते हैं कि- ना जाने ये काल की कर डारै, किस विधि ढल जा पासा वे। जिन्हादे सिर ते मौत खुड़गदी, उन्हानूं केड़ा हांसा वे।। कबीर साहेब कहते हैं कि - कबीर, स्वांस-स्वांस में नाम जपो, व्यर्था स्वांस मत खोए। न जाने इस स्वांस का, आवन हो के ना होए।। सतगुरू सोई जो सारनाम दृढ़ावै, और गुरू कोई काम न आवै। ‘‘सार नाम बिन पुरुष (भगवान) द्रोही‘‘ अर्थात् जो गुरू सारनाम व सारशब्द नहीं देता है या उसको अपने गुरू द्वारा नाम देने का अधिकार (आज्ञा) नहीं है अर्थात् शास्त्रों के अध्ययन से यदि कोई मनमुखी गुरु ये नाम भी दे देता हो तो भी वह गुरु और उनके शिष्यों को नरक में डाला जाएगा। वह गुरु भगवान का दुश्मन है, विद्रोही है। उसे भगवान के दरबार में उल्टा लटकाया जाएगा। अब भक्त समाज में नकली गुरुओं द्वारा एक गलत धारणा फैला रखी है कि एक बार गुरु धारण करने के पश्चात दूसरा गुरु नहीं बदलना चाहिए। जरा विचार करके देखो कि गुरु हमारे जन्म-मृत्यु रूपी रोग को काटने वाला वैद्य होता है। यदि एक वैद्य से हमारा रोग नहीं कटता है तो हम दूसरे अच्छे वैद्य(डाक्टर) के पास जाएंगे जिससे हमारा जानलेवा रोग ठीक हो सके। जैसे धर्मदास साहेब के पहले गुरु श्री रूपदास जी थे। लेकिन जब धर्मदास जी को पता लगा कि यह गुरु पूर्ण मुक्ति दाता नहीं है तो तुरंत त्याग कर पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सतपुरुष कबीर साहेब को अपना गुरु बनाया और पूर्ण मोक्ष सत्य लोक में प्राप्त किया। ठीक इसी प्रकार अधूरे गुरु को तुरंत त्याग देना चाहिए। गरीब, बिन उपदेश अचंभ है, क्यों जीवत हैं प्राण। बिन भक्ति कहाँ ठौर है, नर नाहिं पाषाण।।1।। गरीब, एक हरि के नाम बिना, नारि कुतिया हो। गली-2 भौंकत फिरै, टूक ना डालै को।।2।। गरीब, बीबी पड़दे रहैं थी, डयोढी लगती बार। गात उघाड़े फिरती हैं, बन कुतिया बाजार।।3।। गरीब, नकबेसर नक से बनी, पहरत हार हमेल। सुन्दरी से सुनही बनी, सुनि साहिब के खेल। कबीर, हरि के नाम बिना, राजा ऋषभ होए। माटी लदै कुम्हार कै, घास ना डाले कोए।।5।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हौ भी गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन।।6।। कबीर, गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हरि की सेव। कहै कबीर स्वर्ग से, फेर दिया सुखदेव।।7।। कबीर, राजा जनक से नाम ले, किन्हीं हरी की सेव। कहै कबीर बैकुण्ठ में, उल्ट मिले सुखदेव।।8।। कबीर, सतगुरु के उपदेश का, लाया एक विचार। जै सतगुरु मिलते नहीं, जाता नरक द्वार।।9।। कबीर, नरक द्वार में दूत सब, करते खैंचा तान। उनतें कबहु ना छुटता, फिर फिरता चारों खान।। कबीर, चार खानी में भ्रमता, कबहु ना लगता पार। सो फेरा सब मिट गया, सतगुरु के उपकार।।11।। कबीर, सात समुन्द्र मसि करूं, लेखनी करूं बनराय। धरती का कागद करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।12। कबीर, गुरु बड़े गोविन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरे सो रह गए, गुरु भजे हुए पार।।