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11 घंटे पहले
#SpiritualLeaderSaintRampalJi #tattvdarshisantrampalji #GreatestGuru_InTheWorld #TrueGuruSantRampalJi #SaintRampalJiMaharaj #SantRampalJiMaharaj #AlmightyGodKabir #MustListen_Satsang Sadhna TV Satsang ।। 07-03-2026 ।। Episode : 3555 ।। Sant Rampal Ji Maharaj Live Satsang https://youtube.com/live/_6J8FIexsoA?si=yc5_8Gl99D98pId7 #✝चर्च #🕌मस्जिद 🤲 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇
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12 घंटे पहले
आध्यात्मिक ज्ञान गंगा पार्ट 71 के आगे पढ़िए .....) 📖📖📖📖📖 आध्यात्मिक ज्ञान गंगा पार्ट - 72 पृष्ठ: 251- 255 "द्वापर युग में इन्द्रमति को शरण में लेना” द्वापरयुग में चन्द्रविजय नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी इन्द्रमति बहुत ही धार्मिक प्रवृति की औरत थी। संत-महात्माओं का बहुत आदर किया करती थी। उसने एक गुरुदेव भी बना रखा था। उनके गुरुदेव ने बताया था कि बेटी साधु-संतों की सेवा करनी चाहिए। संतों को भोजन खिलाने से बहुत लाभ होता है। एकादशी का व्रत, मन्त्र के जाप आदि साधनायें जो गुरुदेव ने बताई थी। उस भगवत् भक्ति में रानी बहुत दृढ़ता से लगी हुई थी। गुरुदेव ने बताया था कि संतों को भोजन खिलाया करेगी तो तू आगे भी रानी बन जाएगी और तुझे स्वर्ग प्राप्ति होगी। रानी ने सोचा कि प्रतिदिन एक संत को भोजन अवश्य खिलाया करूँगी। उसने यह प्रतिज्ञा मन में ठान ली कि मैं खाना बाद में खाया करूँगी, पहले संत को खिलाया करूँगी। इससे मुझे याद बनी रहेगी, कहीं मुझे - भूल न पड़ जाये। रानी प्रतिदिन पहले एक संत को भोजन खिलाती फिर स्वयं खाती। वर्षों तक ये क्रम चलता रहा। एक समय हरिद्वार में कुम्भ के मेले का संयोग हुआ। जितने भी त्रिगुण माया के उपासक संत थे सभी गंगा में स्नान के लिए (परभी लेने के लिए) प्रस्थान कर गये। इस कारण से कई दिन रानी को भोजन कराने के लिए कोई संत नहीं मिला। रानी इन्द्रमति ने स्वयं भी भोजन नहीं किया। चौथे दिन अपनी बांदी से कहा कि बांदी देख ले कोई संत मिल जाए तो, नहीं तो आज तेरी रानी जीवित नहीं रहेगी। आज चाहे मेरे प्राण निकल जाएँगे परन्तु मैं खाना नहीं खाऊँगी। वह दीन दयाल कबीर परमेश्वर अपने पूर्व वाले भक्त को शरण में लेने के लिए न जाने क्या कारण बना देता है? बांदी ने ऊपर अटारी पर चढ़कर देखा कि सामने से सफेद कपड़े पहने एक संत आ रहा था। द्वापर युग में परमेश्वर कबीर करूणामय नाम से आये थे। बांदी नीचे आई और रानी से कहा कि एक व्यक्ति है जो साधु जैसा नजर आता है। रानी ने कहा कि जल्दी से बुला ला। बांदी महल से बाहर गई तथा प्रार्थना की कि साहेब आपको हमारी रानी ने याद किया है। करूणामय साहेब ने कहा कि रानी ने मुझे क्यों याद किया है, मेरा और रानी का क्या सम्बन्ध? नौकरानी ने सारी बात बताई। करूणामय (कबीर) साहेब ने कहा कि रानी को आवश्यकता पड़े तो यहाँ आ जाए, मैं यहाँ खड़ा हूँ। तू बांदी और वह रानी। मैं वहाँ जाऊँ और यदि वह कह दे कि तुझे किसने बुलाया था या उसका राजा ही कुछ कह दे और बेटी संतों का अनादर बहुत पापदायक होता है। बांदी फिर वापिस आई और