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Jaswant Dass
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Jaswant Dass
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3 घंटे पहले
#निमंत्रण_संसारको_सम्मानकेसाथ #Bhandara #feast #langar #trending #photooftheday #kashi #banarasi #UP #kabir #KabirisGod #SantRampalJiMaharaj #SatlokAshram #trendingreels #trend #AnnapurnaMuhim #GodKabirNirvanDiwas #कबीर
Jaswant Dass
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15 घंटे पहले
#निमंत्रण_संसारको_सम्मानकेसाथ #Bhandara #feast #langar #trending #photooftheday #kashi #banarasi #UP #kabir #KabirisGod #SantRampalJiMaharaj #SatlokAshram #trendingreels #trend #AnnapurnaMuhim #GodKabirNirvanDiwas #कबीर
Jaswant Dass
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1 दिन पहले
#निमंत्रण_संसारको_सम्मानकेसाथ 4Days Left For Nirvan Diwas #कबीर
Jaswant Dass
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1 दिन पहले
#पहचान_अविनाशी_प्रभु_की अंधविश्वास तोड़ना आसान नहीं, पर कबीर साहेब ने करके दिखाया। यह लीला केवल परमात्मा ही कर सकते हैं। #कबीर अधिक जानकारी के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें। 4Days Left For Nirvan Diwas
Jaswant Dass
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3 दिन पहले
#SacrificedAll_LostMoksha धर्म के नाम पर डर और लालच फैलाया गया। गरीबदास जी ने इस पाखंड का खुलकर विरोध किया। अधिक जानकारी के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें। God KabirJi Nirvan Diwas #कबीर
Jaswant Dass
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4 दिन पहले
#गला_भी_कटाया_मोक्ष_नहींपाया Actions performed without understanding the scriptures are futile. A guru is one who provides evidence from the scriptures. God Kabir Nirvan Diwas #कबीर
Jaswant Dass
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6 दिन पहले
#GodNightTuesday #Annapurna_Muhim_SantRampalJi . नानक साहेब जी प्रभु कबीर साहिब जी का मिलना साहिब मेरा एको है। एको है भाई एको है। आपे रूप करे बहु भांती नानक बपुड़ा एव कह।। जो तिन कीआ सो सचु थीआ,अमृत नाम सतगुरु दीआ।। गुरु पुरे ते गति मति पाई। बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे। सतिगुरु राखे से बड़ भागे, नानक गुरु की चरणों लागे। मैं गुरु पूछिआ अपणा साचा बिचारी राम। उपरोक्त वाणीया गुरूग्रंथ साहिब मे से अलग अलग स्थान से ली है। अमृतवाणी में श्री नानक साहेब जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि साहिब एक ही है तथा मेरे गुरु जी ने मुझे उपदेश नाम मन्त्रा दिया, वही नाना रूप धारण कर लेता है अर्थात् वही सतपुरुष है वही जिंदा रूप बना लेता है। वही धाणक रूप में भी विराजमान होकर आम व्यक्ति अर्थात् भक्त की भूमिका करता है। शास्त्रा विरुद्ध पूजा करके सारे जगत् को जन्म-मृत्यु व कर्मफल की आग में जलते देखकर जीवन व्यर्थ होने के डर से भाग कर मैंने गुरु जी के चरणों में शरण ली। बलिहारी गुरु आपणे दिउहाड़ी सदवार। जिन माणस ते देवते कीए करत न लागी वार। आपीनै आप साजिओ आपीनै रचिओ नाउ। दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ। दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ। तूं जाणोइ सभसै दे लैसहि जिंद कवाउ करि आसणु डिठो चाउ। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा जिंदा का रूप बनाकर बेई नदी पर आए अर्थात् जिंदा कहलाए तथा स्वयं ही दो दुनिया ऊपर तथा नीचे को रचकर ऊपर सत्यलोक में आकार में आसन पर बैठ कर चाव के साथ अपने द्वारा रची दुनियाँ को देख रहे हो तथा आप ही स्वयम्भू अर्थात् माता के गर्भ से जन्म नहीं लेते, स्वयं प्रकट होते हो। यही प्रमाण पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मं. 8 में है कि कविर् मनीषि स्वयम्भूः परिभू व्यवधाता, भावार्थ है कि कबीर परमात्मा सर्वज्ञ है। तथा अपने आप प्रकट होता है। वह सनातन अर्थात् सर्वप्रथम वाला प्रभु है। वह सर्व ब्रह्मण्डों का अर्थात् भिन्न-भिन्न सर्व लोकों का रचनहार है। एहू जीउ बहुते जन्म भरमिआ,ता सतिगुरु शबद सुणाइया भावार्थ है कि श्री नानक साहेब जी कह रहे हैं कि मेरा यह जीव बहुत समय से जन्म तथा मृत्यु के चक्र में भ्रमता रहा अब पूर्ण सतगुरु ने वास्तविक नाम प्रदान किया। श्री नानक जी के पूर्व जन्म सतयुग में राजा अम्ब्रीष, त्रोतायुग में राजा जनक हुए थे और फिर नानक जी हुए तथा अन्य योनियों के जन्मों की तो गिनती ही नहीं है। इस निम्न लेख में प्रमाणित है कि कबीर साहेब तथा नानक जी की वार्ता हुई है। यह भी प्रमाण है कि राजा जनक विदेही भी श्री नानक जी थे तथा श्री सुखदेव जी भी राजा जनक का शिष्य हुआ था। पराण संगली पंजाबी लीपी संपादक: डाॅ. जगजीत सिह खानपुरी पब्लिकेशन ब्यूरो पंजाबी युनिवर्सिटी, पटियाला। प्रकाशित सन् 1961 के पृष्ठ न. 399 से सहाभार गोष्टी बाबे नानक और कबीर जी की उह गुरुजी चरनि लागि करवै,बीनती को पुन करीअहु देवा अगम अपार अभै पद कहिए, सो पाईए कित सेवा।। मुहि समझाई कहहु गुरु पूरे, भिन्न-भिन्न अर्थ दिखावहु। जिह बिधि परम अभै पद पाईये, सा विधि मोहि बतावहु। मन बच करम कृपा करि दीजै, दीजै शब्द उचारं।। कहै कबीर सुनहु गुरु नानक, मैं दीजै शब्द बीचारं।। (नानक जी) नानक कह सुनों कबीर जी, सिखिया एक हमारी। तन मन जीव ठौर कह ऐकै, सुंन लागवहु तारी।। करम अकरम दोऊँ तियागह, सहज कला विधि खेलहु। जागत कला रहु तुम निसदिन, सतगुरु कल मन मेलहु।। तजि माया र्निमायल होवहु, मन के तजहु विकारा। नानक कह सुनहु कबीर जी, इह विधि मिलहु अपारा। (कबीर जी) गुरुजी माया सबल निरबल जन तेरा,क्युं अस्थिर मन होई काम क्रोध व्यापे मोकु, निस दिन सुरति निरत बुध खोई।। मन राखऊ तवु पवण सिधारे, पवण राख मन जाही। मन तन पवण जीवैं होई एकै, सा विधि देहु बुझााई।। (नानक जी) दिृढ करि आसन बैठहु वाले, उनमनि ध्यान लगावहु। अलप-अहार खण्ड कर निन्द्रा, काम क्रोध उजावहु।। नौव दर पकड़ि सहज घट राखो, सुरति निरति रस उपजै। गुरु प्रसादी जुगति जीवु राखहु, इत मंथत साच निपजै।