13।। कबीर, गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागुं पाय। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दिया मिलाय।। कबीर, हरि के रूठतां, गुरु की शरण में जाय। कबीर गुरु जै रूठजां, हरि नहीं होत सहाय।। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप , जाग मच्छदंर, गोरख आया। मुछंदर नाथ जी की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो चली थी तो उनके मन में प्रेरणा हुयी जीवन तो बीत गया पर मैने गृहस्थ जीवन का आनंद नही लिया है तभी सिंहल द्वीप के राजा की मृत्यु हुयी मुछन्दर नाथ ने अपना शरीर एक गुफा में सुरक्षित रख अपनी आत्मा को राजा के शरीर में प्रवेश कर दी तो राजा के शरीर में जान आ गयी । अब मुछंदर नाथ राज करने लगा और राजशाही के आनन्द ले रहा था तभी राजदरबार के विद्वानो ने रानी को कहा यह हमारा राजा नही है ना पहले सा व्यवहार और लक्षण है यह तो मुछंदर नाथ योगी है जिसने फलानी गुफा मे शरीर छोड यहां राज के आनंद‌ लेने आया है । रानी बोली कोई बात नही । राजा रहेगा तो राज चलता रहेगा । मुछन्दर का शरीर खोजकर फुंकवा दिया गया । उधर योगी गौरखनाथ किसी और तपस्वी से ज्ञान चर्चा कर रहे थे तो वो योगी बोला अरे गौरख तू इतना ही योगी है तो अपने गुरू को सिंहल द्वीप के राजा के शरीर से छुडवा ले ना । गौरखनाथ को यह बात लगी और वह सिंहल द्वीप पहुंचा रानी को विद्वानो ने बताया इस मुछन्दर नाथ का एक शिष्य गौरख बडा तेज है वो अपने गुरू छुडवाने आयेगा तो रानी ने बहुत पहले से ही योगी तपस्वियो का राज मे आना वर्जित कर रखा था । उधर मुछंदर नाथ के दो पुत्र हो गये उने से एक का जन्म दिन मनाया जा रहा था । म्यूजिक पार्टी बाहर देश से बुलायी गयी गौरखनाथ को राज्य में घुसने का बहाना मिल गया उसने तबले बजवाने वाले को सिद्धी से दस्त लगवा दिये अब पुरी म्युजिक पार्टी सकते मे आ गयी ऐसे कैसे कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे तभी गोरखनाथ ने पुछा क्या बात है उन्होने अपनी व्यथा बताई गौरखनाथ ने बोला में बढिया तबला बजा सकता हुं देख लो उसकी ट्राईल हुई बात बन गयी अब राज दरबार में गाना गाते गाते गोरख नाथ बोलते जाग मुछंदर गोरख आयो , जाग मुछंदर गोरख आयो । मुछन्दर‌ की आत्मा अंदर से फडक उठती यह क्या हो रहा है राजा ने उसे राज महल मे अपने बच्चो की देख भाल के लिये रख लिया गोरखनाथ बोलता गुरू जी आप कहां फंस गये राजा बना बना मुछन्दर बोलता अरे तू अपनी रहने ने देख जी सा आ रहा है। तू अपनी डयूटी कर बच्चो का ख्याल रख । तब गौरखनाथ ने बच्चो को सिद्धी से दस्त लगा दिये हर पांच पांच मिनिट मे एक के बाद एक जाने लगा मुछंदर बोला बाहर जा के झडका लिया गौरख ने उन दोनो‌ के बाल पकड झडक दिया तो अंदर से सारा शरीर निकल गया और सिर्फ खाल खाल राजा के पास ले गया तो राजा बोला यह तूने क्या किया तो गौरखनाथ बोला गुरू मुछंदर नाथ शिव के साधक होकर जीवन भर बह्मचर्य का पालन कर अपना योग यहां‌ क्यूं नष्ट