#📌ओडिशा (उत्कल,ओड्रो,कलिंग)⛳ #📌प्राचीन ओडिशा इतिहास📚
प्राचीन ओडिशा (ओद्र (Odra) /उत्कल / कलिंग ) की इतिहास और शौर्य गाथा :
राजा बलि के पुत्रों—कलिंग, ओद्र और उत्कल—के नाम पर हुई थी।
उत्कल (Utkala): जो आज के बालेश्वर, भद्रक और मयूरभंज जिलों का हिस्सा है। इसकी प्राचीन राजधानी याजपुर (जाजपुर) थी।
ओद्र (Odra): जो मध्य और पश्चिमी ओडिशा (जैसे कटक, संबलपुर, ढेंकानाल) में फैला हुआ था। महानदी इसकी मुख्य जीवन रेखा थी।
कलिंग (Kalinga): जो दक्षिण-पूर्वी ओडिशा और आंध्र के हिस्सों (जैसे गंजम, गजपति, विशाखापत्तनम) तक फैला था। इसकी राजधानी कलिंगनगर (आज का भुवनेश्वर/शिशुपालगढ़) थी।
राज्यों की भूमिका और शौर्य :
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ओडिशा का क्षेत्र विभिन्न नामों से जाना जाता था, जिनमें से ये तीनों प्रमुख थे:
उत्कल (Utkala):
नाम और स्थान: यह कलिंग का उत्तरी भाग था (उत्तर-कलिंग)। महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है।
भूमिका और शौर्य: उत्कल के लोग अपनी समुद्री शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। वे भारत के पहले ऐसे लोग थे जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार के लिए नौसेना का उपयोग किया। यहाँ के लोग कलात्मक रूप से कुशल और शांतिप्रिय थे, लेकिन अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध थे।
उद्र/ओड्र (Odra):
भूमिका: यह मुख्य रूप से एक जनजातीय क्षेत्र था जो ओडिशा के तटीय और मध्य भाग में स्थित था।
शौर्य: ओड्र के लोग अपनी लड़ाकू प्रवृत्तियों के लिए जाने जाते थे। युद्ध के समय कलिंग की मुख्य सेना के साथ मिलकर ये भी मगध के विरुद्ध खड़े हुए थे।
कलिंग (Kalinga):
भूमिका: यह एक अत्यंत समृद्ध और शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य था। इसकी सेना में पैदल सैनिक, घुड़सवार और विशेष रूप से हाथी सेना बहुत शक्तिशाली थी।
शौर्य: कलिंग के राजा (संभावित नाम राजा अनंत पद्मनाभन) ने अशोक की विशाल मौर्य सेना के सामने झुकने से इनकार कर दिया और अंतिम सांस तक वीरता से लड़े ।
प्राचीन ओडिशा (कलिंग,(Odra/ओद्र, उत्कल)
की नौबाणिज्य परंपरा की मुख्य विशेषताएं:
प्रमुख व्यापारिक केंद्र: प्राचीन कलिंग के नाविक बाली, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो (इंडोनेशिया), और श्रीलंका जैसे दूरस्थ स्थानों तक यात्रा करते थे।
साधब और बोइता: इन समुद्री व्यापारियों को 'साधब' कहा जाता था, जो 'बोइता' (Boitas) नामक बड़े जहाजों में यात्रा करते थे। ये जहाज हवा की शक्ति का उपयोग करने के लिए बड़े कपड़ों के पाल (Sails) से लैस होते थे।
कलिंग सागर: प्राचीन काल में बंगाल की खाड़ी का प्रभाव इतना अधिक था कि इसे 'कलिंग सागर' के नाम से जाना जाता था। कालिदास के 'रघुवंश' में कलिंग के राजा को 'महोदधिपति' (समुद्र का स्वामी) कहा गया है।
व्यापारिक वस्तुएं: यहाँ से मुख्य रूप से हाथी दांत, कीमती पत्थर, सूती वस्त्र और मसालों का व्यापार होता था।
अशोक का आक्रमण: सम्राट अशोक ने मुख्य रूप से कलिंग (तटीय दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र) पर आक्रमण किया था।
