#GodNightFriday
#मांस_खाना_अल्लाह_का_आदेशनहीं
, कबीरजी ने स्वामी रामानन्दजी को तत्वज्ञान समझाया
पंडित स्वामी रामानन्द जी एक विद्वान पुरुष थे। वेदों व गीता जी के मर्मज्ञ ज्ञाता माने जाते थे। जिस समय कबीर परमेश्वर (कविर्देव) अपने लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हो गए तब गुरु मर्यादा बनाए रखने के लिए लीला की। अढ़ाई वर्ष की आयु के बच्चे का रूप धारण करके सुबह-सुबह अंधेरे में पंचगंगा घाट की पौड़ियों के ऊपर लेट गए, जहाँ पर स्वामी रामानन्द जी प्रतिदिन स्नानार्थ जाया करते थे। श्री रामानन्द जी चारों वेदों के ज्ञाता और पवित्र गीता जी के विद्वान माने जाते थे। स्वामी रामानन्द जी की आयु 104 वर्ष की हो चुकी थी। काशी में जो पाखण्ड पूजा दूसरे पण्डितों ने चला रखी थी वह बंद करवा दी थी।
रामानन्द जी शास्त्र अनुकूल साधना बताया करते थे और पूरी काशी में अपने बावन दरबार लगाया करते थे। रामानन्द जी पवित्र गीता जी व पवित्र वेदों के आधार पर विधिवत् साधना बताते थे। ओ3म् नाम का जाप उपदेश देते थे। उस दिन भी जब स्नान करने के लिए पंचगंगा घाट पर गए तो पौड़ियों पर कबीर साहेब लेटे हुए थे। सुबह ब्रह्ममुहूर्त के अंधेरे में स्वामी रामानन्द जी को कबीर साहेब दिखाई नहीं दिए। कबीर साहेब के सिर में रामानन्द जी के पैर की खड़ाऊ लग गई। कविर्देव ने जैसे बालक रोते हैं ऐसे रोना शुरु कर दिया।
रामानन्द जी तेजी से झुके और देखा कि कहीं बालक को चोट तो नहीं लग गई तथा प्यार से उठाया। उसी समय रामानन्द जी के गले की कण्ठी (माला) निकल कर परमेश्वर कविर्देव के गले में डल गई। रामानन्द जी ने कहा कि बेटा राम - राम बोलो। राम के नाम से दुःख दूर हो जाते हैं, पुत्र राम - राम बोलो, कबीर साहेब के सिर पर हाथ रखा। शिशु रूप में कबीर साहेब चुप हो गए। फिर रामानन्द जी स्नान करने लग गए और सोचा कि बच्चे को आश्रम में ले चलूँगा। जिसका होगा उसके पास भिजवा दूँगा। रामानन्द जी ने स्नान करके देखा तो बच्चा वहाँ पर नहीं है। कबीर साहेब वहाँ से अंतध्र्यान हुए और अपनी झोपड़ी में आ गए। रामानन्द जी ने सोचा कि बच्चा था चला गया होगा, अब उसको कहाँ ढूंढू?।
कबीर जी द्वारा स्वामी रामानन्द को दो रूप दिखाना
एक दिन स्वामी रामानन्द जी का कोई शिष्य कहीं पर सत्संग कर रहा था। कबीर साहेब वहाँ पर चले गए। वह ऋषि जी श्री विष्णु पुराण की कथा सुना रहा था। वह कह रहा था कि भगवान विष्णु जी सारी सृष्टि के रचनहार हैं, यही पालनकर्ता हैं, यही राम और कृष्ण रूप में अवतार आने वाली परम शक्ति हैं, अजन्मा हैं, श्री विष्णु जी के कोई माता-पिता नहीं हैं। कविरीश्वर ने यह सारी चर्चा सुनी।
सत्संग के उपरान्त कबीर परमेश्वर ने कहा ऋषि जी क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? ऋषि जी ने कहा कि हाँ बेटा! पूछो। वहाँ सैकड़ों की संख्या में भक्तजन उपस्थित थे। कविर्देव ने कहा कि आप विष्णु पुराण से सत्संग सुना रहे थे कि श्री विष्णु जी परमशक्ति है, इन्हीं से ब्रह्मा और शिव की उत्पत्ति हुई है। ऋषि जी ने कहा कि मैं जो सुनाता हूँ, विष्णु पुराण में ऐसा ही लिखा हुआ है। कबीर साहेब ने कहा कि ऋषि जी मैंने तो आपसे संशय निवारण के लिए प्रार्थना की है आप क्षुब्ध मत होइऐ।
