जय मां नर्मदा #जय मां जीवन दायनीय #हर हर गंगे #🙌🙏🚩

sn vyas
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10 days ago
गंगा को "जाह्नवी" क्यों कहते हैं... #हर हर गंगे मां🙏🙏 #🙏हर की पौड़ी हरिद्वार 🙏गंगा नदी 🙏👌हर हर गंगे🙏 #जय माँ गंगे हर हर गंगे प्राचीन काल में राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार का एकमात्र उपाय था कि स्वर्गलोक से माँ गंगा पृथ्वी पर आएँ और उनके पवित्र जल का स्पर्श उन तक पहुँचे। कई पीढ़ियाँ बीत गईं, लेकिन यह कार्य कोई पूरा न कर सका। अंततः राजा भगीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दी। किंतु उन्होंने चेतावनी दी कि गंगा का वेग इतना प्रचंड है कि पृथ्वी उसका भार सहन नहीं कर पाएगी। तब भगवान शिव ने करुणावश गंगा को अपनी विशाल जटाओं में धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया। जब माँ गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चल रही थीं, तो उनका तीव्र प्रवाह पर्वतों, वनों और आश्रमों को पार करता हुआ आगे बढ़ने लगा। इसी मार्ग में महान तपस्वी महर्षि जह्नु का आश्रम था, जहाँ वे गहन तप और यज्ञ में लीन थे। गंगा की तेज धारा ने देखते ही देखते उनके आश्रम और यज्ञशाला को जलमग्न कर दिया। अपनी तपस्या में विघ्न देखकर महर्षि जह्नु अत्यंत क्रोधित हो उठे। अपने अद्भुत तपोबल से उन्होंने पूरी गंगा को अपनी अंजलि में समेट लिया और एक ही घूँट में पी गए। क्षणभर में गंगा का प्रवाह रुक गया और चारों ओर आश्चर्य छा गया। गंगा के लुप्त होते ही राजा भगीरथ का महान संकल्प अधूरा रह गया। वे अत्यंत व्याकुल हो गए। तब भगीरथ, देवताओं और अनेक ऋषि-मुनियों ने महर्षि जह्नु के समक्ष विनम्र होकर प्रार्थना की कि वे माँ गंगा को पुनः मुक्त करें, ताकि समस्त लोकों का कल्याण हो सके। भगीरथ की विनम्रता और देवताओं की प्रार्थना से महर्षि जह्नु का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने अपनी योगशक्ति से अपने दाहिने कान से गंगा को पुनः प्रकट किया। इस प्रकार गंगा का मानो पुनर्जन्म हुआ और तभी से उन्हें "जाह्नवी" कहा जाने लगा, अर्थात महर्षि जह्नु की पुत्री। इसके बाद माँ गंगा पुनः भगीरथ के साथ आगे बढ़ीं और उस स्थान तक पहुँचीं जहाँ राजा सगर के पुत्रों की अस्थियाँ थीं। गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से सभी को मोक्ष प्राप्त हुआ और राजा भगीरथ की वर्षों की तपस्या सफल हुई। तभी से किसी असंभव कार्य को अथक प्रयास से पूरा करने को "भगीरथ प्रयत्न" कहा जाता है। स्रोत: यह प्रसंग मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड), महाभारत, ब्रह्म पुराण, भागवत पुराण तथा अन्य पुराणों में वर्णित गंगा अवतरण की कथाओं में मिलता है।
sn vyas
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1 months ago
#जय मां नर्मदा #जय मां नर्मदा 🙏🙏🌄🌄 #मां नर्मदा नर्मदा नदी की पौराणिक और लोक कथाएँ अत्यंत विस्तृत और भावुक हैं। इनमें से सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कथा नर्मदा, सोनभद्र और जोहिला के त्रिकोण प्रेम और विरह की है, जो यह बताती है कि क्यों नर्मदा अन्य नदियों के विपरीत दिशा में बहती है। प्राचीन काल की बात है, नर्मदा (जो राजा मेखल की पुत्री मानी जाती हैं) और सोनभद्र (एक शक्तिशाली राजकुमार या नद) के बीच विवाह तय हुआ था। दोनों के बीच प्रेम पत्राचार था, हालांकि उन्होंने एक-दूसरे को देखा नहीं था। राजकुमार सोनभद्र के वैभव और वीरता की कहानियाँ सुनकर नर्मदा उनसे प्रभावित थीं। विवाह का शुभ मुहूर्त निकट था। उत्सुकता वश, नर्मदा ने अपनी प्रिय सखी और दासी 'जोहिला' को सोनभद्र के पास भेजा ताकि वह देख सके कि राजकुमार कैसे दिखते हैं और उन्हें उपहार दे सके। नर्मदा ने प्रेम स्वरूप अपना रेशमी दुपट्टा और आभूषण जोहिला को दिए। जब जोहिला सोनभद्र के पास पहुँची, तो वह राजकुमार के ठाठ-बाट और रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई। उसने नर्मदा के दिए हुए आभूषण खुद पहन लिए और सोनभद्र के सामने राजकुमारी बनकर प्रस्तुत हुई। सोनभद्र भी उसे ही राजकुमारी नर्मदा समझ बैठे और उन पर मोहित हो गए। काफी समय बीत गया और जोहिला वापस नहीं आई। चिंतित होकर नर्मदा स्वयं सोनभद्र से मिलने चल पड़ीं। जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि उनके होने वाले पति सोनभद्र उनकी दासी जोहिला के साथ प्रेम-विहार कर रहे थे। इस धोखे को देखकर नर्मदा आत्मग्लानि और क्रोध से भर उठीं। उन्हें अपनी सखी और प्रियतम, दोनों से ही घृणा हो गई। उन्होंने उसी क्षण निर्णय लिया कि वह इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगी। क्रोध में भरी नर्मदा तुरंत पीछे मुड़ गईं और विपरीत दिशा (पश्चिम की ओर) चल पड़ीं। सोनभद्र को जब अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उन्होंने नर्मदा को बहुत पुकारा और रोकने की कोशिश की, लेकिन नर्मदा ने पलटकर नहीं देखा। उन्होंने आजीवन 'कुमारी' रहने का संकल्प लिया और कहा कि वह अब कभी किसी से नहीं मिलेंगी। यही कारण है कि भौगोलिक रूप से भी नर्मदा नदी, सोन और जोहिला (जो अंततः सोन में मिल जाती है) से अलग होकर पश्चिम की ओर बहती है, जबकि भारत की अन्य बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर जाती हैं। नर्मदा के उद्गम की दूसरी कथा (शिव का वरदान) एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब अंधकासुर के वध के बाद भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित और पसीने से तर-बतर थे, तब उनके पसीने की बूंदों से अमरकंटक की पहाड़ियों पर एक तेजस्विनी कन्या का जन्म हुआ। शिव उस कन्या की सुंदरता और पवित्रता से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उसे वरदान दिया कि वह युगों-युगों तक अक्षुण्ण रहेगी और उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा। माना जाता है कि जब पूरी दुनिया में प्रलय आता है और सब कुछ जलमग्न हो जाता है, तब भी नर्मदा का अस्तित्व बना रहता है। इसीलिए इसे 'अविनाशी' नदी भी कहा जाता है। नर्मदा की कहानी इसके 'परिक्रमा' के बिना अधूरी है। यह विश्व की एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी पूरी परिक्रमा की जाती है। श्रद्धालु अमरकंटक से अपनी यात्रा शुरू करते हैं, नदी के किनारे-किनारे अरब सागर (भड़ौच) तक जाते हैं और फिर दूसरी तरफ से वापस अमरकंटक लौटते हैं। यह लगभग 3,312 किलोमीटर की कठिन यात्रा है, जिसे लोग श्रद्धा के साथ महीनों में पूरा करते हैं।