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जय बद्री विशाल
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sn vyas
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#🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल 🏔️ बद्रीनाथ धाम की दिव्य उत्पत्ति: नारायण की लीला और महादेव का महात्याग 🔱 यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि 'हर' (शिव) और 'हरि' (विष्णु) के बीच के अद्भुत संबंधों की है। यह वह गाथा है जहाँ एक देवता ने स्थान पाने के लिए बाल-लीला रची, तो दूसरे ने स्थान देने के लिए सर्वस्व त्याग दिया। 1. देवर्षि नारद का व्यंग्य और नारायण का संकल्प कथा का आरंभ वैकुण्ठ लोक से होता है। एक बार देवर्षि नारद, अपनी वीणा बजाते हुए श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे। नारायण शेषशय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी ने प्रणाम किया, किन्तु उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। उन्होंने कहा, "नारायण! नारायण! प्रभु, आप त्रिलोक के पालनहार हैं, संतों को तप और त्याग का उपदेश देते हैं। किन्तु स्वयं? स्वयं आप यहाँ क्षीरसागर में सुख-सुविधाओं के बीच, लक्ष्मी जी की सेवा का आनंद ले रहे हैं। पृथ्वी का सामान्य मनुष्य आपको देखकर विलासिता तो सीख सकता है, पर तपस्या की प्रेरणा कैसे ले?" नारद जी का यह व्यंग्य तीखा था, परंतु सत्य के निकट था। भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ गए कि नारद उन्हें एक नई लीला का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब एकांत में कठोर तप करेंगे और जगत के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे। 2. हिमालय की खोज और शिव का सुंदर धाम तपस्या के लिए स्थान खोजने भगवान विष्णु हिमालय की ओर निकले। अलकनंदा नदी के तट पर, नर और नारायण पर्वतों के बीच उन्हें एक अत्यंत रमणीय, शांत और दिव्य स्थान दिखाई दिया। वहां का वातावरण इतना पवित्र था कि मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाए। किन्तु एक समस्या थी। वह स्थान रिक्त नहीं था। वहां एक सुंदर कुटिया थी, जिसके द्वार पर त्रिशूल गड़ा था। यह स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का प्रिय निवास स्थान था। विष्णु जी धर्मसंकट में पड़ गए। शिव जी को वहां से हटाना न तो उचित था और न ही संभव। यदि वे सीधे मांगते, तो शिव मना नहीं करते, लेकिन विष्णु जी इसे 'लीला' के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे। 3. नारायण बने रोता हुआ बालक भगवान विष्णु ने तत्काल एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। एक ऐसा बालक जिसकी आभा सूर्य के समान थी, पर जो भूख और प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से रो रहा था। वे उसी कुटिया के द्वार पर लेट गए और क्रंदन करने लगे। संयोगवश, शिव और पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। तभी माता पार्वती के कानों में एक नन्हे बालक के रोने की आवाज पड़ी। "स्वामी! सुनिए, इस निर्जन वन में किसी नवजात शिशु के रोने की ध्वनि आ रही है," पार्वती जी व्याकुल हो उठीं। त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! उधर मत जाओ। वह कोई साधारण बालक नहीं है। यह सब माया है। उसे वहीं रहने दो।" परंतु जगत जननी माँ पार्वती का हृदय तो ममता से भरा था। उन्होंने शिव की चेतावनी अनसुनी कर दी और बोलीं, "नाथ! आप कितने कठोर हैं? एक नन्हा सा जीव द्वार पर रो रहा है और आप उसे छोड़ने को कह रहे हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकती।" पार्वती जी दौड़ी-दौड़ी गईं और उस सुंदर बालक को गोद में उठा लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक (विष्णु जी) चुप हो गया और मंद-मंद मुस्कुराने लगा। पार्वती जी उस पर मोहित हो गईं। 4. चतुराई: द्वार बंद और गृह-प्रवेश पार्वती जी ने बालक को कुटिया के भीतर सुलाया और उसे दुलारने लगीं। कुछ समय पश्चात, उन्होंने शिवजी से कहा, "स्वामी, हम स्नान के लिए तप्तकुंड (गर्म पानी का झरना) चलते हैं, तब तक बालक सो रहा है।" शिवजी ने एक बार फिर समझाया, "देवी, विचार कर लो। हम बाहर जा रहे हैं, कहीं लौटने पर यह हमारा घर ही न रहे?" पार्वती जी ने इसे मजाक समझा। दोनों स्नान के लिए चले गए। इधर, जैसे ही शिव-पार्वती आँखों से ओझल हुए, बाल रूपी विष्णु ने उठकर कुटिया का मुख्य द्वार भीतर से बंद कर लिया। जब शिव और पार्वती स्नान करके लौटे, तो देखा द्वार बंद है। पार्वती जी ने पुकारा, दरवाजा खटखटाया, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। पार्वती जी घबरा गईं, "अरे! बालक ने द्वार बंद कर लिया है, अब हम भीतर कैसे जाएंगे?" 5. महादेव का महात्याग शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। उन्होंने कहा, "उमा! मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था। वह बालक कोई और नहीं, स्वयं नारायण हैं। उन्हें यह स्थान भा गया है और वे अब यहाँ तपस्या करना चाहते हैं।" पार्वती जी अवाक रह गईं। उन्होंने पूछा, "तो अब हम क्या करेंगे? क्या हम बलपूर्वक भीतर जाएं?" तब महादेव ने जो कहा, वह उनके 'भोलेनाथ' होने का प्रमाण है। उन्होंने कहा, "नहीं प्रिये! यदि मेरे आराध्य ने छल से ही सही, मेरा स्थान माँगा है, तो मैं उन्हें यह दे देता हूँ। अब यह स्थान 'बद्रीनाथ' कहलाएगा। हम यहाँ से चलते हैं।" पार्वती जी ने पूछा, "किन्तु हम रहेंगे कहाँ?" शिवजी ने केदारखंड की ओर संकेत करते हुए कहा, "हम उस ऊँचे और दुर्गम शिखर पर अपना वास बनाएंगे, जहाँ एकांत और भी गहरा है।" और इस प्रकार, भगवान शिव ने अपना बसा-बसाया घर, अपनी प्रिय कुटिया विष्णु जी के लिए छोड़ दी और स्वयं केदारनाथ चले गए। 🌺 कथा का आध्यात्मिक सार 🌺 यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं— * विष्णु का मार्ग (लीला): जहाँ लक्ष्य प्राप्ति के लिए युक्ति और चतुराई का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उद्देश्य लोक-कल्याण होता है। * शिव का मार्ग (त्याग): जहाँ अपनी प्रिय वस्तु भी यदि कोई मांग ले, तो बिना द्वेष के उसे सौंप दिया जाता है। इसीलिए आज भी मान्यता है कि बद्रीनाथ (विष्णु धाम) की यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाती, जब तक भक्त केदारनाथ (शिव धाम) के दर्शन न कर ले। क्योंकि जहाँ नारायण का निवास है, वह भूमि महादेव के त्याग की नींव पर ही टिकी है। ।। जय बद्रीविशाल ।। ।। जय बाबा केदार ।।
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