अशोक के लिए कलिंग की विजय उसके जीवन की सबसे कठिन और विचलित कर देने वाली चुनौती थी। जहाँ उसने शेष भारत को अपेक्षाकृत आसानी से अपने अधीन कर लिया था, वहीं कलिंग ने उसे लोहे के चने चबवा दिए।
1. चुनौती का अंतर
अशोक को विरासत में एक विशाल साम्राज्य मिला था जिसे उसके दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार ने पहले ही काफी हद तक संगठित कर दिया था। कई राज्यों ने मौर्य सत्ता के डर या कूटनीति के कारण आत्मसमर्पण कर दिया था। लेकिन कलिंग के साथ स्थिति पूरी तरह अलग थी:
अजेय परंपरा: कलिंग एक स्वतंत्र और गौरवशाली राज्य था जिसे चंद्रगुप्त मौर्य भी पूरी तरह नहीं जीत पाए थे।
लोकतांत्रिक भावना: कलिंग में राजा के साथ-साथ आम जनता में स्वतंत्रता की गहरी भावना थी। यहाँ युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि मौर्य साम्राज्य बनाम कलिंग की पूरी जनता के बीच था।
भौगोलिक स्थिति: कलिंग की समुद्री तटरेखा और जंगलों ने उसे एक प्राकृतिक दुर्ग बना दिया था, जिसे भेदना अशोक के लिए बहुत कठिन था।
2. उत्कल, ओड्र और कलिंग की एकता
युद्ध के समय ये तीनों क्षेत्र (जो आज के ओडिशा का हिस्सा हैं) एक साझा शत्रु के विरुद्ध एकजुट हो गए:
साझा पहचान: यद्यपि इनके नाम अलग थे, लेकिन सांस्कृतिक और व्यापारिक रूप से ये जुड़े थे। उत्कल के साहसी नाविकों, ओड्र की जुझारू जनजातियों और कलिंग की मुख्य पैदल व हस्ती (हाथी) सेना ने मिलकर एक अभेद्य मोर्चा बनाया।
जन-युद्ध: इतिहासकार बताते हैं कि कलिंग युद्ध एक 'टोटल वॉर' था। इसमें केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि किसान, व्यापारी और महिलाएँ भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए शस्त्र उठाकर मैदान में उतर आए थे। इसी सामूहिक प्रतिरोध ने अशोक की जीत को अत्यंत कठिन बना दिया।
3. भीषण नरसंहार का वर्णन
261 ईसा पूर्व में दया नदी के किनारे (धौली की पहाड़ियों के पास) जो हुआ, उसने मानवता को झकझोर दिया:
लाल हुई नदी: युद्ध इतना भयानक था कि कहा जाता है कि दया नदी का पानी सैनिकों के खून से पूरी तरह लाल हो गया था।
आँकड़ों की विभीषिका: अशोक के 13वें शिलालेख के अनुसार, इस युद्ध में 1,00,000 (एक लाख) लोग मारे गए, उससे कई गुना ज्यादा घायल हुए और 1,50,000 (डेढ़ लाख) लोगों को बंदी बनाकर निर्वासित कर दिया गया।
मरे हुए लोगों का दृश्य: युद्ध के मैदान में केवल सैनिकों के शव नहीं थे, बल्कि निर्दोष ब्राह्मणों, भिक्षुओं, बच्चों और महिलाओं की लाशें भी बिखरी पड़ी थीं। चारों ओर चीख-पुकार और बर्बादी का मंजर था।
4. हृदय परिवर्तन और पश्चाताप
जब अशोक अपनी जीत का जश्न मनाने मैदान में निकला, तो उसने वह विभीषिका देखी जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
उसने देखा कि उसने एक राज्य तो जीत लिया, लेकिन वहाँ के लोगों का दिल और उनकी खुशियाँ हमेशा के लिए उजाड़ दीं।
उसने महसूस किया कि यह 'विजय' नहीं बल्कि 'पराजय' है। इसी ग्लानि ने उसे हमेशा के लिए बदल दिया। उसने तलवार फेंक दी और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में कभी युद्ध नहीं करेगा।