एक दिन मैंने शिवपुराण सुना था। उसमें वह महापुरुष सुना रहे थे कि भगवान शिव से विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई (प्रमाण पवित्र शिव पुराण, रूद्र संहिता, अध्याय 6 तथा 7 में, गीता प्रैस गोरख पुर से प्रकाशित) देवी भागवत के तीसरे स्कंद में लिखा है कि देवी इन तीनों ब्रह्मा-विष्णु- शिव की माँ है। ये तीनों नाशवान हैं, अविनाशी नहीं हैं। ऋषि जी निरूतर हो गए। क्रोधित होकर बोला तू कौन है ? किसका पुत्र है ? कबीर साहेब से पहले ही दूसरे भक्तजन कहने लगे कि यह तो नीरु जुलाहे का पुत्र है।
स्वामी रामानन्द जी का शिष्य कहने लगा कि तूने गले में कण्ठी कैसे डाल रखी है ? तेरा गुरुदेव कौन है? कबीर साहेब ने कहा कि मेरे गुरुदेव वही हैं जो आपके गुरुदेव हैं। वह ऋषि बहुत क्रोधित हो गया तथा बोला कि रे नादान ! तू अछूत जुलाहे का बच्चा और मेरे गुरुदेव को अपना गुरुदेव बताता है। मेरे गुरुदेव का पता है कौन हैं ? श्री श्री 1008 पंडित रामानन्द जी आचार्य। तू जुलाहे का बालक, वे तो तेरे जैसे अछूतों के दर्शन भी नहीं करते और तू कह रहा है कि मैंने उनसे नाम लिया है। देख लो भाई भक्तजनों यह झूठा, कपटी है। अभी गुरुदेव के पास जाऊँगा और उनको तेरी सारी कहानी बताऊँगा। तू छोटी जाति का बच्चा हमारे गुरुदेव की बेइज्जती करता है।
कविरग्नि बोले कि ठीक है गुरुदेव जी को बताओ। उस ऋषि ने जाकर श्री रामानन्द जी को बताया कि गुरुदेव एक जुलाहे जाति का लड़का है। उसने तो हमारी नाक काट दी। वह कहता है कि स्वामी रामानन्द जी मेरे गुरुदेव हैं। हे भगवन् ! हमारा तो बाहर निकलना दुःभर हो गया। स्वामी रामानन्द जी बोले कि कल सुबह उसको बुला कर लाओ। कल देखना तुम्हारे सामने मैं उसको कितना दण्ड दूँगा।
स्वामी रामानन्द जी के मन की बात बताना।
अगले दिन सुबह-सुबह कबीर साहेब को दस नादान व्यक्तियों ने पकड़ कर श्री रामानन्द जी के सामने उपस्थित कर दिया। रामानन्द जी ने यह दिखाने के लिए कि मैं कभी छोटी जाति वालों के दर्शन भी नहीं करता, यह झूठ बोल रहा था कि इसने मेरे से दीक्षा ली है, आगे पर्दा लगा लिया। रामानन्द जी ने पर्दे के पीछे से पूछा कि तू कौन है और तेरी क्या जाति है? तेरा कौन सा पंथ है, अर्थात् किस परमात्मा की पूजा करता है?:-
रामानंद अधिकार सुनि, जुलहा अक जगदीश।
दास गरीब बिलंब ना, ताहि नवावत शीश।।
रामानंद कूं गुरु कहै, तनसैं नहीं मिलात।
दास गरीब दर्शन भये, पैडे लगी जुं लात।।
पंथ चलत ठोकर लगी, रामनाम कहि दीन।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लई प्रबीन।।
आडा पडदा लाय करि, रामानंद बूझंत।
दास गरीब कुलंग छबि, अधर डाक कूदंत।।
कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाम।
दास गरीब अधीन गति, बोलत है बलि जांव।।
उत्तर कबीर जी का:-
जाति हमारी जगतगुरु, परमेश्वर पद पंथ।
दास गरीब लिखति परै, नाम निंरजन कंत।।
रामानन्द जी बोले:-
रे बालक सुन दुर्बद्धि, घट मठ तन आकार।