कर रहा है। चल वापस। मुछन्दर बोला कैसे आऊ वो शरीर तो इस रानी ने फूंकवा दिया गौरख बोला चलो देखते है । मुछन्दर बोला ठीक यह थैला साथ ले लेना। वहां से मुछन्दर को निकाला और जहां उसकी अस्थि और राख पडी उसका अपनी सिद्धी से शरीर बना मुछन्दर को वापस खडा कर दिया मुछन्दर ने कहा वो थैला कहां‌ है थैला लेकर वो वापस चल पडे रास्ते में उन्हे प्यास लगी एक कुऐं से पानी पीते समय गोरखनाथ ने थैले से कुछ निकाल कुयें में फेंक दिया । थोडा आगे चले की मुछंदर नाथ को लगा थैला कुछ हल्का सा लग रहा है उसने देखा उसमें जो मैने दो सोने की ईंट रखी वो गायब है। वो गौरख पर विफर गया बोला कहां छुपाई तुने ईंट गौरख बोला कुंऐ में फेंक दी मुछंदर इतना गुस्से में हो गया की उसको राह चलते चलते पीटता जा रहा था गौरखनाथ ने कहा गुरू मुछन्दर नाथ जी जब आप को भोग ही चाहिये था तो योगी क्यों बने 60 वर्ष तक आपने गौरख जैसे कितने ही शिष्य बना योग दिया और आज आप दो ईंट में जी फंसा रहे हो और उसने अपनी सिद्धी से एक पहाडी पर मंत्र फूंका और सारी पहाडी सोने की बना दी और कहा उठा लो जितना चाहिये तब मुछंदर नाथ को अपने योग और भूल का पुन: एहसास हुआ । अब गौरख नाथ जी शिव के उपासक थे शिव आठ सिद्धी के दाता है उसमें से एक गौरखनाथ को दे दी जिस से वो सिद्धी युक्त काम कर सकता था । कबीर साहब कहते है हम साधक को 24 सिद्धिया देते है पर संसार में दिखाने नही उस परमधाम को जाने में प्रयोग करते है । फिर गौरखनाथ और कबीर साहब की ज्ञान गौष्ठी भी हुयी। कबीर साहब बोले गौरख तू मुर्दे तक जिन्दा कर तू भी मुर्दो में ही है अर्थात जन्म मरण तो तेरा भी है काफी वाद विचार के बाद गौरखनाथ ने कबीर साहब की परिक्षा लेनी चाहिये फिर कबीर साहब से उपदेश लिया कबीर साहब बोले आपको शिव की साधना छुडा नही रहे है बल्की इसमें और जोड रहे है फिर गौरखनाथ ने कबीर साहब की बताई सत भक्ति की । Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . गोपीचंद और भरथरी ने अलवर के किले पत्थर ढोये। एक समय श्री गोरखनाथ जी से गोपीचंद तथा भरथरी जी ने कहा कि गुरूदेव! हमारा मोक्ष इसी जन्म में हो, ऐसी कृपा करें। आप जो भी साधना बताओगे, हम करेंगे। श्री गोरखनाथ जी ने कहा कि राजस्थान प्रान्त में एक अलवर शहर है। वहाँ का राजा अपने किले का निर्माण करवा रहा है। तुम दोनों उस राजा के किले का निर्माण पूरा होने तक उसमें पत्थर ढ़ोने का निःशुल्क कार्य करो। अपने खाने के लिए कोई अन्य मजदूरी सुबह-शाम करो। उसी दिन दोनों भक्त आत्मा गुरू जी का आशीर्वाद लेकर चल पड़े। उस किले का निर्माण बारह वर्ष तक चला। कोई मेहनताना का रूपया-पैसा नहीं लिया। अपने भोजन के लिए उसी नगरी के एक कुम्हार के पास उसकी मिट्टी खोदने तथा उसके मटके बनाने योग्य गारा तैयार करने लगे। उसके बदले में सुबह-शाम केवल रोटी खाते थे। कुम्हार की धर्मपत्नी अच्छे संस्कारों की नहीं थी। कुम्हार ने कहा कि दो व्यक्ति बेघर घूम रहे थे। वे मेरे पास मिट्टी खोदते तथा गारा तैयार