रानी से सब वार्ता कह सुनाई। तब रानी ने कहा कि बांदी मेरा हाथ पकड़ और चल। जाते ही रानी ने दण्डवत् प्रणाम करके प्रार्थना की कि हे परवरदिगार! चाहती तो ये हूँ कि आपको कंधे पर बैठा लूं। करूणामय साहेब ने कहा बेटी! मैं यही देखना चाहता था कि तेरे में कोई श्रद्धा भी है या वैसे ही भूखी मर रही है। रानी ने अपने हाथों खाना बनाया। करूणामय रूप में आए कविर्देव ने कहा कि मैं खाना नहीं खाता। मेरा शरीर खाना खाने का नहीं है। तो रानी ने कहा कि मैं भी खाना नहीं खाऊँगी। करूणामय साहेब जी ने कहा कि ठीक है बेटी लाओ खाना खाते हैं, क्योंकि समर्थ उसी को कहते हैं जो, जो चाहे, सो करे। करूणामय साहेब ने खाना खा लिया, फिर रानी से पूछा कि जो यह तू साधना कर रही है यह तेरे को किसने बताई है? रानी ने कहा कि मेरे गुरुदेव ने आदेश दिया है? कबीर साहेब ने पूछा क्या आदेश दिया है तेरे गुरुदेव ने? इन्द्रमती ने कहा कि विष्णु महेश की पूजा, एकादशी का व्रत, तीर्थ भ्रमण, देवी पूजा, श्राद्ध निकालना, मन्दिर में जाना, संतों की सेवा करना। करूणामय (कबीर) साहेब ने कहा कि जो साधना तेरे गुरुदेव ने दी है तेरे को जन्म और मृत्यु तथा स्वर्ग-नरक व चौरासी लाख योनियों के कष्ट से मुक्ति प्रदान नहीं करा सकती। रानी ने कहा कि महाराज जी जितने भी संत हैं, अपनी-अपनी प्रभुता आप ही बनाने आते हैं। मेरे गुरुदेव के बारे में कुछ नहीं कहोगे। मैं चाहे मुक्त होऊँ या न होऊँ। करूणामय (कबीर) साहेब ने सोचा कि इस भोले जीव को कैसे समझाऐं? इन्होंने जो पूंछ पकड़ ली उसको छोड़ नहीं सकते, मर सकते हैं। करूणामय साहेब ने कहा कि बेटी वैसे तो तेरी ईच्छा है, मैं निंदा नहीं कर रहा। क्या मैंने आपके गुरुदेव को गाली दी है या कोई बुरा कहा है? मैं तो भक्तिमार्ग बता रहा हूँ कि यह भक्ति शास्त्र विरुद्ध है। तुझे पार नहीं होने देगी और न ही तेरा कोई आने वाला कर्म दण्ड कटेगा और सुन ले आज से तीसरे दिन तेरी मृत्यु हो जाएगी। न तेरा गुरु बचा सकेगा और न तेरी यह नकली साधना बचा सकेगी। (जब मरने की बारी आती है फिर जीव को डर लगता है। वैसे तो नहीं मानता) रानी ने सोचा कि संत झूठ नहीं बोलते। कहीं ऐसा न हो कि मैं तीसरे दिन ही मर जाऊँ। इस डर से करूणामय साहेब से पूछा कि साहेब क्या मेरी जान बच सकती है? कबीर साहेब (करूणामय) ने कहा कि बच सकती है। अगर तू मेरे से उपदेश लेगी, मेरी शिष्या बनेगी, पिछली पूजाएँ त्यागेगी, तब तेरी जान बचेगी। इन्द्रमति ने कहा मैंने सुना है कि गुरुदेव नहीं बदलना चाहिए, पाप लगता है। कबीर साहेब (करुणामय) ने कहा कि नहीं पुत्री यह भी तेरा भ्रम है। एक वैद्य (डाक्टर) से औषधी न लगे तो क्या दूसरे से नहीं लेते? एक पाँचवीं कक्षा का अध्यापक होता है। फिर एक उच्च कक्षा का अध्यापक होता है। बेटी अगली कक्षा में जाना होगा। क्या सारी उम्र पाँचवीं कक्षा में ही लगी रहेगी। इसको छोड़ना पड़ेगा। तू अब आगे की पड़ाई पढ़, मैं पढ़ाने आया हूँ। वैसे तो नहीं मानती परन्तु मृत्यु दिखने लगी कि संत कह रहा है तो कहीं बात न बिगड़ जाए। ऐसा विचार करके इन्द्रमति ने कहा कि जैसे आप कहोगे मैं वैसे ही करूँगी। करूणामय (कबीर) साहेब ने उपदेश दिया। कहा कि तीसरे दिन मेरे रूप में काल आयेगा, तू उससे बोलना मत। जो