दास गरीब दरद लग्या, हो बोले सिरजनहार।।
तुम मोमन के पालवा, जुलहै के घर बास।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास।।
मान बडाई छांडि करि, बोलौ बालक बैंन।
दास गरीब अधम मुखी, एता तुम घट फैंन।।
तर्क तलूसैं बोलतै, रामानंद सुर ज्ञान।
दास गरीब कुजाति है, आखर नीच निदान।।
परमेश्वर कबीर जी ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया -
महके बदन खुलास कर, सुनि स्वामी प्रबीन।
दास गरीब मनी मरै, मैं आजिज आधीन।।
मैं अविगत गति सैं परै, च्यारि बेद सैं दूर।
दास गरीब दशौं दिशा, सकल सिंध भरपूर।।
सकल सिंध भरपूर हूँ, खालिक हमरा नाम।
दासगरीब अजाति हूँ, तैं जूं कह्या बलि जांव।।
जाति पाति मेरे नहीं, नहीं बस्ती नहीं गाम।
दासगरीब अनिन गति, नहीं हमारे नाम।।
नाद बिंद मेरे नहीं, नहीं गुदा नहीं गात।
दासगरीब शब्द सजा, नहीं किसी का साथ।।
सब संगी बिछरू नहीं, आदि अंत बहु जांहि।
दासगरीब सकल वंसु, बाहर भीतर माँहि।
ए स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टि हमारै तीर।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत सत्य कबीर।।
पौहमी धरणि आकाश मैं, मैं व्यापक सब ठौर।
दास गरीब न दूसरा, हम समतुल नहीं और।
हम दासन के दास हैं, करता पुरुष करीम।
दासगरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम।।
सुनि रामानंद राम हम, मैं बावन नरसिंह।
दास गरीब कली कली, हमहीं से कृष्ण अभंग।।
हमहीं से इंद्र कुबेर हैं, ब्रह्मा बिष्णु महेश।
दास गरीब धरम ध्वजा, धरणि रसातल शेष।।
सुनि स्वामी सति भाखहूँ, झूठ न हमरै रिंच।
दास गरीब हम रूप बिन, और सकल प्रपंच।।
गोता लाऊं स्वर्ग सैं, फिरि पैठूं पाताल।
गरीबदास ढूंढत फिरूं, हीरे माणिक लाल।
इस दरिया कंकर बहुत, लाल कहीं कहीं ठाव।
गरीबदास माणिक चुगैं, हम मुरजीवा नांव।
मुरजीवा माणिक चुगैं, कंकर पत्थर डारि।
दास गरीब डोरी अगम, उतरो शब्द अधार।।
यदि मेरी जाति पूछ रहे हो तो मैं जगतगुरु हूँ (वेदों में लिखा है कि जगतगुरु, सारी सृष्टि को ज्ञान प्रदान करने वाले कबीर प्रभु हैं) मेरा पंथ क्या है? (किस परमेश्वर का मैं मार्गदर्शन करता हूँ?) इसके उत्तर में कबीर जी ने कहा मेरा परमेश्वर पंथ है। ईश, ईश्वर, परमेश्वर (ब्रह्म, परब्रह्म, पूर्णब्रह्म तथा क्षर पुरुष, अक्षर पुरुष, परम अक्षर पुरुष) मैं उस सर्वोच्च शक्ति (सुप्रीम पावर) परमेश्वर का मार्ग दर्शन करने आया हूँ, जो अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड के रचयिता और धारण-पोषण करने वाले हैं। वेदों में जिसको कविर्देव, कविरग्नि आदि नामों से सम्बोधित किया है।
ईश व क्षर पुरूष तो ब्रह्म को कहा जाता है जो केवल इक्कीस ब्रह्मण्ड का स्वामी है परब्रह्म व अक्षर पुरूष को ईश्वर कहा जाता है जो सात शंख ब्रह्मण्डों का स्वामी है तथा परम अक्षर पुरूष को पूर्ण ब्रह्म व परमेश्वर कहा जाता है जो असंख ब्रह्मण्डों का स्वामी है अर्थात् कुल का मालिक है और इसलिए कबीर जी ने स्वामी रामानंद जी से कहा कि मेरा पंथ परमेश्वर की प्राप्ति वाला है।