करते हैं। केवल रोटी-रोटी की मजदूरी लेंगे। आज तीन व्यक्तियों का भोजन लेकर आना। मटके बनाने तथा पकाने वाला स्थान नगर से कुछ दूरी पर जंगल में था। कुम्हारी दो व्यक्तियों की रोटी लेकर गई और बोली कि इससे अधिक नहीं मिलेगी। भोजन रखकर घर लौट आई। कुम्हार ने कहा कि बेटा! इन्हीं में काम चलाना पड़ेगा। तीनों ने बाँटकर रोटी खाई। कई वर्ष ऐसा चला। अंत के वर्ष में तो केवल एक व्यक्ति का भोजन भेजने लगी। तीनों उसी में संतोष कर लेते थे। किले का कार्य बारह वर्ष चला। कुम्हार ने अपने घड़े पकाने के लिए आवे में रख दिए। अंत के वर्ष की बात है।* गोपीचंद तथा भरथरी ने कुम्हार से आज्ञा ली कि पिता जी! हमारी साधना पूरी हुई। अब हम अपने गुरू श्री गोरखनाथ जी के पास वापिस जा रहे हैं। मेरा नाम गोपीचंद है। इनका नाम भरथरी है। उस समय कुम्हार की पत्नी भी उपस्थित थी। मटकों की ओर एक हाथ से आशीर्वाद देते हुए दोनों ने एक साथ कहा पिता का हेत माता का कुहेत। आधा कंचन आधा रेत।। यह वचन बोलकर दोनों चले गए। जिस समय मटके निकालने लगे तो कुम्हार तथा कुम्हारी दोनों निकाल रहे थे। देखा तो प्रत्येक मटका आधा सोने का था, आधा कच्चा था। हाथ लगते ही रेत बनने लगा। कुम्हार ने कहा, भाग्यवान! वे तो कोई देवता थे। तेरी त्रुटी के कारण आधा मटका रेत रह गया। मिट्टी की मिट्टी रह गई। आधा स्वर्ण का हो गया। कुम्हारी को अपनी कृतघ्नता का अहसास हुआ तथा रोने लगी। बोली कि मुझे पता होता तो उनकी बहुत सेवा करती। कबीर, करता था तब क्यों किया, करके क्यों पछताय। बोवे पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय।। इस प्रकार गोपीचंद और भरथरी जी अपने गुरू जी के वचन का पालन करके सफल हुए। जो अमरत्व उस साधना से मिलना था, वह भी अटल विश्वास करके साधना करने से हुआ। यदि विवेकहीन तथा विश्वासहीन होते तो विचार करते कि यह कैसी भक्ति? यह कार्य तो सारा संसार कर रहा है। मोक्ष के लिए तो तपस्या करते हैं या अन्य कठिन व्रत करते हैं। परंतु उन्होंने गुरू जी को गुरू मानकर प्रत्येक साधना की। गुरू जी के कार्य या आदेश में दोष नहीं निकाला तो सफल हुए। गोरखनाथ जी ने उनको जो नाम जाप करने का मंत्रा दे रखा था, उसका जाप वे दोनों पत्थर उठाकर निर्माण स्थान तक ले जाते तथा लौटकर पत्थरों को तरास (काँट-छाँट करके सीधा कर) रहे थे, वहाँ तक आते समय करते रहते थे। दोनों युवा थे। कार्य के परिश्रम तथा पूरा पेट न भरने के कारण मन में स्त्री के प्रति विकार नहीं आया और सफलता पाई। गुरू एक वैद्य होता है। उसे पता होता है कि किस रोगी को क्या परहेज देना है? क्या खाने को बताना है? यानि पथ्य-अपथ्य डॉक्टर ही जानता है। रोगी यदि उसका पालन करता है तथा औषधि सेवन अथार्त भक्त नाम जाप करता है तो स्वस्थ हो जाता है यानि मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार गोपीचंद तथा भरथरी जी ने अपने गुरू जी के आदेश का पालन करके जीवन सफल किया। इसी प्रकार साधक को सफल होने के लिए गुरु के प्रत्येक आदेश को मन-कर्म-वचन से मानकर साधना करनी चाहिए। तभी पूर्ण मोक्ष शाश्वत धाम सतलोक प्राप्त होगा। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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54 minutes ago