मैंने नाम दिया है दो मिनट तक इसका जाप करना। दो मिनट के बाद उसको देखना है। उसके बाद सत्कार करना है। वैसे तो गुरुदेव आए तो अति शीघ्र चरणों में गिर जाना चाहिए। ये मेरा केवल इस बार आदेश है। रानी ने कहा ठीक है जी। रानी को तो चिंता बनी हुई थी। श्रद्धा से जाप कर रही थी। (कबीर साहेब) करूणामय साहेब का रूप बना कर गुरुदेव रूप में काल आया, आवाज लगाई इन्द्रमति, इन्द्रमति। उसको तो पहले ही डर था, स्मरण करती रही। काल की तरफ नहीं देखा। दो मिनट के बाद जब देखा तो काल का स्वरूप बदल गया। काल का ज्यों का त्यों चेहरा दिखाई देने लगा। करूणामय साहेब का स्वरूप नहीं रहा। जब काल ने देखा कि तेरा तो स्वरूप बदल गया। वह जान गया कि इसके पास कोई शक्ति युक्त मंत्र है। यह कहकर चला गया कि तुझे फिर देखूँगा। अब तो बच गई। रानी बहुत खुश हुई, फूली नहीं समाई। कभी अपनी बांदियों को कहने लगी कि मेरी मृत्यु होनी थी, मेरे गुरुदेव ने मुझे बचा दिया। राजा के पास गई तथा कहा कि आज मेरी मृत्यु होनी थी, मेरे गुरुदेव ने रक्षा कर दी। मुझे लेने के लिए काल आया था। राजा ने कहा कि तू ऐसे ही ड्रामें करती रहती है, काल आता तो क्या तुझे छोड़ जाता? ये संत वैसे बहका देते हैं। अब इस बात को वह कैसे माने? खुशी-खुशी में रानी लेट गई। कुछ देर के बाद सर्प बनकर काल फिर आया और रानी को डस लिया। ज्यों ही सर्प ने डसा रानी को पता चल गया। रानी जोर से चिल्लाई। मुझे साँप ने डंस लिया। नौकर भागे। देखते ही देखते एक मोरी (पानी निकलने का छोटा छिद्र) में से वह सर्प घर से बाहर निकल गया। अपने गुरुदेव को पुकार कर रानी बेहोश हो गई। करूणामय (कबीर) साहेब वहाँ प्रकट हो गए। लोगों को दिखाने के लिए मंत्र बोला और (वे तो बिना मंत्र भी जीवित कर सकते हैं, किसी जंत्र-मंत्र की आवश्यकता नहीं) इन्द्रमती को जीवित कर दिया। रानी ने बड़ा शुक्र मनाया कि हे बंदी छोड़ !यदि आज आपकी शरण में नहीं होती तो मेरी मृत्यु हो जाती। साहेब ने कहा कि इन्द्रमति इस काल को मैं तेरे घर में घुसने भी नहीं देता और यह तेरे ऊपर यह हमला भी नहीं करता। परन्तु तुझे विश्वास नहीं होता। तू यह सोचती कि मेरे ऊपर कोई आपत्ति नहीं आनी थी। गुरुजी ने मुझे बहका कर नाम दे दिया। इसलिए तेरे को थोड़ा-सा झटका दिखाया है, नहीं तो बेटी तेरे को विश्वास नहीं होता। धर्मदास यहाँ घना अंधेरा , बिन परचय जीव जम का चेरा ।। कबीर साहेब (करूणामय) ने कहा कि अब जब मैं चाहूँगा, तब तेरी मृत्यु होगी। गरीबदास जी कहते हैं कि:- गरीब, काल डरे करतार से, जय जय जय जगदीश । जौरा जौरी झाड़ती ,पग रज डारे शीश ।। यह काल, कबीर परमेश्वर से डरता है और यह मौत कबीर साहेब के जूते झाड़ती है अर्थात् नौकर तुल्य है। फिर उस धूल को अपने सिर पर लगाती है कि आप जिसको मारने का आदेश दोगे उसके पास जाऊँगी, नहीं मैं नहीं जाऊँगी। गरीब,काल जो पीसे पीसना,जौरा है पनिहार । ये दो असल मजूर हैं, मेरे साहेब के दरबार ।। यह काल जो यहाँ का 21 ब्रह्मण्ड का भगवान ( ब्रह्म) है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पिता है। ये तो मेरे कबीर साहेब का आटा पीसता है अर्थात पक्का नौकर है और जौरा (मौत) मेरे कबीर साहेब का पानी भरती है अर्थात् एक विशेष नौकरानी है। यह