इस प्रकार, कलिंग की धरती ने अशोक को एक विजेता (Conqueror) के रूप में स्वीकार करने के बजाय, उसे एक धम्म प्रवर्तक (Messenger of Peace) के रूप में पूरी दुनिया को दे दिया।
सम्राट खारवेल का उदय: अशोक के लगभग 150 साल बाद, कलिंग के महामेघवाहन वंश के राजा खारवेल सत्ता में आए। खारवेल ही वह पहले महान सम्राट थे जिन्होंने:
कलिंग की खोई हुई शक्ति को पुनर्जीवित किया।
अपने विजय अभियानों के माध्यम से कलिंग, ओद्र और उत्कल को एक राजनीतिक छत्रछाया में एकजुट किया।
उन्होंने मगध पर हमला कर 'कलिंग जिन' की मूर्ति वापस लाकर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया।
प्राचीन काल में सम्राट खारवेल के बाद, अगर किसी शासक ने ओडिशा (कलिंग/उत्कल) को एक विशाल साम्राज्य और महाशक्ति के रूप में स्थापित किया, तो वह गजपति कपिलेंद्र देव (1435–1467 ईस्वी) थे। खारवेल के लगभग 1500 साल बाद, कपिलेंद्र देव ने बिखरे हुए ओडिया क्षेत्रों को एकजुट कर "सूर्यवंश" की नींव रखी।
यहाँ उनके द्वारा उत्कल, ओडरा और कलिंग को शक्तिशाली बनाने और विजय प्राप्त करने का ऐतिहासिक वर्णन है:
1. सत्ता का उदय और एकीकरण
1435 ईस्वी में जब कपिलेंद्र देव सिंहासन पर बैठे, तब ओडिशा आंतरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से जूझ रहा था। उन्होंने सबसे पहले उत्कल और कलिंग के विद्रोही सामंतों को कुचला और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया। उन्होंने खुद को 'गजपति' (हाथियों की सेना का स्वामी) घोषित कर सैन्य शक्ति को पुनर्गठित किया।
2. 'नवकोटि कर्नाटक कालबर्गेश्वर' की उपाधि
कपिलेंद्र देव केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक महान विजेता थे। उनकी सैन्य सफलताओं के कारण उन्हें "गजपति गौदेश्वर नवकोटि कर्नाटक कालबर्गेश्वर" कहा गया:
गौदेश्वर: उन्होंने बंगाल (गौड़) के सुल्तानों को हराकर उत्तर में हुगली तक सीमा विस्तार किया।
कर्नाटक: उन्होंने विजयनगर साम्राज्य के शक्तिशाली राजाओं को हराकर दक्षिण में अपना दबदबा बनाया।
कालबर्गेश्वर: उन्होंने बहमनी सल्तनत (गुलबर्गा) के सुल्तानों को युद्ध में परास्त किया।
3. साम्राज्य का विस्तार (गंगा से कावेरी तक)
खारवेल की तरह ही कपिलेंद्र देव ने भी दिग्विजय यात्राएँ कीं:
उत्तर विजय: उन्होंने बंगाल के सुल्तान शम्सुद्दीन अहमद शाह को हराया और उत्तर में गंगा नदी तक अपना अधिकार जमाया।
दक्षिण विजय: उन्होंने कोंडाविडु और राजमहेंद्ररी के रेड्डी राजाओं को जीता। उनकी सेना ने विजयनगर को पीछे धकेलते हुए कावेरी नदी के तट तक पहुँच बनाई और उदयगिरि (नेल्लोर) व कांचीपुरम पर कब्जा किया।
4. सैन्य और सांस्कृतिक शक्ति
अजेय सेना: उनके पास उस समय की सबसे बड़ी पैदल सेना और हाथियों का दस्ता था, जिससे वे उत्तर और दक्षिण के मुस्लिम सुल्तानों और हिंदू राजाओं के लिए आतंक बन गए थे।
ओडिया पहचान: उन्होंने ओडिया भाषा को राजकीय संरक्षण दिया। प्रसिद्ध कवि सरला दास ने उनके काल में ही 'महाभारत' लिखी, जिससे ओडिया साहित्य को वैश्विक पहचान मिली।