#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . जीव हमारी जाती है, मानव धर्म हमारा आज हम भारत जैसे स्वतंत्र देश में रहते हैं किन्तु हमारी मानसिकता हमारे सोचने की क्षमता आज भी हिंदू और मुस्लिम होने की बेढीयो मे कैद है। आज लोग एक दूसरे का खून बहाने को तैयार है। अरे भाई क्या कभी सोचा क्या फर्क है एक हिंदू और एक मुस्लिम मे हमारा खून एक है हम एक है फिर अलग क्या है जो आप लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो? बेशक आप आज एक दूसरे का जान लेने व खून बहाने को तैयार हो लेकिन जब बात खुद पर आती है तब यह सब क्यों नहीं सोचते यदि कभी आप को अपनी जान बचाने के लिए किसी हिंदू या मुस्लिम भाई के खून की जरूरत पड़े तो उस समय आप सब भूल जाते हो फिर क्यों लड़ रहे हो? आज हम हिन्दू है कल मर जाते है और परमात्मा हमे अगला जन्म मुस्लिम के घर होता है तो तब हम क्या करेगे। हमारा भगवान एक है। आज से ठीक पचीसौ साल पहले एक मानव धर्म था। आज कश्मीर जैसे छोटे टुकड़े के लिए ना जाने हमारे कितने जवान व कितने माँ के लाल मर रहे हैं क्यो बस हमारी छोटी सोच के कारण क्योंकि पाकिस्तान चाहता है कश्मीर हमारा हो और भारत चाहता है कश्मीर उनका हो। क्यों उस खूबसूरत जगह को मौत का अड्डा बना रखा है हिंदू कहते हैं मुस्लिम आतंकवादी होते है लेकिन क्या यह जरूरी है?अरे आतंक वादी तो वह है जो हिंदू, मुस्लिम होने पर लड़ रहा है!! आखिर क्या हम सब भाई बहन कि तरह नही रह सकते ? कब तक हिंदू मुस्लिम के नाम पर लडते रहोगे ? मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मे बाँट दिया भगवान को, धरती बाँटा , अमन बाँटा मत बाँटो इंसान को!! ना हिंदू बन मेरे भाई ना मुसलमान बन! इंसान की औलाद है पहले इंसान तो बन। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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55 minutes ago
#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . परमात्मा की शक्ति जब तक हमारे अन्दर काम, क्रोध, मोह लोभ और अंहकार है तब तक हम परमात्मा से काफी दुर है। जब जब भगती (मंत्र जाप) करते है तो पाँचो अवगुण कम होते जाते है और हम परमात्मा के नजदिक होते जाते है। एक आदमी रात को झोपड़ी में बैठकर एक छोटे से दीये को जलाकर कोई शास्त्र पढ़ रहा था। आधी रात बीत गई। जब वह थक गया तो फूंक मार कर उसने दीया बुझा दिया। लेकिन वह यह देख कर हैरान हो गया कि जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर खड़ा रहा।लेकिन जैसे ही दीया बुझ गया तो चांद की किरणें उस कमरे में फैल गई। वह आदमी बहुत हैरान हुआ यह देख कर कि एक छोटे से दीए ने इतने बड़े चांद को बाहर रोक कर रक्खा। इसी तरह हमने भी अपने जीवन में पाच महाविकार काम, क्रोध, मोह लोभ और अहंकार के बहुत छोटे-छोटे दीए जला रखे हैं, जिसके कारण परमात्मा का चांद बाहर ही खड़ा रह जाता है। जब तक हमारे महाविकार शांत नही होगे तब तक परमात्मा की नजदिकी महशुस नही कर सकते। और तब तक मन शांत नहीं होगा। मन शांत होगा तभी ईश्वर की उपस्थिति महसूस होगी। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