दो असल मजूर मेरे साहेब के दरबार में हैं। कुछ दिनों के बाद करुणामय (कबीर जी) साहेब फिर आए। रानी इन्द्रमति को सतनाम प्रदान किया। फिर कुछ समय के उपरान्त करूणामय साहेब ने रानी इन्दमति की अति श्रद्धा देखकर सारनाम दिया। शब्द की उपलब्धि करवाई। परमेश्वर करूणामय रूप से रानी के घर दर्शन देने जाते रहते थे तो इन्द्रमति प्रार्थना किया करती थी कि मेरे पति राजा को समझाओ मालिक, वह भी मान जाये। आपके चरणों में आ जाये तो मेरा जीवन सफल हो जाये। चन्द्रविजय से कबीर साहेब ने प्रार्थना की कि चन्द्रविजय आप भी नाम लो, यह दो दिन का राज और ठाठ है। फिर चौरासी लाख योनियों में प्राणी चला जाएगा। चन्द्रविजय ने कहा कि भगवन मैं तो नाम लूं नहीं और आपकी शिष्या को मना करूँ नहीं, चाहे सारे खजाने को ही दान करो, चाहे किसी प्रकार का सत्संग करवाओ, मैं मना नहीं करूंगा। कबीर साहेब (करूणामय) ने पूछा आप नाम क्यों नहीं लोगे ? चन्द्रविजय राजा ने कहा कि मैंने तो बड़े-बड़े राजाओं की पार्टियों में जाना पड़ता है। करुणामय (कबीर साहेब) ने कहा कि पार्टियों में जाने में नाम क्या बाधा करेगा? सभा में जाओ, वहीं काजू खाओ, दूध पी लो, शरबत (जूस) पी लो, शराब मत प्रयोग करो। शराब पीना महापाप है। परन्तु राजा नहीं माना। रानी की प्रार्थना पर करुणामय (कबीर) साहेब ने राजा को फिर समझाया कि नाम के बिना ये जीवन ऐसे ही व्यर्थ हो जायेगा। आप नाम ले लो। राजा ने फिर कहा कि गुरु जी मुझे नाम के लिए मत कहना। आपकी शिष्या को मैं मना नहीं करूँगा। चाहे कितना दान करे, कितना सत्संग करवाए। साहेब ने कहा कि बेटी इस दो दिन के सुख को देखकर इसकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है। तू प्रभु के चरणों में लगी रह। अपना आत्मकल्याण करवा। यहाँ कोई किसी का पति नहीं, कोई किसी की पत्नी नहीं। दो दिन का सम्बन्ध है। अपना कर्म बना बेटी। जब इन्द्रमति 80 वर्ष की वृद्धा हुई (कहां 40 साल की उम्र में मर जाना था)। जब शरीर भी हिलने लगा, तब करूणामय साहेब बोले अब बोल इन्द्रमति क्या चाहती है? चलना चाहती है सतलोक? इन्द्रमति ने कहा कि प्रभु तैयार हूँ बिल्कुल तैयार हूँ दाता! करुणामय साहेब ने कहा कि तेरी पोते या पोती या किसी अन्य सदस्य में कोई ममता तो नहीं है? रानी ने कहा बिल्कुल नहीं साहेब। आपने ज्ञान ही ऐसा निर्मल दे दिया। इस गंदे लोक की क्या इच्छा करूँ? कबीर साहेब (करूणामय) जी ने कहा कि चल बेटी। रानी प्राण त्याग गई। परमेश्वर कबीर जी (करूणामय) रानी इन्द्रमती की आत्मा को ऊपर ले गए। इसी ब्रह्मण्ड में एक मानसरोवर है। उस मान सरोवर में इस आत्मा को स्नान कराना होता है। इन्द्रमति को वहाँ पर कुछ समय तक रखा। करूणामय रूप में कबीर परमेश्वर जी ने रानी से पूछा कि तेरी कुछ इच्छा तो नहीं यदि इच्छा रही तो दुबारा जन्म लेना पड़ेगा। यदि मन में सन्तान व सम्पत्ति या पति, पत्नी आदि की इच्छा थोड़ी सी भी रह गई तो सतलोक नहीं जा सकती। इन्द्रमति ने कहा साहेब आप तो अंतर्यामी हो, कोई इच्छा नहीं है। आपके चरणों की इच्छा है। लेकिन एक मन में शंका बनी हुई है कि मेरा जो पति था, उसने मुझे किसी भी धार्मिक कर्म के लिए कभी मना नहीं किया। नहीं तो आजकल के पति अपनी पत्नियों को बाधा कर देते