जगन्नाथ भक्ति: उन्होंने स्वयं को भगवान जगन्नाथ का 'सेवक' माना, जिससे उन्हें जनता का अपार समर्थन मिला।
निष्कर्ष
कपिलेंद्र देव ने खारवेल के गौरव को पुनर्जीवित करते हुए कलिंग (ओडिशा) को एक क्षेत्रीय शक्ति से बदलकर एक अखिल भारतीय साम्राज्य (Pan-Indian Empire) बना दिया। उनके समय में ओडिशा की सीमाएँ उत्तर में गंगा से लेकर दक्षिण में कावेरी तक फैली हुई थीं।
तीनों राज्य की राजाओं की इतिहास
इन राज्यों की स्थापना पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा बलि के पुत्रों—कलिंग, ओद्र और उत्कल—के नाम पर हुई थी।
राजा कलिंग (King Kalinga): कलिंग राज्य के संस्थापक।
राजा ओद्र (King Odra): ओद्र राज्य के संस्थापक।
राजा उत्कल (King Utkala): उत्कल राज्य के संस्थापक।
राजा इंद्रद्युम्न (King Indradyumna): पौराणिक कथाओं के अनुसार, इन्होंने ही पुरी में भगवान जगन्नाथ के मंदिर का निर्माण करवाया था।
श्रुतायुध (Srutayudha): महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में कलिंग के राजा, जिन्होंने कौरवों का साथ दिया और भीम के हाथों मारे गए।
चित्रांगद (Chitrangada): महाभारत में वर्णित कलिंग के एक अन्य राजा जिनकी राजधानी 'मणिपुर' (आज का केंद्रपाड़ा क्षेत्र) थी।
2. प्राचीन ऐतिहासिक काल (Pre-Mauryan to Gupta Era)
महापद्म नंद (Mahapadma Nanda): मगध का सम्राट जिसने कलिंग को अपने साम्राज्य में मिलाया (4थी शताब्दी ईसा पूर्व)।
सम्राट अशोक (Emperor Ashoka): 261 ईसा पूर्व में कलिंग युद्ध जीतकर मौर्य शासन स्थापित किया।
महामेघवाहन खारवेल (Emperor Kharavela): कलिंग का सबसे प्रतापी सम्राट (1ली शताब्दी ईसा पूर्व), जिसने मगध को हराकर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया।
समुद्रगुप्त (Samudragupta): गुप्त काल के दौरान ओडिशा के दक्षिणी हिस्सों पर विजय प्राप्त की।
3. मध्यकालीन राजवंश (Medieval Empires)
इस काल में ओडिशा में कला और मंदिर निर्माण का स्वर्ण युग आया।
भौम-कर वंश (Bhauma-Kara): यहाँ त्रिभुवन महादेवी जैसी शक्तिशाली महिला शासकों ने राज किया।
सोमवंशी राजा (Somavamshi): राजा ययाति केसरी (ययाति द्वितीय), जिन्होंने प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर की नींव रखी और कटक शहर बसाया।
पूर्वी गंग वंश (Eastern Ganga):
अनंतवर्मन चोडगंग देव: इन्होंने आधुनिक पुरी जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया।
लांगल नरसिंह देव प्रथम: विश्वप्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माता।
गजपति वंश (Gajapati Empire):
कपिलेंद्र देव: ओडिशा के महानतम विस्तारवादी राजा, जिनका साम्राज्य गंगा से कावेरी तक फैला था।
पुरुषोत्तम देव और प्रताप रुद्र देव: इस वंश के अंतिम महान शासक।
4. उत्तर-मध्यकाल और आधुनिक युग (Late Medieval to Modern)
मुकुंद देव (Mukunda Deva): ओडिशा के अंतिम स्वतंत्र हिंदू राजा (1568 में इनका पतन हुआ)。
भोज वंश (Bhoi Dynasty): राजा रामचंद्र देव, जिन्होंने जगन्नाथ संस्कृति को जीवित रखा और खोर्धा को राजधानी बनाया।
