जय बद्री विशाल

𓄂꯭꯭꯭꯭꯭᪵᪵⃑✿⃟꯭🍭⃟꯭͓𝐌꯭͓α꯭͓ͨ𐓣͓ͧα꯭͓ͭꪜ͓ͤ𝗂꯭🍃꯭𝅥ͦ𝆬
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2 months ago
** श्रीबद्रीनाथ मंदिर ** में स्थापित भगवान श्रीबद्रीविशाल जी की मूर्ति अद्वितीय और अत्यंत पवित्र है। यह ** श्रीशालिग्राम शिला** (काले पत्थर) से बनी लगभग 1 मीटर (3.3 फीट) ऊँची * * स्वयंभू** (स्वतः प्रकट) प्रतिमा है। इस मूर्ति की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें भगवान विष्णु ** ध्यान मुद्रा (पद्मासन)** में विराजमान हैं, जो उनके अन्य स्वरूपों में दुर्लभ है। मूर्ति की चार भुजाएं हैं; दो ऊपरी भुजाओं में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं, जबकि अन्य दो हाथ योग मुद्रा में गोद में रखे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 8वीं शताब्दी में ** श्रीआदि शंकराचार्य जी ** ने इस दिव्य मूर्ति को अलकनंदा नदी के श्रीनारद कुंड से निकालकर मंदिर में स्थापित किया था। जय श्रीबद्रीविशाल जी🙏 #🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल #बोलो बद्री विशाल की जय#🙏 #🙏देवभूमि उत्तराखंड 🙏 #देवभूमि उत्तराखंड
sn vyas
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2 months ago
# जय देव भूमि उत्तराखंड मेरा गांव मेरा पहाड़ जय बद्री विशाल 🙏🙏😘😘😘😘😍😍 #🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल बद्रीनाथ मंदिर में आखिर क्यों नहीं बजाया जाता,शंख, जानें इसके पीछे की रहस्यमयी कहानी..... हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ के पहले और आखिरी में शंखनाद किया जाता है।पूजा-पाठ के साथ हर मांगलिक कार्यों के दौरान भी शंख बजाया जाता है. शंख को सुख-समृद्धि और शुभता का कारक माना गया है। कहते हैं कि शंख बजाए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।वहीं चारधामों में से एक बद्रीनाथ में शंख बजाने की मनाही है। बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु के अवतार बद्रीनारायण की पूजा की जाती है।यहां उनकी 3.3 फीट ऊंची शालिग्राम की बनी मूर्ति है। माना जाता है कि इस मूर्ति की स्थापना शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में की थी। माना जाता है कि भगवान विष्णु की यह मूर्ति यहां स्वयं स्थापित हुई थी। कहते हैं इसी स्थान पर भगवान विष्णु से तपस्या की थी। बद्रीनाथ में शंख न बजाने के पीछे कथा प्रचलित है। जिसके अनुसार जब हिमालय में दानवों का बड़ा आतंक था तब ऋषि मुनि न मंदिरों में ना ही किसी और स्थान पर भगवान की पूजा अर्चना कर पाते थे। राक्षसों के आतंक को देखकर ऋषि अगस्त्य ने मांभगवती को मदद के लिए पुकारा, जिसके बाद मां कुष्मांडा देवी के रूप में प्रकट हुईं और अपने त्रिशूल और कटार से राक्षसों को खत्म कर दिया। हालांकि मां कुष्मांडा के प्रकोप से बचने के लिए दो राक्षस आतापी और वातापी वहां से भाग निकले। इसमें से आतापी मंदाकिनी नदी में छुप गया और वातापी बद्रीनाथ धाम में जाकर शंख के अंदर घुसकर छुप गया। जिसके बाद से यहां शंख नहीं बजाया जाता। बद्रीनाथ में शंख न बजाने के पूछे एक वैज्ञानिक कारण भी है. जिसके अनुसार अगर यहां शंख बजाया जाए तो उसकी आवाज बर्फ से टकराकर ध्वनि पैदा कर करेगी जिससे बर्फ में दरार पड़ सकती है और हिमस्खलन का खतरा भी बढ़ सकते है। इसलिए यहां शंख नहीं बजाया जाता। || बद्रीनाथ धाम की जय हो ||
sn vyas
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3 months ago
# जय देव भूमि उत्तराखंड मेरा गांव मेरा पहाड़ जय बद्री विशाल 🙏🙏😘😘😘😘😍😍 #🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल लीला से जन्मा बद्रीनाथ धाम यह कहानी बद्रीनाथ धाम की उत्पत्ति से जुड़ी एक बहुत ही प्रसिद्ध और रोचक पौराणिक कथा है। यह कथा मुख्य रूप से यह दर्शाती है कि कैसे भगवान विष्णु ने अपनी चतुराई और भगवान शिव ने अपनी उदारता के कारण इस पवित्र स्थान का आदान-प्रदान किया। यहाँ इस कहानी का मूल संदर्भ और सार दिया गया है: कथा का मूल भाव: 'लीला' और 'त्याग' इस कहानी को "बद्रीनाथ का छल" या "विष्णु की बाल लीला" के नाम से भी जाना जाता है। एक दिन नारायण यानी विष्णु के पास नारद गए और बोले, 'आप मानवता के लिए एक खराब