हैं। यदि वह मुझे मना कर देता तो मैं आपके चरणों में नहीं लग पाती। मेरा कल्याण नहीं होता। उसका इस शुभ कर्म में सहयोग का कुछ लाभ मिलता हो तो कभी उस पर भी दया करना दाता। करूणामय जी ने देखा कि यह नादान इसके पीछे फिर अटक गई। साहेब बोले ठीक है बेटी, अभी तू दो चार वर्ष यहाँ रह। अब दो वर्ष के बाद राजा भी मरने लगा। क्योंकि नाम ले नहीं रखा था। यम के दूत आए। राजा चौक में चक्कर खाकर गिर गया। यम के दूतों ने उसकी गर्दन को दबाया। राजा की टट्टी ओर पेशाब निकल गया। करूणायम (कबीर) परमेश्वर ने रानी को कहा कि देख तेरे राजा की क्या हालत हो रही है? वहाँ से कबीर परमेश्वर दिखा रहे है। तब रानी ने कहा कि देख लो दाता यदि उसका भक्ति में सहयोग का कोई फल बनता हो तो दया कर लो। रानी को फिर भी थोड़ी-सी ममता बनी थी। परमेश्वर कबीर (करूणामय) ने सोचा की यह फिर काल जाल में फंसेगी। यह सोचकर मानसरोवर से वहाँ गए जहाँ राजा चन्द्रविजय अपने महल में अचेत पड़ा था। यमदूत उसके प्राण निकाल रहे थे। कबीर परमेश्वर जी के आते ही यमदूत ऐसे आकाश में उड़ गए जैसे मुर्दे से गिद्ध उड़ जाते हैं। चन्द्रविजय होश में आ गया। सामने करूणामय रूप में परमेश्वर कबीर जी खड़े थे। केवल चन्द्रविजय को दिखाई दे रहे थे, किसी अन्य को दिखाई नहीं दे रहे थे। चन्द्रविजय चरणों में गिर कर याचना करने लगा मुझे क्षमा कर दो दाता, मेरी जान बचाओ। क्योंकि उसने देखा कि तेरी जान जाने वाली है। (जब इस जीव की आँख खुलती है कि यह तो बात बिगड़ गई) राजा चन्द्र विजय गिड़गिड़ाता हुआ बोला मुझे क्षमा कर दो दाता, मेरी जान बचा लो मालिक। कबीर परमेश्वर ने कहा राजा आज भी यही बात है, उस दिन भी वही बात थी, नाम लेना होगा। राजा ने कहा मैं नाम ले लूँगा जी, अभी ले लूँगा नाम। कबीर परमेश्वर ने नाम उपदेश दिया तथा कहा कि अब मैं तुझे दो वर्ष की आयु दूँगा, यदि इसमें एक स्वांस भी खाली चला गया तो फिर कर्मदण्ड रह जाएगा । कबीर, जीवन तो थोड़ा भला, जै सत सुमरण हो। लाख वर्ष का जीवना, लेखे धरे ना को।। शुभ कर्म में सहयोग दिया हुआ पिछला कर्म और साथ में श्रद्धा से दो वर्ष के स्मरण से तथा तीनों नाम प्रदान करके कबीर साहेब चन्द्रविजय को भी पार कर ले गये। बोलो सतगुरु देव की जय "जय बन्दी छोड़ । " प्रश्नः धर्मदास जी ने कहा हे कबीर परमेश्वर! हमारे को तो ब्राह्मणों (विद्वानों) ने यही बताया था कि पाण्डवों की अश्वमेघ यज्ञ को श्री कृष्ण भक्त सुदर्शन सुपच ने सफल की थी तथा भगवान कृष्ण जी ने गीता में कहा है कि अर्जुन ! युद्ध कर तुझे कोई पाप नहीं लगेगा। ये सर्व योद्धा मेरे द्वारा पहले से मार दिए गए हैं। तू निमित्त मात्र बन जा। यदि तू युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग जाएगा, यदि युद्ध में जीत गया तो पृथ्वी के राज्य का सुख भोगेगा। उत्तरः- कबीर परमेश्वर ने कहा धर्मदास! श्री मद्भगवत् गीता का ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नहीं कहा। श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत् प्रवेश करके काल ब्रह्म ने कहा था (कृप्या पाठक जन पढ़ें "गीता का ज्ञान किसने कहा?" इसी पुस्तक (अध्यात्मिक ज्ञान गंगा) के पृष्ठ 3 से 10) सुदर्शन सुपच श्री कृष्ण भक्त नहीं था