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#BigMistakeOf_DrBRAmbedkarJi
. दादू दास जी को शरण में लेना व उद्धार करना
श्री दादू जी को सात वर्ष की आयु में जिन्दा बाबा जी के स्वरूप में परमेश्वर जी मिले थे। उस समय कई अन्य हम उम्र बच्चे भी खेल रहे थे। परमेश्वर कबीर जी ने अपने कमण्डल से कुछ जल पान के पत्ते को कटोरे की तरह बनाकर पिलाया तथा प्रथम नाम देकर सत्यलोक ले गए। दादू जी तीन दिन-रात अचेत रहे। फिर सचेत हुए तथा कबीर जी का गुणगान किया। जो बच्चे श्री दादू जी के साथ खेल रहे थे। उन्होंने गाँव में आकर बताया कि एक बूढ़ा बाबा आया था। उसने जादू-जंत्र का जल दादू को पिलाया था। परंतु दादू जी ने बताया था किः-
जिन मोकूं निज नाम दिया, सोई सतगुरू हमार।
दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सिरजनहार।।
दादू नाम कबीर की, जे कोई लेवे ओट।
ताको कबहू लागै नहीं, काल वज्र की चोट।।
केहरी नाम कबीर है, विषम काल गजराज।
दादू भजन प्रताप से, भागै सुनत आवाज।।
अब हो तेरी सब मिटे, जन्म-मरण की पीर।
श्वांस-उश्वांस सुमरले, दादू नाम कबीर।।
संत मलूक दास जी तथा संत दादू दास जी को परमेश्वर संत गरीबदास जी की तरह सतलोक जाने के पश्चात् मिले थे। यह प्रकरण कबीर सागर में नहीं था, बाद में लिखा गया है।
वाह-वाह कबीर गुरू पूरा है
वाह-वाह कबीर गुरू पूरा है।(टेक)
पूरे गुरू की मैं बली जाऊँ जाका सकल जहूरा है।
अधर दुलीचे परे गुरूवन के, शिव ब्रह्मा जहाँ शूरा है।
श्वेत ध्वजा फरकत गुरूवन की, बाजत अनहद तूरा है।
पूर्ण कबीर सकल घट दरशै, हरदम हाल हजूरा है।
नाम कबीर जपै बड़भागी, नानक चरण को धूरा है।
अगम निगम बोध पृष्ठ 46 पर प्रमाण दिया है कि महादेव जी के पूज्य इष्ट देव कबीर परमेश्वर जी हैं।
यह फोटोकाॅपी कबीर सागर के अध्याय अगम निगम बोध के पृष्ठ 46 की है। इसमें किसी अन्य ने यह महादेव पार्वती का प्रकरण लिखा है। यह शुद्ध संस्कृत नहीं है। फिर भी सच्चाई यह है कि पार्वती ने पूछा कि आप जिस कबीर की महिमा बताते हो, वह कौन है? श्री शिव जी ने गोलमोल उत्तर दिया है। क से कर्ता, ब से ब्रह्म तथा र से सबमें रमण करने के कारण परमात्मा कबीर कहलाता है।
वास्तव में परमेश्वर कबीर जी तीनों देवताओं श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) को उनके लोकों में जाकर मिले थे। उनको शिष्य बनाया था। संत गरीबदास जी ने इसको बहुत अच्छा सत्य वर्णन किया है, वह इस प्रकार है कि
आदि अन्त हमरे नहीं, नहीं मध्य मिलावा मूल।
ब्रह्मा ज्ञान सुनाईया, धरि पिण्डा अस्थूल।।
श्वेत भूमि को हम गए, जहाँ विष्णु विश्वम्भर नाथ।
हरियं हिरा नाम दे, अष्ट कमल दल स्वांत।।
हम बैरागी ब्रह्म पद, सन्यासी महादेव।
सोहं नाम दिया शंकर को, करे हमारी सेव।।
आप जी ने पढ़ा कि शिव जी ने कबीर जी को अपना प्रभु माना है। उपरोक्त वर्णन में परमेश्वर कबीर जी ने काल ब्रह्म तथा उसके पुत्रों की पूजा का ज्ञान तथा लाभ-हानि बताई। परमेश्वर जी ने स्पष्ट किया है कि
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माया और धर्मराया कहिए।
इन पाँचों मिल प्रपंच बनाया, बानी हमरी लहिए।।
कबीर सागर के अध्याय ‘‘अगम निगम बोध‘‘ का सारांश सम्पूर्ण हुआ।
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