mahabarat ke kisse

sn vyas
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12 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 331) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच (धृतराष्ट्र च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।) तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर-इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र- इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ।। १ ।। ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ।। २ ।। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ।। २ ।। वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ३ ।। घोड़े हाथी आदि वाहन हृष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ।। ३ ।। वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ।। ४ ।। सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे। शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ।। ४ ।। नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः । प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ।। ५ ।। कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था। राष्ट्र के विभिन्न प्रान्तों में सत्ययुग छा रहा था ।। ५ ।। धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः । अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ।। ६ ।। उस समय की प्रजा सत्य-व्रत के पालन में तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्म में लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मों में संलग्न रहकर एक-दूसरे को प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथ पर बढ़ती जाती थी ।। ६ ।। मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः। अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ।। ७ ।। सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ।। ७ ।। तन्महोदधिवत् पूर्ण नगरं वै व्यरोचत । द्वारतोरणनिर्यू हैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ।। ८ ।। समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ।। ८ ।। प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ।। ९ ।। सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ।। ९ ।। उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा। विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ।। १० ।। उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ।। १० ।। नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः । तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ।। ११ ।। कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ।। ११ ।। कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्र सदोत्सवाः ।। १२ ।। उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ।। १२ ।। भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते । बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ।। १३ ।। जनमेजय ! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ।। १३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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15 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) षडधिकशततमोऽध्यायः महर्षि माण्डव्य का शूली पर चढ़ाया जाना...(दिन 328) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनमेजय उवाच किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् । कस्य शापाच्च ब्रह्मर्षेः शूद्रयोनावजायत ।। १ ।। जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन् ! धर्मराज ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप प्राप्त हुआ? किस ब्रह्मर्षि के शापसे वे शूद्रयोनि में उत्पन्न हुए ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः । धृतिमान् सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ।। २ ।। वैशम्पायनजी ने कहा- राजन् ! पूर्वकाल में माण्डव्य नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो धैर्यवान्, सब धर्मों के ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तपस्वी थे ।। २ ।। स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः । ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ।। ३ ।। वे अपने आश्रमके द्वार पर एक वृक्ष के नीचे दोनों बाँहें ऊपर को उठाये हुए मौनव्रत धारण करके खड़े रहकर बड़ी भारी तपस्या करते थे। माण्डव्यजी बहुत बड़े योगी थे ।। ३ ।। तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः । तमाश्रममनुप्राप्ता दस्यवो लोप्त्रहारिणः ।। ४ ।। उस कठोर तपस्या में लगे हुए महर्षि के बहुत दिन व्यतीत हो गये। एक दिन उनके आश्रम पर चोरी का माल लिये हुए बहुत-से लुटेरे आये ।। ४ ।। अनुसार्यमाणा बहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ । ते तस्यावसथे लोप्त्रं दस्यवः कुरुसत्तम ।। ५ ।। निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते बले । तेषु लीनेष्वथो शीघ्रं ततस्तद् रक्षिणां बलम् ।। ६ ।। आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृषिं तस्करानुगाः । तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ।। ७ ।। कतमेन पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम । तेन गच्छामहे ब्रह्मन् यथा शीघ्रतरं वयम् ।। ८ ।। जनमेजय ! उन चोरों का बहुत-से सैनिक पीछा कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ ! वे दस्यु वह चोरीका माल महर्षिके आश्रममें रखकर भयके मारे प्रजा-रक्षक सेनाके आनेके पहले वहीं कहीं छिप गये। उनके छिप जानेपर रक्षकोंकी सेना शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँची। राजन् ! चोरोंका पीछा करनेवाले लोगोंने इस प्रकार तपस्यामें लगे हुए उन महर्षिको जब वहाँ देखा, तो पूछा कि 'द्विजश्रेष्ठ ! बताइये, चोर किस रास्तेसे भगे हैं? जिससे वही मार्ग पकड़कर हम तीव्र गतिसे उनका पीछा करें' ।। ५-८ ।। तथा तु रक्षिणां तेषां ब्रुवतां स तपोधनः । न किंचिद् वचनं राजन्नब्रवीत् साध्वसाधु वा ।। ९ ।। राजन्! उन रक्षकोंके इस प्रकार पूछनेपर तपस्याके धनी उन महर्षिने भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा ।। ९ ।। ततस्ते राजपुरुषा विचिन्वानास्तमाश्रमम् । ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चौरांस्तद् द्रव्यमेव च ।। १० ।। तब उन राजपुरुषोंने उस आश्रममें ही चोरोंको खोजना आरम्भ किया और वहीं छिपे हुए चोरों तथा चोरी के माल को भी देख लिया ।। १० ।। ततः शङ्का समभवद् रक्षिणां तं मुनिं प्रति । संयम्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ।। ११ ।। फिर तो रक्षकोंको मुनिके प्रति मनमें संदेह उत्पन्न हो गया और वे उन्हें बाँधकर राजाके पास ले गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजासे सब बातें बतायीं और उन चोरोंको भी राजाके हवाले कर दिया ।। ११ ।। तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाद् वध्यतामिति । स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ।। १२ ।। राजाने उन चोरोंके साथ महर्षिको भी प्राणदण्डकी आज्ञा दे दी। रक्षकोंने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया ।। १२ ।। ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनिं रक्षिणस्तदा । प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ।। १३ ।। इस प्रकार वे रक्षक माण्डव्य मुनिको शूलीपर चढ़ाकर वह सारा धन साथ ले राजाके पास लौट गये ।। १३ ।। शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः । निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ।। १४ ।। धर्मात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य दीर्घकालतक उस शूलके अग्रभागपर बैठे रहे। वहाँ भोजन न मिलनेपर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई ।। १४ ।। धारयामास च प्राणानृषींश्च समुपानयत् । शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ।। १५ ।। संतापं परमं जग्मुर्मुनयस्तपसान्विताः । ते रात्रौ शकुना भूत्वा संनिपत्य तु भारत । दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन् द्विजोत्तमम् ।। १६ ।। वे प्राण धारण किये रहे और स्मरणमात्र करके ऋषियोंको अपने पास बुलाने लगे। शूलीकी नोकपर तपस्या करनेवाले उन महात्मासे प्रभावित होकर सभी तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप हुआ। वे रातमें पक्षियोंका रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आये और अपनी शक्तिके अनुसार स्वरूपको प्रकाशित करते हुए उन विप्रवर माण्डव्य मुनिसे पूछने लगे ।। १५-१६ ।। श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् किं पापं कृतवानसि । येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ।। १७ ।। 'ब्रह्मन्! हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन-सा पाप किया है, जिससे यहाँ शूलपर बैठनेका यह महान् कष्ट आपको प्राप्त हुआ है?' ।। १७ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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22 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुरधिकशततमोऽध्यायः भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 322) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भीष्म उवाच पुनर्भरतवंशस्य हेतुं संतानवृद्धये । वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १ ।। ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्र्यताम् । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत् प्रजाः ।। २ ।। भीष्मजी कहते हैं- मातः ! भरतवंशकी संतानपरम्पराको बढ़ाने और सुरक्षित रखनेके लिये जो नियत उपाय है, उसे मैं बता रहा हूँ; सुनो। किसी गुणवान् ब्राह्मणको धन देकर बुलाओ, जो विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंके गर्भसे संतान उत्पन्न कर सके ।। १-२ ।। वैशम्पायन उवाच ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत् ।। ३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब सत्यवती कुछ हँसती और साथ ही लजाती हुई भीष्मजीसे इस प्रकार बोली। बोलते समय उसकी वाणी संकोचसे कुछ अस्पष्ट-सी हो जाती थी ।। ३ ।। सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । विश्वासात् ते प्रवक्ष्यामि संतानाय कुलस्य नः ।। ४ ।। उसने कहा- 'महाबाहु भीष्म ! तुम जैसा कहते हो वही ठीक है। तुमपर विश्वास होनेसे अपने कुलकी संततिकी रक्षाके लिये तुम्हें मैं एक बात बतलाती हूँ ।। ४ ।। न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्म तथाविधम् । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः ।। ५ ।। 'ऐसे आपद्धर्मको देखकर वह बात तुम्हें बताये बिना मैं नहीं रह सकती। तुम्हीं हमारे कुलमें मूर्तिमान् धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो और तुम्हीं परम गति हो ।। ५ ।। तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । (यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ । तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृता कुक्षौ पुरा किल ।। मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित् । मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् ।।) धर्मयुक्तस्य धर्मार्थ पितुरासीत् तरी मम ।। ६ ।। 'अतः मेरी सच्ची बात सुनकर उसके बाद जो कर्तव्य हो, उसे करो। 'भरतश्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा। पूर्वकालमें मैं उन्हींके वीर्यसे उत्पन्न हुई थी। मुझे एक मछलीने अपने पेटमें धारण किया था। एक परम धर्मज्ञ मल्लाहने जलमेंसे मेरी माताको पकड़ा, उसके पेटसे मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा। मेरे उन धर्मपरायण पिताके पास एक नौका थी, जो (धनके लिये नहीं) धर्मार्थ चलायी जाती थी ।। ६ ।। सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् । अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः ।। ७ ।। आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन् यमुनां नदीम् । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत् तदा ।। ८ ।। सान्त्वपूर्व मुनिश्रेष्ठः कामार्तों मधुरं वचः । उक्तं जन्म कुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ।। ९ ।। 'एक दिन मैं उसी नावपर गयी हुई थी। उन दिनों मेरे यौवनका प्रारम्भ था। उसी समय धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् महर्षि पराशर यमुना नदी पार करनेके लिये मेरी नावपर आये। मैं उन्हें पार ले जा रही थी, तबतक वे मुनिश्रेष्ठ काम-पीड़ित हो मेरे पास आ मुझे समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले और उन्होंने मुझसे अपने जन्म और कुलका परिचय दिया। इसपर मैंने कहा- 'भगवन्! मैं तो निषाद की पुत्री हूँ' ।। ७-९ ।। तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत । वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे ।। १० ।। 'भारत! एक ओर में पिताजीसे डरती थी और दूसरी ओर मुझे मुनिके शापका भी डर था। उस समय महर्षिने मुझे दुर्लभ वर देकर उत्साहित किया, जिससे मैं उनके अनुरोधको टाल न सकी ।। १० ।। अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ।। ११ ।। मत्स्यगन्धो महानासीत् पुरा मम जुगुप्सितः । तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात् स मे मुनिः ।। १२ ।। 'यद्यपि मैं चाहती नहीं थी, तो भी उन्होंने मुझ अबलाको अपने तेजसे तिरस्कृत करके नौकापर ही मुझे अपने वशमें कर लिया। उस समय उन्होंने कुहरा उत्पन्न करके सम्पूर्ण लोकको अन्धकारसे आवृत कर दिया था। भारत ! पहले मेरे शरीरसे अत्यन्त घृणित मछलीकी-सी बड़ी तीव्र दुर्गन्ध आती थी। उसको मिटाकर मुनिने मुझे यह उत्तम गन्ध प्रदान की थी ।। ११-१२ ।। ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् । द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ।। १३ ।। 'तदनन्तर मुनिने मुझसे कहा- 'तुम इस यमुनाके ही द्वीपमें मेरे द्वारा स्थापित इस गर्भको त्यागकर फिर कन्या ही हो जाओगी' ।। १३ ।। पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ।। १४ ।। 'उस गर्भसे पराशरजीके पुत्र महान् योगी महर्षि व्यास प्रकट हुए। वे ही द्वैपायन नामसे विख्यात हैं। वे मेरे कन्यावस्थाके पुत्र हैं ।। १४ ।। यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः । लोके व्यासत्वमापेदे कार्य्यात् कृष्णत्वमेव च ।। १५ ।। 'वे भगवान् द्वैपायन मुनि अपने तपोबलसे चारों वेदोंका पृथक् पृथक् विस्तार करके लोकमें 'व्यास' पदवीको प्राप्त हुए हैं। शरीरका रंग साँवला होनेसे उन्हें लोग 'कृष्ण' भी कहते हैं ।। १५ ।। सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः। समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः ।। १६ ।। 'वे सत्यवादी, शान्त, तपस्वी और पापशून्य हैं। वे उत्पन्न होते ही बड़े होकर उस द्वीपसे अपने पिताके साथ चले गये थे ।। १६ ।। स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः । भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ।। १७ ।। 'मेरे और तुम्हारे आग्रह करने पर वे अनुपम तेजस्वी व्यास अवश्य ही अपने भाई के क्षेत्र में कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेंगे ।। १७ ।। स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति । तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि ।। १८ ।। 'उन्होंने जाते समय मुझसे कहा था कि संकटके समय मुझे याद करना। महाबाहु भीष्म ! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं उन्हींका स्मरण करूँ ।। १८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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25 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 319) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः । शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ।। ४२ ।। तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व शान्तनुनन्दन भीष्मपर सैकड़ों और हजारों शीघ्रगामी बाणोंकी बौछार करने लगा ।। ४२ ।। पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः । विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाब्रुवन् ।। ४३ ।। शाल्वने पहले ही भीष्मको पीड़ित कर दिया। यह देखकर सभी राजा आश्चर्यचकित हो गये और 'वाह-वाह' करने लगे ।। ४३ ।। लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः । अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ।। ४४ ।। युद्धमें उसकी फुर्ती देख सब राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपनी वाणीद्वारा शाल्वनरेशकी प्रशंसा करने लगे ।। ४४ ।। क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः । क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ।। ४५ ।। शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने क्षत्रियोंकी वे बातें सुनकर कुपित हो शाल्वसे कहा- 'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ४५ ।। सारथिं चाब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः । यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ।। ४६ ।। फिर सारथिसे कहा- 'जहाँ यह राजा शाल्व है, उधर ही रथ ले चलो। जैसे पक्षिराज गरुड सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार मैं इसे अभी मार डालता हूँ' ।। ४६ ।। ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग योजयामास कौरवः । तेनाश्वांश्चतुरोऽमृ‌द्माच्छाल्वराजस्य भूपते ।। ४७ ।। जनमेजय! तदनन्तर कुरुनन्दन भीष्मने धनुषपर उचित रीतिसे वारुणास्त्रका संधान किया और उसके द्वारा शाल्वराजके चारों घोड़ोंको रौंद डाला ।। ४७ ।। अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः । भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत् तस्य सारथिम् ।। ४८ ।। नृपश्रेष्ठ ! फिर अपने अस्त्रोंसे राजा शाल्वके अस्त्रोंका निवारण करके कुरुवंशी भीष्मने उसके सारथिको भी मार डाला ।। ४८ ।। अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत् तुरगोत्तमान् । कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ।। ४९ ।। जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् । ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ।। ५० ।। स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा । राजानो ये च तत्रासन् स्वयंवरदिदृक्षवः ।। ५१ ।। स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः । एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ।। ५२ ।। प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ।। ५३ ।। तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया। नरश्रेष्ठ ! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कन्याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड दिया। जनमेजय ! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा। इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो-जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने-अपने देशको चले गये। प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे ।। ४९-५३ ।। यथा पितास्य कौख्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः । सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ।। ५४ ।। वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान् । अक्षतः क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रमः ।। ५५ ।। उनके पिता कुरुश्रेष्ठ नृपशिरोमणि शान्तनु जिस प्रकार राज्य करते थे, वैसा ही वे भी करते थे। जनमेजय ! भीष्मजी थोड़े ही समयमें वन, नदी, पर्वतोंको लाँघते और नाना प्रकारके वृक्षोंको लाँघते और पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गये। युद्धमें उनका पराक्रम अवर्णनीय था। उन्होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओंको ही क्षति पहुँचायी थी ।। ५४-५५ ।। आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः । स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ।। ५६ ।। यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् । आनिन्ये स महाबाहुर्भातुः प्रियचिकीर्षया ।। ५७ ।। धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्म काशिराजकी कन्याओंको पुत्रवधू, छोटी बहिन एवं पुत्रीकी भाँति साथ रखकर कुरुदेशमें ले आये। वे महाबाहु अपने भाई विचित्रवीर्यका प्रिय करनेकी इच्छासे उन सबको लाये थे ।। ५६-५७ ।। ताः सर्वगुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ।। ५८ ।। भाई भीष्मने अपने पराक्रमद्वारा हरकर लायी हुई उन सर्वसद्‌गुणसम्पन्न कन्याओंको अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यके हाथमें दे दिया ।। ५८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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1 महीने पहले
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) नवनवतितमोऽध्यायः महर्षि वसिष्ठ द्वारा वसुओं को शाप प्राप्त होने की कथा...(दिन 304) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शान्तनुरुवाच आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् । यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ।। १ ।। शान्तनुने पूछा-देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपवके शापसे उन सबको मनुष्य-योनिमें आना पड़ा ।। १ ।। अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् । यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ।। २ ।। और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोक में निवास करेगा ।। २ ।। मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ।। ३ ।। ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम्। जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्य लोक में उत्पन्न हुए? यह सब बात मुझे बताओ ।। ३ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् । भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- नरश्रेष्ठ जनमेजय ! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकार पूछनेपर जहुपुत्री गंगादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ।। ४ ।। गङ्गोवाच यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम । वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ।। ५ ।। गंगा बोलीं- भरतश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही 'आपव' नामसे विख्यात हैं ।। ५ ।। तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् । मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ।। ६ ।। गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है। सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ।। ६ ।। स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम । वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ।। ७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ।। ७ ।। दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता। गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ।। ८ ।। महाराज ! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ।। ८ ।। अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ।। ९ ।। वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ।। ९ ।। सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ।। १० ।। वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ।। १० ।। अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ। पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ।। ११ ।। भरतश्रेष्ठ ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ।। ११ ।। ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ।। १२ ।। वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ।। १२ ।। तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ।। १३ ।। इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल ! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ।। १३ ।। नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ।। १४ ।। राजेन्द्र ! सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवालों में उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्ति से वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ।। १४ ।। द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण । आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभाम् ।। १५ ।। उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ।। १६ ।। दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन । द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ।। १७ ।। उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान् वदन् । एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा ।। १८ ।। ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् । अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ।। १९ ।। दशवर्षसहस्राणि स जीवेत् स्थिरयौवनः । एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ।। २० ।। तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ।। २१ ।। वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले महाराज ! उस देवीने द्यो नामक वसुको वह शुभ गाय दिखायी, जो भलीभाँति हृष्ट-पुष्ट थी। दूधसे भरे हुए उसके थन बड़े सुन्दर थे, पूँछ और खुर भी बहुत अच्छे थे। वह सुन्दर गाय सभी सद्‌गुणोंसे सम्पन्न और सर्वोत्तम शील-स्वभावसे युक्त थी। पूरुवंशका आनन्द बढ़ानेवाली सम्राट् ! इस प्रकार पूर्वकालमें वसुका आनन्द बढ़ानेवाली देवीने अपने पति वसुको ऐसे सद्‌गुणोंवाली गौका दर्शन कराया। गजराजके समान पराक्रमी महाराज! द्योने उस गायको देखते ही उसके रूप और गुणोंका वर्णन करते हुए अपनी पत्नीसे कहा- 'यह कजरारे नेत्रोंवाली उत्तम गौ दिव्य है। वरारोहे! यह उन वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठकी गाय है, जिनका यह उत्तम तपोवन है। सुमध्यमे ! जो मनुष्य इसका स्वादिष्ट दूध पी लेगा, वह दस हजार वर्षोंतक जीवित रहेगा और उतने समयतक उसकी युवावस्था स्थिर रहेगी।' नृपश्रेष्ठ ! सुन्दर कटि-प्रदेश और निर्दोष अंगोंवाली वह देवी यह बात सुनकर अपने तेजस्वी पतिसे बोली- 'प्राणनाथ! मनुष्यलोकमें एक राजकुमारी मेरी सखी है' ।। १५-२१ ।। नाम्ना जितवती नाम रूपयौवनशालिनी। उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसंधस्य धीमतः ।। २२ ।। दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसम्पदा । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ।। २३ ।। 'उसका नाम है जितवती। वह सुन्दर रूप और युवावस्थासे सुशोभित है। सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् राजर्षि उशीनरकी पुत्री है। रूपसम्पत्तिकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें उसकी बड़ी ख्याति है। महाभाग ! उसीके लिये बछड़ेसहित यह गाय लेनेकी मेरी बड़ी इच्छा है ।। २२-२३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