4। (कबीर जी) कबीर कवन सुखम कवन स्थूल कवन डाल कवन है मूल गुरु जी किया लै बैसऊ, किआ लेहहु उदासी। कवन अग्नि की धुणी तापऊ कवन मड़ी महि बासी।। (नानक जी) नानक ब्रह्म सुखम सुंन असथुल, मन है पवन डाल है मूल करम लै सोवहु सुरति लै जागहु, ब्रह्म अग्नि ले तापहु। निस बासर तुम खोज खुजावहु,सुंन मण्डल ले डूम बापहु6 (सतगुरु कहै सुनहे रे चेला, ईह लछन परकासे) (गुरु प्रसादि सरब मैं पेखहु, सुंन मण्डल करि वासे) (कबीर जी) सुआमी जी जाई को कहै, ना जाई वहाँ क्या अचरज होई जाई। मन भै चक्र रहऊ मन पूरे, सा विध देहु बताई।। नानक जी अपना अनभऊ कहऊ गुरुजी, परम ज्योति किऊं पाई। ससी अर चड़त देख तुम लागे, ऊहाँ कीटी भिरणा होता। नानक कह सुनहु कबीरा, इत बिध मिल परम तत जोता। (कबीर जी) धन धन धन गुरु नानक, जिन मोसो पतित उधारो। निर्मल जल बतलाइया मो कऊ, राम मिलावन हारो।9 (नानक जी) जब हम भक्त भए सुखदेवा, जनक विदेह किया गुरुदेवा। कलिमहि जुलाहा नामकबीरा,ढूंडथे चित भईआ न थीरा। बहुतभांति कर सिमरनकीना,इहै मन चंचल तबहुन भिना। जब करि ज्ञान भए उदासी, तब न काटि कालहि फांसी।। जबहम हारपरे सतिगुरु दुआरे,दे गुरु नामदान लीए उधारे (कबीर जी) सतगुरु पुरुख सतिगुरु पाईया,सतिनाम लै रिदै बसाईआ। जात कमीना जुलाहाअपराधि,गुरुकृपा ते भगति समाधी। मुक्ति भइआ गुरु सतिगुरु बचनी, गईया सु सहसा पीरा। जुग नानक सतिगुरु जपीअ, कीट मुरीद कबीरा।। सुनि उपदेश सम्पूर्ण सतगुरु का, मन महि भया अनंद। मुक्ति का दाता बाबा नानक, रिंचक रामानन्द।। ऊपर लिखी वाणी ‘प्राण संगली‘ नामक पुस्तक से लिखी हैं। इसमें स्पष्ट लिखा है कि वाणी संख्या 9 तक दोहों में पूरी पंक्ति के अंतिम अक्षर मेल खाते हैं। परन्तु वाणी संख्या 10 की पाँच पंक्तियां तथा वाणी संख्या 11 की पहली दो पक्तियां चैपाई रूप में हैं तथा फिर दो पंक्तियां दोहा रूप में है तथा फिर वाणी संख्या 12 में केवल दो पंक्तियां हैं जो फिर दोहा रूप में है। इससे सिद्ध है कि वास्तविक वाणी को निकाला गया है जो वाणी कबीर साहेब जी के विषय में श्री नानक जी ने सतगुरु रूप में स्वीकार किया होगा। नहीं तो दोहों में चलती आ रही वाणी फिर चैपाईयों में नहीं लिखी जाती। फिर बाद में दोहों में लिखी है। यह सब जान-बूझ कर प्रमाण मिटाने के लिए किया है। वाणी संख्या 10 की पहली पंक्ति ‘जब हम भक्त भए सुखदेवा, जनक विदेही किया गुरुदेवा‘ स्पष्ट करती है कि श्री नानक जी कह रहे हैं कि मैं जनक रूप में था उस समय मेरा शिष्य श्री सुखदेव ऋषि हुए थे। इस वाणी संख्या 10 को नानक जी की ओर से कही मानी जानी चाहिए तो स्पष्ट है कि नानक जी कह रहे है कि मैं हार कर गुरू कबीर के चरणों में गिर गया उन्होंने नाम दान करके उद्धार किया। वास्तव में यह 10 नं. वाणी कही अन्य वाणी से है। यह पंक्ति भी परमेश्वर कबीर साहेब जी की ओर से वार्ता में लिख दिया है। क्योंकि परमेश्वर कबीर साहेब जी ने अपनी शक्ति से श्री नानक जी को पिछले जन्म की चेतना प्रदान की थी। तब नानक जी ने स्वीकार किया था कि वास्तव में मैं जनक था तथा उस समय सुखदेव मेरा भक्त हुआ था। वाणी संख्या 11 में चार पंक्तियां हैं जबकि वाणी संख्या 10 में पाँच पंक्तियां लिखी हैं। वास्तव में प्रथम पंक्ति ‘जब हम भक्त भए सुखदेवा . ‘ वाली में अन्य तीन पंक्तियां थी, जिनमें कबीर परमेश्वर को श्री नानक जी ने गुरु स्वीकार किया होगा। उन्हें जान बूझ कर निकाला गया लगता है। Visit Annapurna Muhim YouTube #कबीर
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