Sagar Saini
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56 minutes ago
#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . भक्ति व साधना राजा बीर सिंह की एक छोटी रानी सुंदरदेई थी। उसने भी परमेश्वर कबीर जी से दीक्षा ले रखी थी। उसने सत्संग बहुत सुने थे। विश्वास कम था, नाम की कमाई यानि साधना नहीं करती थी। जब रानी का अंतिम समय आया तो यम के दूत राजभवन में प्रवेश कर गए। फिर यमदूत रानी के शरीर में प्रवेश कर गए और अंतिम श्वांस का इंतजार करने लगे। उस समय रानी सुंदरदेई के शरीर में बेचैनी हो गई। यमदूत दिखाई देने लगे। राजा ने रानी से पूछा कि क्या बात है? रानी ने कहा कि मुझे राजपाट, महल, आभूषण, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। रानी ने कहा कि साधु-भक्तों को बुलाकर परमात्मा की चर्चा कराओ। साधु तथा भक्त आकर परमात्मा की चर्चा तथा भक्ति करने लगे। उससे कोई लाभ नहीं हुआ। रानी के शरीर में कष्ट और बढ़ गया। अर्ध-अर्ध यानि आधा श्वांस चलने लगा। श्वांस खींच-खींचकर आने-जाने लगा। हृदय कमल को त्यागकर जीव भयभीत होकर त्रिकुटी की ओर भागा। यम दूतों ने चारों ओर से घेर लिया। चारों यमदूतों ने जीव को घेरकर कहा कि आप चलो! हरि ने तुम्हें बुलाया है। तब रानी के जीव को सत्संग वचन याद आए। उसने यमदूतों से कहा कि हे बटपार! हे जालिमों! तुम यहाँ कैसे आ गए? हमारा सतगुरू हमारा मालिक है। आप हमें नहीं ले जा सकते। मेरे सतगुरू धनी ने मुझे नाम दिया है। मेरे गुरूजी आएंगे तो मैं जाऊँगी। यह बात सुनकर यम के दूत बोले कि यदि आपका कोई खसम है तो उसको बुलाओ, नहीं तो हमारे साथ परमात्मा के दरबार में चलो। जीव ने कहा कि :- धरनी आकाश से नगर नियारा। तहाँ निवाजै धनी हमारा।। अगम शब्द जब भाखै नाऊं। तब यम जीव के निकट नहीं आऊं। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो सतगुरू जी सत्संग में ज्ञान सुना रहे हैं, वह सत्य है। वह सोचती थी कि यह केवल कहानी है क्योंकि सब नौकर-नौकरानी आज्ञा मिलते ही दौड़े आते थे। मनमर्जी का खाना खाती थी, सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनती थी। उसने सोचा था कि ऐसे ही आनन्द बना रहेगा। यह तो पूर्व जन्म की बैटरी चार्ज थी। वर्तमान में चार्जर मिला (नाम मिला) तो चालू नहीं किया यानि साधना नहीं की। जब बैटरी की चार्जिंग समाप्त हो जाती है, बैटरी डाउन हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं बंद हो जाती हैं। फिर न पंखा चलता है, न बल्ब जगता है। बटन दबाते रहो, कोई क्रिया नहीं होती। इसी प्रकार जीव का पूर्व