गीता अ. 15 श्लोक नं. 17 में लिखा है कि वास्तव में अविनाशी परमेश्वर तो कोई और ही है और वही तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और वही अविनाशी परमात्मा परमेश्वर इस नाम से जाना जाता है। वह परमेश्वर मैं ही हूँ। इस बात को सुनकर स्वामी रामानन्द जी बहुत क्षुब्ध हो गए तथा कहा कि रे निकम्मे! तू छोटी जाति का और छोटा मुँह बड़ी बात। तू अपने आप भगवान बन बैठा। बुरी गालियाँ भी दी। कबीर साहेब बोले हे गुरुदेव! आप मेरे गुरुजी हैं। आप मुझे गाली दे रहे हो तो भी मुझे आनन्द आ रहा है। लेकिन मैं जो आपको कह रहा हूँ, मैं ज्यों का त्यों पूर्णब्रह्म ही हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है।
इस बात को सुनकर रामानन्द जी ने कहा कि ठहर जा तेरी तो लम्बी कहानी बनेगी, तू ऐसे नहीं मानेगा। मैं पहले अपनी पूजा कर लेता हूँ। रामानन्द जी ने कहा कि इसको बैठाओ मैं पहले अपनी कुछ क्रिया रहती है वह कर लेता हूँ, बाद में इससे निपटूंगा। स्वामी रामानन्द जी क्या क्रिया करते थे? भगवान विष्णु जी की एक काल्पनिक मूर्ति बनाते थे। सामने मूर्ति दिखाई देने लग जाती थी (जैसे कर्मकाण्ड करते हैं, भगवान की मूर्ति के पहले वाले सारे कपड़े उतार कर, उनको जल से स्नान करवा कर, फिर स्वच्छ कपड़े भगवान ठाकुर को पहना कर गले में माला डालकर, तिलक लगा कर मुकुट रख देते हैं।)
रामानन्द जी कल्पना कर रहे थे। कल्पना करके भगवान की काल्पनिक मूर्ति बनाई। श्रद्धा से जैसे नंगे पैरों जाकर आप ही गंगा जल लाए हों, ऐसी अपनी भावना बना कर ठाकुर जी की मूर्ति के कपड़े उतारे, फिर स्नान करवाया तथा नए वस्त्रा पहना दिए। तिलक लगा दिया, मुकुट रख दिया और माला (कण्ठी) डालनी भूल गए। यदि कण्ठी न डाले तो पूजा अधूरी और मुकुट रख दिया तो पुनः उसे उतारा नहीं जा सकता। यदि उसी दिन मुकुट उतार दे तो पूजा खण्डित मानी जाती है। स्वामी रामानन्द जी अपने आप को कोस रहे हैं कि इतना जीवन हो गया मेरा कभी, भी ऐसी गलती जिन्दगी में नहीं बनी थी।
प्रभु आज क्या गलती बन गई मुझ पापी से? यदि मुकुट उतारूँ तो पूजा खण्डित। उसने सोचा कि चल मुकुट के ऊपर से कण्ठी (माला) डाल कर देखता हूँ (कल्पना से कर रहे हैं कोई सामने मूर्ति नहीं है और पर्दा लगा है कबीर साहेब दूसरी तरफ बैठे हैं)। मुकुट में माला फँस गई आगे नहीं जा रही थी। तब रामानन्द जी ने सोचा अब क्या करूं? हे भगवन्! आज तो मेरा सारा दिन ही व्यर्थ गया। आज की मेरी भक्ति कमाई व्यर्थ गई (क्योंकि जिसको परमात्मा की कसक होती है उसका एक नित्य नियम भी रह जाए तो उसको दर्द बहुत होता है। जैसे इंसान की जेब कट जाए और फिर बहुत पश्चाताप करता है। ऐसे ही प्रभु के सच्चे भक्तों को इतनी लगन होती है।)
इतने में कबीर साहेब ने कहा कि स्वामी जी माला की घुण्डी खोलो और गले में डाल दो। फिर गाँठ लगा दो, मुकुट उतारना नहीं पड़ेगा। अब रामानन्द जी काहे के मुकुट उतारे था, काहे की गाँठ खोले था। कुटिया के सामने लगा पर्दा भी स्वामी रामानन्द जी ने अपने हाथ से फैंक दिया और सारे ब्राह्मण समाज के सामने उस कबीर परमेश्वर को सीने से लगा लिया। रामानन्द जी ने कहा कि हे भगवन!
