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Sagar Singh
@289352822
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Sagar Singh
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23 days ago
वैसे तो सभी को बचपन में जो अंग और खून कुदरती मिलता है वह स्वस्थ मजबूत सकुशल सक्रिय होता है खून पतला रहता है अब उम्र बढ़ती है वैसे वैसे ऊर्जा शक्ति बंटवारे में फंसती है खून गाढ़ा और चाल रक्त संचार रक्तचाप गति कम होने लगती है अंग धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं।मलों की उत्सर्जन क्रिया कम होने लगती है फिर शुरू होता है "*" सर्वेषाम् रोगाणाम् निदानम् कूपिता मला: ।"*" चरक संहिता और सुश्रुत संहिता बाग्भट संहिता तथा अष्टांगहृदय स्थान निदान अध्याय में इसका वर्णन किया है। हालांकि 1980 तक भारत में गलत खानपान दिनचर्या जीवनशैली के Life style diseases के केस न के बराबर थे लेकिन अब आज महज 40-45 साल में ही उतना बड़ा परिवर्तन हो गया जो मुगल काल में, ब्रिटिश हुकूमत में भी नहीं हुआ गोवंश व स्त्री मर्यादा अनुशासन का पतन 1980 के बाद तेज हुआ साथ ही साथ मानसिक प्रदुषण तनाव, पर्यावरण प्रदुषण, सामाजिक नियमों में बदलाव, भारतीय संस्कृति संस्कार आचरण व्यवहार में बदलाव हालात यह है कि भारत तेजी से वर्णसंकर हो रहा है मनुष्य में मिलावट हाइब्रिड बीज आ गया है । मैं नहीं तुलसीदास जी ने कहा "*" भये वर्णसंकर सब लोगा।"*" श्री रामचरितमानस फिर "*" लोभहिं ओढहीं लोभहिं डासन।शिश्नोदर पर जमपुर त्रासन।"*"यहां "*"शिश्न+उदर "*" कलियुग में पुरुष मुत्रेन्द्रिय पर व पेट पर यमलोक से अधिक त्रास होगा। "*" कलिकाल बिहाल किये मनुजा। नहीं मानत क्वो अनुजा तनुजा।।"*"भाई की बेटी बेटे की बेटी से भी मनुष्य कामक्रीड़ा करेंगे 🙏🏻 #🙏सुविचार📿 #☝आज का ज्ञान #MOTIVATIONAL #satya vachan #Suvichar
Sagar Singh
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27 days ago
एक चिपचिपा सा गोंद जैसा कफयुक्त बलगम जैसा तत्व शरीर में बनता है वही विकृत अवस्था में बेड कोलेस्ट्रॉल बनकर हृदय फेफड़े और नस नाड़ियों परिसंचरण तंत्र में घुमता रहता है और यही अलग-अलग कारण और योग संयोग पाकर लकवा सायटिका हार्ट अटेक मृत्यु , कब्ज लीवर किडनी आमाशय में कफ वायु और पित्त के रोग पैदा करता है, इससे बचना चाहिए और दूध घी व शकर से बने पदार्थों, तेल वसा से बने पदार्थों, रिफाइंड तेल, अंग्रेजी दवाइयों खासकर पेन किलर दवाओं , खेती किसानी में कीट फफूंदी चारा नियंत्रण की दवाइयों उर्वरक में सावधानी यानी नाक आंख त्वचा हाथ पैर आदि अंग में इनका संपर्क कम से कम हो अर्थात हर क्रिया कर्म आचरण में कमी करने से ही आधा बचाव किया जा सकता है और बाकी आधा खूब चबा-चबाकर हल्का सादा भोजन, सूर्य प्रकाश में पसीना लाने वाली मेहनत परिश्रम प्राणायाम,पैदल यात्रा,सायकल यात्रा, तैरना,खेल कुद, व्यायाम योगासन, नृत्य से जीवन निरोगी व्यतीत करने में मदद मिलेगी 🙏🏻 सागर सिमरोल 🙏🏻 #👌 अच्छी सोच👍 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #ayurveda #health
Sagar Singh
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1 months ago
अहंकारी व्यक्ति खुद को सबसे श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं जबकि नम्रता से युक्त व्यक्ति सबमें ईश्वर देखते हुए भक्ति का प्रेमानंद अमृत पा जाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ ज्ञानी सबमें मौजूद ईश्वर को अपने मैं स्वरुप में अनुभव करते हैं।एक तो सबसे श्रेष्ठ बाहरी चीज है और सब में श्रेष्ठ भीतरी चीज है। सबसे श्रेष्ठ और सब में श्रेष्ठ दोनों ही परस्पर विरोधी शब्द है लेकिन अच्छे अच्छे विद्वानों को यह समझना मुश्किल लग सकता है । सबसे श्रेष्ठ होने वाले बाकी सब को अपने से नीचे घटिया साबित कर पाए तब होते हैं जैसे विश्वसुंदरी। जबकि सब में श्रेष्ठ के लिए कोई प्रतियोगिता नहीं किसी को नीचे दिखाना नहीं है और खुद को ऊपर साबित करना नहीं पड़ता है।बस ""सब घट मेरा साईंया खाली घट न कोई।"" हर जीव हर पदार्थ मतलब चराचर जगत में जीवित निर्जीव सभी में एक ही परमेश्वर सत्ता विराजमान है यही अनुभव कर लिया तो फिर हो गया --सब -में श्रेष्ठ=ईश्वर को विद्यमान देखें । फिर वो किस से घृणा करे किस पर फिदा हो मोहित होकर वासना ग्रस्त हो बेईमानी मांसाहार शराब दुराचार रिश्वतखोरी झूठ फरेब कपट मिलावट नहीं कर सकता और यदि किसी से किया मानो एकांत में या रात्रि में किसी तरुण सुन्दर स्त्री को देखते हुए वासना जागी तो फिर ईश्वर गायब हो गया और यदि रात्रि में किसी सुनसान जगह पर डाकु लुटेरे देखकर बहुत भयभीत हो गए तो भी ईश्वर गायब हो गया, ईश्वर को विद्यमान देखते हुए वासना या फिर डर, स्वार्थी लगाव या घृणा हो नहीं सकती और यदि हुई तो आप ईश्वर को भूल गए जो संतों शास्त्रों का सबसे बड़ा सुत्र है "*" वासुदेव: सर्वम् इति।"*" सागर सिमरोल 🙏🏻 #🌞 Good Morning🌞 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏सुविचार📿 #Suvichar