जन्म की भक्ति का धन यानि चार्जिंग समाप्त हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं छीन ली जाती हैं। जीव को नरक में डाल दिया जाता है, तब उसको अक्ल आती है। उस समय वक्त हाथ से निकल चुका होता है। केवल पश्चाताप और रोना शेष रह जाता है। रानी सुंदरदेई ने सत्संग सुन रखा था। पूर्ण सतगुरू से दीक्षा ले रखी थी। नाम की कमाई नहीं की थी। वह गुरूद्रोही नहीं हुई थी। गुरू निंदा नहीं करती थी। रानी ने सतगुरू को याद किया कि हे सतगुरू! हे मेरे धनी! मेरे को यमदूतों ने घेर रखा है। मुझ दासी को छुड़ावो। मैंने आपकी दीक्षा ले रखी है। आज मुझे पता चला कि ऐसी आपत्ति में न पति, न पत्नी, ने बेटा-बेटी, भाई-बहन, राजा-प्रजा कोई सहायक नहीं होता। रानी के जीव ने हृदय से सतगुरू को पुकारा। तुरंत सतगुरू कबीर जी वहाँ उपस्थित हुए। रानी ने दौड़कर सतगुरू देव जी के चरण लिए। उसी समय यमदूत भागकर हरि यानि धर्मराज के पास गए और बताया कि उसका सतगुरू आया तो वहाँ पर प्रकाश हो गया। जीव ने सत सुकृत नाम जपा था। उसको इतना ही याद था। इस कारण से उसको यमदूतों से छुड़वाया तथा पुनः जीवन बढ़ाया। तब रानी ने दिल से भक्ति की। फिर सतगुरू कबीर जी ने पुनः सतनाम, सारनाम दिया, उसकी कमाई की। संसार असार दिखाई देने लगा। राज, धन, परिवार पराया दिखाई दे रहा था। जाने का समय निकट लग रहा था। इस कारण से रानी ने तन-मन-धन सतगुरू चरणों में समर्पित करके भक्ति की तो सत्यलोक में गई। वहाँ परमेश्वर (सत्य पुरूष) ने रानी के जीव के सामने अपने ही दूसरे रूप सतगुरू से प्रश्न किया कि हे कडि़हार! (तारणहार) मेरे जीव को यमदूतों ने कैसे रोक लिया? सतगुरू रूप में कबीर जी ने कहा कि हे परमेश्वर! इसने दीक्षा लेकर भक्ति नहीं की। इस कारण से इसको यमदूतों ने घेर लिया था। मैंने छुड़वाया। परमेश्वर कबीर जी ने जीव से कहा कि आपने भक्ति क्यों नहीं की? सत्यलोक में कैसे आ गई? सिर नीचा करके जीव ने कहा कि पहले मुझे विश्वास नहीं था। फिर यमदूतों की यातना देखकर मुझे आपकी याद आई। आपका ज्ञान सत्य लगा। आपको पुकारा। आपने मेरी रक्षा की। फिर मेरे को वापिस जीवन दिया गया। तब मैंने दिलोजान से आपकी भक्ति की। पूर्ण दीक्षा प्राप्त करके आपकी ही कृपा से गुरू जी के सहयोग से मैं यहाँ आपके चरणों में पहुँच पाई हूँ। सत्यलोक में जाकर भक्त अन्य भक्तों के पास भेज दिया जाता है। सुंदर अमर शरीर मिलता है। बहुत बड़ा आवास महल मिलता है। विमान आँगन में खड़ा है। सिद्धियां आदेश का इंतजार करती हैं। तुरंत विद्युत की तरह सक्रिय होती हैं जैसे बिजली का बटन दबाते ही बिजली से चलने वाला यंत्र तुरंत कार्य करने लगता है। ऐसे वहाँ पर वचन का बटन हैं। जो वस्तु चाहिए बोलिये। वस्तु-पदार्थ आपके पास उपस्थित होगा। जैसे भोजन खाने की इच्छा होते ही आपके भोजनस्थल पर गतिविधि प्रारम्भ हो जाएंगी, थाली-गिलास रखे जाएंगे। कुछ देर में खाने की इच्छा बनी तो सिद्धि से उठकर रसोई में रखे जाएंगे। मिनट पश्चात् इच्छा हुई तो भी उसी