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श्रीकृष्ण मयूर पंख क्यों धारण करते हैं ?
वनवास के दौरान माँ सीता को पानी की प्यास लगी। श्री राम जी नी चारों ओर देखा। तभी वहां एक मयूर ने आ कर श्री रामजी से कहा कि अभी थोड़ी दूर पर संभावना। श्री ॥ किंतु मार्ग ने पूछ वों मूर्त ? ह मयूर ने उत्तर दिया श्री मैं उमती में अपना बहु क्यों ? तब मयूर ने उत्तर दिया कि मैं उड़ता हुआ आऊंगा और आप चलते हुए आएंगे। इसलिए उस के सहारे आप जलाशय तक पहुँच आओगे। मयूर के पंखा, एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं। अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा तो उसकी मृत्यु हो जाती है। वही हुआ। अंत में जब मयूर अन्तिम सांस है की जो जगत की प्यास बुझाते है ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ। भगवान श्री राम ने मयूर से कहा की- मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरेकर, ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म ने जरूर चुकाऊंगा। फिर अगले जन्म में, भगवान राम ने कृष्ण का अवतार लिया और अपने सिर पर मोरपंख।
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🙏 कभी-कभी छोटी सी कुर्बानी… भगवान के सबसे बड़े आशीर्वाद में बदल जाती है।
🪶 मोरपंख सिर्फ सजावट नहीं… एक अधूरी कहानी का पूरा सम्मान है।
🔥 “जो खोया था… वही सबसे बड़ा बन गया?”
क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान भी किसी का ऋण चुकाते हैं? 🤔
👉 सीख:
सच्ची निस्वार्थ सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती… भगवान उसे कई गुना बढ़ाकर लौटाते हैं।
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क्या आप निस्वार्थ सेवा में विश्वास रखते हैं?
🙏 हाँ, यही सच्ची भक्ति है
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