सुर्य तथा पृथ्वी की गति के आधार पर एक वर्ष या संवत्सर को दो भागों में बांटा गया है।1-उत्तरायण या आदान काल,2- दक्षिणायन या विसर्ग काल।
यहां आदान-प्रदान के आधार पर नामकरण किया गया था और आदान का अर्थ लेना व विसर्ग यानी देना प्रदान करना ही समझा जा सकता है। मतलब आदान काल में सुर्य की किरणें क्रमशः तीव्र होकर अग्नि सुर्य (पित्त+वात) तत्व की प्रधानता का काल होने से हवाएं वायुमंडल गर्म होता जाता है जिससे पृथ्वी पर रस पदार्थ का अवशोषण (खिंचाव=आदान) अधिक होने से सभी जीवों वनस्पतियों में क्रमशः बल शक्ति व पाचकाग्नि की कमी होती है जबकि विसर्ग काल में चंद्र और जल {कफ) तत्व की मजबूती से सभी को बल जठराग्नि तथा रस पदार्थ का लाभ होता है। रोहिणी नक्षत्र नवतपा खत्म होने, टिटहरी के बच्चे जवान हो, गंगा दशहरा के साथ ही मानसूनी हवाएं वायुमंडल में ठंडक देना शुरू कर देती है जिससे मृगशिरा नक्षत्र
#🌞 Good Morning🌞 #🙏सुविचार📿 #☝अनमोल ज्ञान #Suvichar #anmol gyan में ठंडी हवा आती है तो फालतू झाड़ पेड़ की शाखाएं हटा लें व बारिश,आंधी तेज हो सकती है उसके पुर्व के सभी कार्य कर लीजिए।🙏🏻 सागर सिमरोल