वह पूर्ण ब्रह्म का उपासक था। सुन पाण्डवों के यज्ञ के सम्पूर्ण होने की कथा। कृप्या निम्न पढ़ें पाठक जन परमेश्वर कबीर जी द्वारा बताया पाण्डव यज्ञ का प्रकरण जो धर्मदास जी ने स्वसम वेद के पद्य भाग में लिखा है (लेखक के शब्दों में निम्नः-) ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं। https://online.jagatgururampalji.org/naam-diksha-inquiry #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕌मस्जिद 🤲 #✝चर्च
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501 ने देखा
12 घंटे पहले
Hazrat Dawood holds a significant place in both Islam and Christianity as the recipient of the sacred scripture Zabur and as a respected prophet among the Israelites too. Yet the deeper spiritual meaning behind the revelation of Zabur remains largely misunderstood. Baakhabar Sant Rampal Ji Maharaj decodes the hidden spiritual knowledge described in holy texts, revealing that the entity who orated several religious scriptures is not the Supreme God. Understanding the true story of Hazrat Dawood therefore opens the door to an important spiritual realization about the real Creator and the path that leads to ultimate liberation: https://bit.ly/4un0UJt #✝चर्च #🕌मस्जिद 🤲 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏
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12 घंटे पहले
#SpiritualLeaderSaintRampalJi #tattvdarshisantrampalji #TrueGuruSantRampalJi #GreatestGuru_InTheWorld #SaintRampalJiMaharaj #SantRampalJiMaharaj #AlmightyGodKabir #MustListen_Satsang समुद्र का जल लोटे से कम नहीं होता। Sant Rampal Ji Maharaj https://www.facebook.com/share/r/16Z1MX1Tm1/ #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕌मस्जिद 🤲 #✝चर्च
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16 घंटे पहले
Part-1 | डॉ भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल (बुद्धम शरणं गच्छामि) - संत रामपाल जी महाराज _______ Description Links : V01 ▶     • रविदासिया धर्म क्या है...  ​ V02 ▶     • बौद्ध धर्म | बौद्ध धर्...  ​ V03 ▶     • Gorakhnath Story 2D An...  ​ V04 ▶     • में भगवान को नहीं मानत...  ​ V05 ▶     • संत गुरु रविदास जन्म स...  ​ V06 ▶     • ईश्वर ने संसार की रचना...  ​ V07 ▶     • क्या डॉ. आंबेडकर विपश्...  ​ V08 ▶     • जानिए... डाॅ. अम्बेडकर...  ​ V09 ▶     • अगला जन्म या पूर्व जन्...  ​ VO10 ▶     • बौद्ध भिक्षु भदन्त महा...  ​ VO11 ▶    • Buddhist monk exposed ...  ​ VO12 ▶    • जानिए! हीनयान और महाया...  ​ VO13 ▶    • क्या बुद्ध पुनर्जन्म म...  ​ VO14 ▶    • History of Buddhism : ...  ​ VO15 ▶    • History Of Bauddha Dha...  ​a VO16 ▶    • Ep : 2 | Introduction ...  ​ VO17 ▶    • गौतम बुद्ध💫 की ये कहान...  ​ ___________________________ Connect with us on Social Media :- Official Website: https://www.factfuldeb...