bhagwaan

sn vyas
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2 days ago
#भगवान #भक्ति #जय श्री कृष्ण दर्शन दो घनश्याम, दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे.. मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दिखे सुरत तेरी, युग बिते ना आई मिलन की पूर्णमासी रे.. दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे.. द्वार दया का जब तू खोले, पंच सुर मे गंगा बोले, अंधा देखेँ लंगङा चल कर पँहुचे काशी रे.. दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे.. पानी पी कर प्यास बुझाऊँ, नैनोँ को कैसै समझाऊँ, आँख मिचौली छोङो अब तो घट-घट वासी रे.. दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे.. जय श्रीकृष्ण.... .
sn vyas
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7 days ago
#भगवान #भ भक्ति भावनाएं #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 ‼️*"||ॐ श्री परमात्मने नमः||"*‼️ 🙏🏻"भगवान मेरे हैं"-🙏-- ❣️यह प्रेम का जनक है! प्रेम होता हैं अपनापन से! हमारे को अब पता लग गया कि "हम भगवान के हैं,भगवान हमारे हैं"!अब हमारा दूसरा जन्म क्यों होगा?अब हमारा जनम - मरण कट गया*।।❣️ *🏵️ ✓✓म्हारा पना है - ये प्रेम का जनक है! प्रेम तपस्या से नहीं होता! त्याग से नहीं होता! प्रेम--👇---*"अपनापन से " होता है! ये मार्मिक बात है! मेरे को भी बहुत बाद में ये बात मालूम हुई! पीछे मालूम हुआ, संतो की कृपा से मालूम हुआ, कि "भगवान का प्रेम" कैसे हो? अपनापन से!✓✓**🏵️ ✓ 🧘*""भगवान "हमारे हैं! प्रेम करने का कोई साधन नहीं होता है। प्रेम तो अपनापन से होता है! भगवान के समान अपना कोई नहीं है। भगवान के समान कोई नहीं है,भगवान म्हारा है, मैं भगवान का हूं,खास भगवान का लड़का हूं मैं। भगवान का होने से सब काम ठीक हो जाएगा।🏵️* *🌻तुलसी दास जी महाराज कहते हैं कि ""बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब ही आज,होई राम को नाम" । भगवान के हैं हम ,भूल गए,अब पता लग गया । *🌻 🛐*✓✓"हम भगवान के हैं"! ये मामूली बात नहीं है! ये बहुत बड़ा भजन है! नाम जप करना, याद करना, कीर्तन करना भजन है,परंतु ""मैं भगवान का हूं"" यह भजन के बराबर ही है!*🛐 🤹*भगवान हमारे हैं! हरेक हालत में भगवान हमारे हैं!* *ये भजन मामूली नहीं है! भगवान हमारे हैं ये बहुत ऊंचा भजन है! हमारा जनम - मरण कट गया सारा! ""हम भगवान के हैं,भगवान के हैं!✓✓""*🌻 *🌺 हमारा जनम क्यों होगा?* ✓✓अब पता लग गया कि "हम भगवान के हैं""! ""भगवान हमारे हैं""! ये बात बैठ जानी चाहिए भीतर में! हमारे भगवान है,मेरे भगवान हैं! भगवान का सम्बन्ध हो गया! और कितनी बाते सुनो, साधन करो, सब गौण है! मूल में बात यह है कि हम भगवान के हैं!🌺*✓✓ *🏵️ आप कैसे ही हो ,पापी हो पुण्यात्मा हो। कितने ही पापी हो जाय, दुष्ट हो जाय, "भगवान के हैं" इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता! आप कितने ही पापी हो जाओ पर भगवान के नहीं हो, ये कैसे हो जाएगा! ईश्वर के अंश तो है ही! हैं तो भगवान के ही! जैसे भी हैं भगवान के हैं। बहुत बढ़िया बात है,सीधी बात है!**🏵️ 👩‍❤️‍👩जो पापात्मा होगा, वो ये थोड़े ही मानेगा कि मैं भगवान का हूं!भगवान तो मान लेंगे कि पापात्मां भी मेरा है!*👩‍❤️‍👩 🕉️*भगवान कहते हैं कि "मेरा है!" इसको कौन रद्दी कर सकता है, किसकी ताकत है!* *""सब मम प्रिय सब मम उपजाए",! मेरे पैदा किए हुवे है! मेरे प्यारे हैं सब! "ममे वांसो जीव लोके" ,इसको कैसे हटाओगे आप? "ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख रासी"-- कैसे हटाओगे? सो माया वस भयउ गुसाई, बंधयो कीट मरकट की नाई"!*🕉️ 🙏 नारायण!नारायण!🙏
utsav Art ❤
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7 days ago
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जिसके दिल में विष्णु बसते हैं, उसका हर दिन गुरुवार जैसा शुभ होता है 🙏 ॐ नमो नारायणाय 💛 #VishnuBhakti #vishnu #krishna #kanha #katha #bhagwan
Dr. Monika
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10 days ago
शिव भी तुम ओर सत्य भी तुम #viral #shorts #bhagwan #bhole #whatsapp
sn vyas
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1 months ago
#भगवान *"क्या भगवान भोजन करते हैं? क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं, तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती ? और यदि नहीं खाते हैं, तो भोग लगाने का क्या लाभ ? एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से यह प्रश्न किया। गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया। वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे। उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया: पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें। अगले दिन गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं ? उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया। फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया, तो शिष्य ने कहा कि" वे चाहें, तो पुस्तक देख लें; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है।” गुरु ने पुस्तक देखते हुए कहा“ श्लोक तो पुस्तक में ही है, तो तुम्हारे दिमाग में कैसे चला गया? शिष्य कुछ भी उत्तर नहीं दे पाया। तब गुरु ने कहा“ पुस्तक में जो श्लोक है, वह स्थूल रूप में है। तुमने जब श्लोक पढ़ा, तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे दिमाग में प्रवेश कर गया,उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मस्तिष्क में रहता है। और जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया, तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई। इसी प्रकार पूरेविश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं,और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती। उसी को हम *प्रसाद* के रूप में ग्रहण करते हैं। शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया।