बोलो बद्री विशाल की जय#🙏

𓄂꯭꯭꯭꯭꯭᪵᪵⃑✿⃟꯭🍭⃟꯭͓𝐌꯭͓α꯭͓ͨ𐓣͓ͧα꯭͓ͭꪜ͓ͤ𝗂꯭🍃꯭𝅥ͦ𝆬
1.7K ने देखा
12 घंटे पहले
** श्रीबद्रीनाथ मंदिर ** में स्थापित भगवान श्रीबद्रीविशाल जी की मूर्ति अद्वितीय और अत्यंत पवित्र है। यह ** श्रीशालिग्राम शिला** (काले पत्थर) से बनी लगभग 1 मीटर (3.3 फीट) ऊँची * * स्वयंभू** (स्वतः प्रकट) प्रतिमा है। इस मूर्ति की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें भगवान विष्णु ** ध्यान मुद्रा (पद्मासन)** में विराजमान हैं, जो उनके अन्य स्वरूपों में दुर्लभ है। मूर्ति की चार भुजाएं हैं; दो ऊपरी भुजाओं में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं, जबकि अन्य दो हाथ योग मुद्रा में गोद में रखे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 8वीं शताब्दी में ** श्रीआदि शंकराचार्य जी ** ने इस दिव्य मूर्ति को अलकनंदा नदी के श्रीनारद कुंड से निकालकर मंदिर में स्थापित किया था। जय श्रीबद्रीविशाल जी🙏 #🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल #बोलो बद्री विशाल की जय#🙏 #🙏देवभूमि उत्तराखंड 🙏 #देवभूमि उत्तराखंड
sn vyas
540 ने देखा
6 दिन पहले
# जय देव भूमि उत्तराखंड मेरा गांव मेरा पहाड़ जय बद्री विशाल 🙏🙏😘😘😘😘😍😍 #🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल बद्रीनाथ मंदिर में आखिर क्यों नहीं बजाया जाता,शंख, जानें इसके पीछे की रहस्यमयी कहानी..... हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ के पहले और आखिरी में शंखनाद किया जाता है।पूजा-पाठ के साथ हर मांगलिक कार्यों के दौरान भी शंख बजाया जाता है. शंख को सुख-समृद्धि और शुभता का कारक माना गया है। कहते हैं कि शंख बजाए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।वहीं चारधामों में से एक बद्रीनाथ में शंख बजाने की मनाही है। बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु के अवतार बद्रीनारायण की पूजा की जाती है।यहां उनकी 3.3 फीट ऊंची शालिग्राम की बनी मूर्ति है। माना जाता है कि इस मूर्ति की स्थापना शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में की थी। माना जाता है कि भगवान विष्णु की यह मूर्ति यहां स्वयं स्थापित हुई थी। कहते हैं इसी स्थान पर भगवान विष्णु से तपस्या की थी। बद्रीनाथ में शंख न बजाने के पीछे कथा प्रचलित है। जिसके अनुसार जब हिमालय में दानवों का बड़ा आतंक था तब ऋषि मुनि न मंदिरों में ना ही किसी और स्थान पर भगवान की पूजा अर्चना कर पाते थे। राक्षसों के आतंक को देखकर ऋषि अगस्त्य ने मांभगवती को मदद के लिए पुकारा, जिसके बाद मां कुष्मांडा देवी के रूप में प्रकट हुईं और अपने त्रिशूल और कटार से राक्षसों को खत्म कर दिया। हालांकि मां कुष्मांडा के प्रकोप से बचने के लिए दो राक्षस आतापी और वातापी वहां से भाग निकले। इसमें से आतापी मंदाकिनी नदी में छुप गया और वातापी बद्रीनाथ धाम में जाकर शंख के अंदर घुसकर छुप गया। जिसके बाद से यहां शंख नहीं बजाया जाता। बद्रीनाथ में शंख न बजाने के पूछे एक वैज्ञानिक कारण भी है. जिसके अनुसार अगर यहां शंख बजाया जाए तो उसकी आवाज बर्फ से टकराकर ध्वनि पैदा कर करेगी जिससे बर्फ में दरार पड़ सकती है और हिमस्खलन का खतरा भी बढ़ सकते है। इसलिए यहां शंख नहीं बजाया जाता। || बद्रीनाथ धाम की जय हो ||