​ Youtube:     / @factfuldebates  ​ Facebook:    / factfuldebatesofficial  ​ Instagram:    / factfuldebate  ​ X (Twitter):    / factfuldebates  ​ _____________________ Any issue or Feedback :- contact@factfuldebates.com _____________________ 📜 Copyright Disclaimer (US & India): This video may contain copyrighted material, the use of which has not always been specifically authorized by the copyright owner. However, such usage is permitted under the Fair Use doctrine, as outlined in: 🔹 Section 107 of the U.S. Copyright Act, which allows limited use of copyrighted material for purposes such as criticism, commentary, news reporting, education, scholarship, and research. 🔹 Section 52 of the Indian Copyright Act, 1957, which permits the use of copyrighted work for fair dealing including criticism, review, reporting current events, and educational purposes. This video has been created with the intent to educate, inform, and promote awareness through transformative and non-commercial use. We respect all original content creators and do not intend to violate any copyrights. All rights to original content remain with their respective owners. #SantRampalJiMaharaj​ #DrBRAmbedkar​ #BuddhamSharanamGachchhami​ #Ambedkar​ #SpiritualKnowledge​ #SatlokAshram​ #SantRampalJiSatsang​ https://youtube.com/watch?v=EQnS3JDIok8&si=JJihVEysBOMc1OBP #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕌मस्जिद 🤲 #✝चर्च
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569 ने देखा
21 घंटे पहले
#किसान_मसीहा_संतरामपालजी हिसार के खरड़ गाँव में जहां 10 फुट बाढ़ का पानी था, आज वहां गेहूं लहरा रही है। किसान बोले-"अगर संत रामपाल जी महाराज मदद न करते, तो हमारी फसल और जिंदगी दोनों बर्बाद हो जाती।" #🙏गुरु महिमा😇 #✝चर्च #🕌मस्जिद 🤲 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏
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382 ने देखा
21 घंटे पहले
#किसान_मसीहा_संतरामपालजी जहाँ 10 साल से 500 एकड़ जमीन 'समुद्र' बनी थी, वहाँ संत रामपाल जी महाराज की 10,000 फुट पाइप और शक्तिशाली मोटरों की मदद से आज ₹2.5 करोड़ की गेहूं की फसल लहलहा रही है। यह केवल राहत नहीं, बल्कि उजड़ते हुए परिवारों को मिला एक नया जीवन है। SA News Channel YT #🙏गुरु महिमा😇 #✝चर्च #🕌मस्जिद 🤲 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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521 ने देखा
21 घंटे पहले
#किसान_मसीहा_संतरामपालजी जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए और पलवल का घुघेरा गाँव 3 फुट गहरे पानी में डूबा हुआ था, तब संत रामपाल जी महाराज मसीहा बनकर आए। जहाँ महीनों से कीचड़ और बदबू का राज था, वहाँ संत जी द्वारा भेजी गई मदद से आज गेहूं की फसल लहलहा रही है। SA News Channel YT #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕌मस्जिद 🤲 #✝चर्च #🙏गुरु महिमा😇
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