जिस सनातन धर्म ने पूरी दुनिया को 'मर्यादा' और 'सम्मान' सिखाया, आज उसी धर्म के सर्वोच्च पद 'शंकराचार्य' के साथ अभद्र व्यवहार होते देखना हृदयविदारक है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदि गुरु शंकराचार्य की उस महान परंपरा के ध्वजवाहक हैं, जिसने भारत को एक सूत्र में पिरोया है।
क्या राजनीतिक विचारधाराएं इतनी बड़ी हो गई हैं कि हम 'गुरु-परंपरा' का अपमान करने लगे हैं?
क्या शास्त्रों और धर्म की रक्षा करने वाले संतों को सड़क पर इस तरह के व्यवहार का सामना करना चाहिए?
मौन रहना भी सहभागिता है। यदि आज हम अपने शंकराचार्य के सम्मान में खड़े नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी को हम क्या विरासत देंगे?
हम इस दुर्व्यवहार का पुरजोर विरोध करते हैं। मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन मर्यादा का उल्लंघन अक्षम्य है। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन धर्म और धर्मदंड अटल हैं।
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