ब्रिटिश और आधुनिक भारत: 1803 में अंग्रेजों का अधिकार हुआ। 1 अप्रैल 1936 को मधुसूदन दास और महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति के प्रयासों से भाषाई आधार पर 'ओडिशा' राज्य बना।
सांस्कृतिक विरासत और उत्सव:
ओडिशा आज भी अपनी इस महान समुद्री विरासत को जीवित रखे हुए है:
बालिजात्रा (Bali Jatra): कटक में महानदी के तट पर आयोजित होने वाला यह एशिया का सबसे बड़ा खुला व्यापार मेला है। यह उत्सव कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होता है और उस दिन की याद दिलाता है जब नाविक अनुकूल हवाओं का लाभ उठाकर अपनी लंबी यात्रा शुरू करते थे।
बोइता बंदाण (Boita Bandana): कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग (विशेषकर महिलाएं) नदियों और तालाबों में कागज या केले के तने से बनी छोटी नावें प्रवाहित करते हैं। यह उन प्राचीन दिनों का प्रतीकात्मक स्मरण है जब परिवार अपने पुरुष सदस्यों को सुरक्षित यात्रा की कामना के साथ विदा करते थे।
तापोई और खुडुरुकुनी ओषा: यह लोक कथा एक नाविक की छोटी बहन 'तापोई' की प्रतीक्षा और संघर्ष पर आधारित है, जो ओडिशा की समुद्री संस्कृति का एक अभिन्न अंग है।
ओडिशा के प्राचीन, पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों और स्रोतों की सूची यहाँ दी गई है:
* महाभारत (भीष्म पर्व और सभा पर्व): कलिंग और ओद्र राज्यों के युद्ध और भूगोल का वर्णन।
* मत्स्य पुराण और वायु पुराण: प्राचीन राजवंशों की वंशावली और उत्कल क्षेत्र का उल्लेख।
* कपिल संहिता (Kapila Samhita): ओडिशा के तीर्थों और सांस्कृतिक इतिहास का संस्कृत ग्रंथ।
* मदला पांजी (Madala Panji): पुरी जगन्नाथ मंदिर का प्राचीन रिकॉर्ड (ओडिशा के राजाओं का इतिहास)।
* ब्रह्म पुराण: इसे 'सौर पुराण' भी कहते हैं, इसमें कोणार्क और ओद्र देश का विस्तार से वर्णन है।
2. ऐतिहासिक शिलालेख (Inscriptions/Rock Edicts)
* अशोक का 13वाँ शिलालेख (Dhauli/Jaugada): कलिंग युद्ध और मौर्य शासन का एकमात्र समकालीन प्रमाण।
* हाथीगुम्फा शिलालेख (उदयगिरि): सम्राट खारवेल की विजयगाथा और प्राचीन कलिंग का सबसे सटीक विवरण।
* समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति: गुप्त काल के दौरान ओडिशा (कोशल और महाकांतार) की स्थिति का वर्णन।
3. आधुनिक ऐतिहासिक पुस्तकें (Modern Historical Books)
* ओडिशा इतिहास (Odisha Itihaas): लेखक - डॉ. हरेकृष्ण महताब (सबसे प्रामाणिक आधुनिक पुस्तक)।
* History of Orissa: लेखक - डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर (W.W. Hunter)।
* Archaeology of Orissa: लेखक - आर.पी. महापात्रा।
* History of Orissa (Hindu Period): लेखक - कृष्ण चंद्र पाणिग्रही।
* The Gajapati Kings of Orissa: लेखक - प्रभात मुखर्जी (मध्यकालीन शौर्य के लिए)।
4. विदेशी यात्रियों के वृत्तांत (Foreign Accounts)
* सी-यू-की (Si-Yu-Ki): चीनी यात्री ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) द्वारा लिखित, जिसमें उसने 'उ-चा' (ओद्र) देश की यात्रा का वर्णन किया है।
* इंडिका (Indica): मेगस्थनीज द्वारा लिखित, जिसमें कलिंग की सैन्य शक्ति का उल्लेख है।