समय व्यवस्था हो जाएगी। घूमने की इच्छा हुई तो विमान में गतिविधि महसूस होगी। विमान के निकट जाते ही द्वार खुल जाएगा। विमान स्टार्ट हो जाएगा। जहाँ जिस द्वीप में जाने की इच्छा होगी, विचार करने पर विमान उसी ओर उड़ चलेगा। इच्छा करते ही ताजे-ताजे फल वृक्षों से तोड़कर लाकर आपके समक्ष रख दिए जाएंगे। सत्यलोक की नकल यह काल लोक है। इसी तरह स्त्री-पुरूष परिवार हैं। सत्यलोक में दो तरह से संतानों की उत्पत्ति होती है। शब्द से तथा मैथुन से। वह हंस पर निर्भर करता है। वचन से संतानोपत्ति वाला क्षेत्र सतपुरूष के सिंहासन के चारों ओर है। नर-नारी से परिवार वाला क्षेत्र उसके बाद में है। वचन से संतान उत्पन्न करने वाले केवल नर ही उत्पन्न करते हैं। सत्यलोक में वृद्धावस्था नहीं है। नर-नारी वाले क्षेत्र में लड़के तथा लड़कियां दोनों उत्पन्न करते हैं। विवाह करते हैं केवल वचन से। जो बच्चे उत्पन्न होते हैं, वे काल लोक से मुक्त होकर गए जीव जन्म लेते हैं। फिर कभी नहीं मरते, न वृद्ध होते। जो सत्यलोक में मुक्त होकर जाते हैं, उनको सर्वप्रथम सत्यपुरूष जी के दर्शन कराए जाते हैं। उस समय उसका वही स्वरूप रहता है जैसा पृथ्वी से आता है, परंतु वृद्ध नीचे से गया तो वहाँ सतपुरूष के सामने उसी अवस्था व स्वरूप में जाता है। उसका प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश जितना हो जाता है। उसके पश्चात् उसको उस स्थान पर भेजा जाता है जो सबसे भिन्न है। वहाँ जाते ही उसका स्वरूप तो वैसा ही रहता है, लेकिन उसके शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों जैसा हो जाता है, परंतु यदि वृद्ध नीचे से गया है तो युवा अवस्था हो जाती है। जवान है तो जवान ही रहता है, बालक है तो बालक ही रहता है। वहाँ पर कुछ को सत्य पुरूष के वचन से स्त्री-पुरूष का शरीर मिलता है। कुछ बीज रूप में सतपुरूष द्वारा बनाए जाते हैं जिनका फिर एक बार किसी के घर सत्यलोक में जन्म होगा, परिवार बनेगा। उस स्थान पर वे हंस एक बार जन्म लेंगे जो काल लोक तथा अक्षर लोक से मुक्त होकर जाते हैं। एकान्त स्थान पर रखे जाते हैं। वे दोनों क्षेत्रों में जन्म लेते हैं। (वचन से उत्पन्न होने वाले तथा स्त्री-पुरूष से जन्म लेने वाले में) स्त्री-पुरूष से उत्पत्ति की औसत अधिक होती है। यह औसत 10-90 होती है। यह 10ः वचन से उत्पत्ति, 90ः विवाह रीति से उत्पत्ति होती है। सत्यलोक में स्त्री तथा नर के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। मीनी सतलोक, मानसरोवर पहले हैं। वहाँ दोनों के शरीर का प्रकाश चार सूर्यों के समान होता है। फिर आगे जाते हैं। जब परब्रह्म के लोक में बने अष्ट कमल के पास पहुँचते हैं तो हंस तथा हंसनी यानि नर-नारी के शरीर का प्रकाश 12 सूर्यों के प्रकाश के समान हो जाता है। फिर सत्यलोक में बनी भंवर गुफा में प्रत्येक के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के समान हो जाता है। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप