#🦠इबोला से 321 बीमार, 48 की मौत 😢 कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) और युगांडा सहित पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इबोला वायरस के एक नए और बेहद खतरनाक स्ट्रेन ने तबाही मचा रखी है. सरकारी आंकड़ों और रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जानलेवा बीमारी के मामलों की संख्या बढ़कर 321 हो गई है. वायरस तीन अलग-अलग प्रांतों में फैल चुका है. अब तक इस बीमारी से 48 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब 1100 संदिग्ध मामले सामने आए हैं.
यह इबोला के 'बुंडिबुग्यो' (Bundibugyo) स्ट्रेन के कारण फैला है, जिसके खिलाफ फिलहाल दुनिया में कोई भी टीका या सटीक इलाज मौजूद नहीं है. हालात की गंभीरता को देखते हुए वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों ने इसे पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया है. इसी बीच, महामारी से निपटने के लिए वैश्विक संस्था 'सेपी' (CEPI) ने युद्ध स्तर पर वैक्सीन तैयार करने के लिए $60 मिलियन (लगभग 570 करोड़ रुपये) के फंड का एलान किया है.
वैक्सीन के विकास के लिए तीन बड़ी संस्थाओं को मिला भारी फंड
इबोला बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी टीका विकसित करने के लिए CEPI ने अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना (Moderna), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (IAVI) को करीब 60 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है.
सेपी वही संस्था है जिसने कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में भी वैक्सीन बनाने के लिए बढ़-चढ़कर फंड दिया था. सेपी के प्रमुख रिचर्ड हैचेट ने उम्मीद जताई है कि इस फंडिंग की मदद से अगले कुछ ही महीनों के भीतर नई वैक्सीन इंसानी ट्रायल के लिए तैयार हो सकती है. इस रेस में हर एक दिन बेहद कीमती है क्योंकि वायरस का संक्रमण तेजी से नए इलाकों में फैल रहा है, जिससे आम लोगों की जान पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
मॉडर्ना, ऑक्सफोर्ड और सीरम इंस्टीट्यूट की तकनीक पर टिकी उम्मीदें
इस पूरे मिशन में सबसे बड़ी रकम मॉडर्ना कंपनी को दी जा रही है. सेपी ने मॉडर्ना के संभावित टीके के शुरुआती क्लीनिकल टेस्ट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए 50 मिलियन डॉलर देने का वादा किया है. इसके अलावा, ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी 'सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' (SII) को इस काम के लिए 8.6 मिलियन डॉलर दिए जाएंगे.
पुरानी सफल तकनीक और जानवरों पर टेस्ट के सकारात्मक नतीजे
तीसरी संस्था IAVI को इस प्रोजेक्ट के लिए शुरुआती तौर पर 3.2 मिलियन डॉलर दिए गए हैं. IAVI की सिंगल-डोज (एक खुराक वाली) वैक्सीन उसी तकनीक का इस्तेमाल करती है, जिसका उपयोग मर्क (Merck) कंपनी की 'इरवेबो' (Ervebo) वैक्सीन में किया गया था.
इरवेबो को इबोला के 'जायरे' (Zaire) स्ट्रेन को रोकने के लिए मंजूरी मिली हुई है. राहत की बात यह है कि जानवरों पर किए गए शुरुआती अध्ययनों में IAVI की इस नई वैक्सीन के बेहद सकारात्मक नतीजे देखे गए हैं. यह तकनीक पहले से परखी हुई है, इसलिए बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ बेहतर परिणाम मिलने की पूरी उम्मीद है.
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