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कुछ शब्द बोलने के लिए नहीं होते,
वे केवल महसूस किए जाने के लिए जन्म लेते हैं। "अनामिका" ऐसा ही एक शब्द है
जो नाम से अधिक एक भाव है,
और स्पर्श से अधिक एक संयम।
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अनामिका वह उंगली है जिसे भाषा ने नाम तो दिया,
पर जीवन ने अर्थ।
यह न तर्जनी है जो आदेश देती है,
न मध्यमा जो विद्रोह का संकेत बने;
न अंगूठा जो स्वीकृति या अस्वीकृति जताए,
और न ही कनिष्ठा जो बचपन की कसमें बाँधती है।
अनामिका चुप रहती है और शायद इसी कारण हृदय के सबसे निकट मानी जाती है।
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भारतीय परंपरा में कहा गया कि इसी उंगली से हृदय तक जाने वाली नाड़ी जुड़ी है। सत्य हो या प्रतीक, भावना में यह विश्वास अनामिका को पवित्र बना देता है।
यह वही उंगली है जहाँ वचन का छल्ला पहना जाता है
प्रेम का नहीं…उत्तरदायित्व का।
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अनामिका का स्पर्श कभी अधिकार नहीं माँगता,
वह केवल उपस्थिति दर्ज कराता है। यह वह मिलन है जहाँ निकटता है, पर अतिक्रमण नहीं। जहाँ अपनापन है, पर आग्रह नहीं।
आज के समय में जहाँ स्पर्श अक्सर जल्दबाज़ी में होता है, अनामिका हमें ठहरना सिखाती है।
वह कहती है— पास आओ, पर स्वयं को खोए बिना।
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"अनामिका मिलन" दरअसल दो आत्माओं का ऐसा संवाद है जिसमें शरीर केवल माध्यम होता है, उद्देश्य नहीं। यह आलिंगन का शुद्धतम रूप है
जहाँ बाँहें नहीं, मर्यादा एक-दूसरे को घेरती है।
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ऐसे संबंध दिखावे के नहीं होते, वे शोर नहीं करते।
वे चुपचाप जीवन में टिक जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे अनामिका हथेली में रहते हुए भी कभी स्वयं को प्रमुख नहीं बनाती।
शायद इसी कारण कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
वे केवल समझ चाहते हैं। अनामिका उन्हें ही समर्पित है उन भावों को जो कहे बिना समझे जाते हैं,
और छुए बिना महसूस होते हैं।
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अनामिका हमें यह सिखाती है कि
हर निकटता स्वामित्व नहीं होती,
और हर स्पर्श कामना से जन्मा हो, यह आवश्यक नहीं।
कुछ स्पर्श केवल यह कहने के लिए होते हैं
मैं हूँ…और तुम्हारी मर्यादा में हूँ।
यही अनामिका का दर्शन है।