sn vyas
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1 महीने पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) सप्तनवतितमोऽध्यायः राजा प्रतीप का गंगा को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करना और शान्तनु का जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगा से मिलना...(दिन 301) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव । त्वामाव्रजेद् यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ।। २१ ।। कामयानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया । सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ।। २२ ।। शान्तनो! पूर्वकालमें मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी। उसका आगमन तुम्हारे कल्याणके लिये ही हुआ था। बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्तमें तुम्हारे पास आवे, तुम्हारे प्रति कामभावसे युक्त हो और तुमसे पुत्र पानेकी इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तम रूपसे सुशोभित उस दिव्य नारीसे 'अंगने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इत्यादि प्रश्न न करना ।। २१-२२ ।। यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ । मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ।। २३ ।। 'अनघ ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये। यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना।' ये बातें राजा प्रतीपने अपने पुत्रसे कहीं ।। २३ ।। वैशम्पायन उवाच एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा । स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ।। २४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसी समय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ।। २४ ।। स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजसमद्युतिः। बभूव मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः ।। २५ ।। बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे हिंसक पशुओंको मारनेके उद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे ।। २५ ।। स मृगान् महिषांश्चैव विनिघ्नन् राजसत्तमः । गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ।। २६ ।। राजाओंमें श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसोंको मारते हुए सिद्ध एवं चारणोंसे सेवित गंगाजीके तटपर अकेले ही विचरण करते थे ।। २६ ।। स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम्। जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।। २७ ।। महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो ।। २७ ।। सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् । सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ।। २८ ।। उसके सारे अंग परम सुन्दर और निर्दोष थे। दाँत तो और भी सुन्दर थे। वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरपर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमल के भीतरी भाग के समान उसकी कान्ति थी, वह अकेली थी ।। २८ ।। तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद् विस्मितो रूपसम्पदा । पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ।। २९ ।। उसे देखते ही राजा शान्तनुके शरीरमें रोमांच हो आया, वे उसकी रूप-सम्पत्तिसे आश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रोंद्वारा उसकी सौन्दर्य-सुधाका पान करते हुए-से तृप्त नहीं होते थे ।। २९ ।। सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम्। स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ।। ३० ।। वह भी वहाँ विचरते हुए महातेजस्वी राजा शान्तनुको देखते ही मुग्ध हो गयी। स्नेहवश उसके हृदयमें सौहार्दका उदय हो आया। वह विलासिनी राजाको देखते-देखते तृप्त नहीं होती थी ।। ३० ।। तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्शलक्ष्णया गिरा । देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सराः ।। ३१ ।। यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे । याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ।। ३२ ।। तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें बोले- 'सुमध्यमे ! तुम देवी, दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ; देवकन्याके समान सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी हो जाओ' ।। ३१-३२ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्यायः।। ९७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शान्तनूपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️