आपका तो इतना कोमल शरीर है जैसे रूई हो और मेरा तो पत्थर जैसा शरीर है। एक तरफ तो प्रभु खड़े हैं और एक तरफ जाति व धर्म की दीवार है। प्रभु चाहने वाली पुण्यात्माऐं धर्म की बनावटी दीवार को तोड़ना श्रेयकर समझते हैं। वैसा ही स्वामी रामानन्द जी ने किया। सामने पूर्ण परमात्मा को पा कर न जाति देखी न धर्म देखा, न छुआ-छात, केवल आत्म कल्याण देखा। इसे ब्राह्मण कहते हैं।
बोलत रामानंदजी, हम घर बडा सुकाल।
गरीबदास पूजा करैं, मुकुट फही जदि माल।।
सेवा करौं संभाल करि, सुनि स्वामी सुर ज्ञान।
गरीबदास शिर मुकुट धरि,माला अटकी जान।
स्वामी घुंडी खोलि करि, फिरि माला गल डार।
गरीबदास इस भजन कूं, जानत है करतार।।
ड्यौढी पडदा दूरि करि, लीया कंठ लगाय।
गरीबदास गुजरी बौहत, बदनैं बदन मिलाय।
स्वामी रामानन्द जी ने कहा हे कबीर प्रभु! आपने झूठ क्यों बोला? कबीर साहेब बोले कि कैसा झूठ स्वामी जी? स्वामी रामानन्द जी ने कहा कि आप कह रहे थे कि आपने मेरे से नाम ले रखा है। आपने मेरे से उपदेश कब लिया? कबीर साहेब बोले एक समय आप स्नान करने के लिए पँचगंगा घाट पर गए थे। मैं वहाँ लेटा हुआ था। आपके पैरों की खड़ाऊ मेरे सिर में लगी थी तो आपने कहा था कि बेटा राम नाम बोलो। रामानन्द जी बोले-हाँ, अब कुछ याद आया। परन्तु वह तो बहुत छोटा बच्चा था (क्योंकि उस समय पाँच वर्ष की आयु के बच्चे बहुत बड़े हो जाया करते थे तथा पाँच वर्ष के बच्चे के शरीर तथा ढ़ाई वर्ष के बच्चे के शरीर में दुगूना अन्तर हो जाता है)।
कबीर साहेब कहने लगे कि स्वामी जी देखो, मैं ऐसा था। स्वामी रामानन्द जी के सामने भी खड़े हैं और एक ढाई वर्षीय बच्चे का दूसरा रूप बना कर किसी सेवक की वहाँ पर खटिया बिछी थी उसके ऊपर विराजमान हो गए। अब रामानन्द जी ने छः बार तो उधर देखा और छः बार उधर देखा। फिर आँखें मलमल कर देखा कि कहीं तेरी आँखें धोखा तो नहीं खा रही हैं। इस प्रकार देख ही रहे थे कि इतने में कबीर साहेब का छोटे वाला रूप उठा और कबीर साहेब के बड़े पाँच वर्ष वाले स्वरूप में समा गया। पाँच वर्ष वाले स्वरूप में कबीर साहेब रह गए।
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परबेश।
गरीबदास गति को लखै, कौन वरण क्या भेष।
यह तौ तुम शिक्षा दई, मानि लई मनमोर।
गरीबदास कोमल पुरूष, हमरा बदन कठोर।।
तब रामानन्द जी बोले कि मेरा संशय मिट गया। हे परमेश्वर! आप को कैसे पहचान सकते हैं। आप किस जाति
#🙏🏻विष्णु भजन Video #🙏🏻शनिदेव भजन #🙏🏻श्री साईं भजन #☪ सूफी संगीत 🕌 #🙏🏻 गणपति भजन 🌺 में तथा वेश भूषा में खड़े हो। हम नादान प्राणी आप के साथ वाद-विवाद करके दोषी हो गए, क्षमा करना पूर्ण परमेश्वर कविर्देव, मैं आप का अनजान बच्चा हूँ।
Baakhabar Sant Rampal Ji