मिसाल हैं। आप हर समय शेषनाग के ऊपर लेटे रहते हैं। आपकी पत्नी लक्ष्मी हमेशा आपकी सेवा में लगी रहती हैं, और आपको लाड़ करती रहती हैं। इस ग्रह के अन्य प्राणियों के लिए आप अच्छी मिसाल नहीं बन पा रहे हैं। आपको सृष्टि के सभी जीवों के लिए कुछ अर्थपूर्ण कार्य करना चाहिए।' इस आलोचना से बचने और साथ ही अपने उत्थान के लिए (भगवान को भी ऐसा करना पड़ता है) विष्णु तप और साधना करने के लिए सही स्थान की तलाश में नीचे हिमालय तक आए। वहां उन्हें मिला बद्रीनाथ, एक अच्छा-सा, छोटा-सा घर, जहां सब कुछ वैसा ही था जैसा उन्होंने सोचा था। साधना के लिए सबसे आदर्श जगह लगी उन्हें यह। वह उस घर के अंदर गए। घुसते ही उन्हें पता चल गया कि यह तो शिव का निवास है और वह तो बड़े खतरनाक व्यक्ति हैं। अगर उन्हें गुस्सा आ गया तो वह आपका ही नहीं, खुद का भी गला काट सकते हैं। ऐसे में नारायण ने खुद को एक छोटे-से बच्चे के रूप में बदल लिया और घर के सामने बैठ गए। उस वक्त शिव और पार्वती बाहर कहीं टहलने गए थे। जब वे घर वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बच्चा जोर-जोर से रो रहा है। पार्वती को दया आ गई। उन्होंने बच्चे को उठाने की कोशिश की। शिव ने पार्वती को रोकते हुए कहा, 'इस बच्चे को मत छूना।’ पार्वती ने कहा, 'कितने क्रूर हैं आप ! कैसी नासमझी की बात कर रहे हैं? मैं तो इस बच्चे को उठाने जा रही हूं। देखिए तो कैसे रो रहा है।' शिव बोले, 'जो तुम देख रही हो, उस पर भरोसा मत करो। मैं कह रहा हूं न, इस बच्चे को मत उठाओ।’ बच्चे के लिए पार्वती की स्त्रीसुलभ मनोभावना ने उन्हें शिव की बातों को नहीं मानने दिया। उन्होंने कहा, 'आप कुछ भी कहें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे अंदर की मां बच्चे को इस तरह रोते नहीं देख सकती। मैं तो इस बच्चे को जरूर उठाऊंगी।’ और यह कहकर उन्होंने बच्चे को उठाकर अपनी गोद में ले लिया। बच्चा पार्वती की गोद में आराम से था और शिव की तरफ बहुत ही खुश होकर देख रहा था। शिव इसका नतीजा जानते थे, लेकिन करें तो क्या करें? इसलिए उन्होंने कहा, 'ठीक है, चलो देखते हैं क्या होता है।’ पार्वती ने बच्चे को खिला-पिला कर चुप किया और वहीं घर पर छोडक़र खुद शिव के साथ गर्म पानी से स्नान के लिए बाहर चली गईं। वहां पर गर्म पानी के कुंड हैं, उसी कुंड पर स्नान के लिए शिव-पार्वती चले गए। लौटकर आए तो देखा कि घर अंदर से बंद था। शिव तो जानते ही थे कि अब खेल शुरू हो गया है। पार्वती हैरान थीं कि आखिर दरवाजा किसने बंद किया? शिव बोले, 'मैंने कहा था न, इस बच्चे को मत उठाना। तुम बच्चे को घर के अंदर लाईं और अब उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है।’ पार्वती ने कहा, 'अब हम क्या करें?’ शिव के पास दो विकल्प थे। एक, जो भी उनके सामने है, उसे जलाकर भस्म कर दें और दूसरा, वे वहां से चले जाएं और कोई और रास्ता ढूंढ लें। उन्होंने कहा, 'चलो, कहीं और चलते हैं क्योंकि यह तो तुम्हारा प्यारा बच्चा है इसलिए मैं इसे छू भी नहीं सकता। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। चलो, कहीं और चलते हैं।’ इस घटना के बाद, जब शिव और पार्वती को अपना घर छोड़ना पड़ा, तो वे केदारखंड (केदारनाथ) की ओर चले गए। यही कारण है कि: * बद्रीनाथ को 'विष्णु धाम' माना जाता है। * केदारनाथ को 'शिव धाम' माना जाता है। * माना जाता है कि बद्रीनाथ की यात्रा तब तक अधूरी है जब तक श्रद्धालु केदारनाथ के दर्शन न कर ले, क्योंकि शिव ने विष्णु के लिए उस स्थान का त्याग किया था। आध्यात्मिक संदेश यह कहानी हमें सिखाती है कि संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। यहाँ तक कि देवताओं को भी अपनी प्रिय वस्तुओं का त्याग करना पड़ता है। शिव का वहां से चले जाना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी अनासक्ति और प्रेम को दर्शाता है।
sn vyas
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5 months ago
#🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल 🔱बद्रीनाथ धाम की दिव्य उत्पत्ति: नारायण की लीला और महादेव का महात्याग 🔱 📕यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि'हर'(शिव) और 'हरि' (विष्णु) के बीच के अद्भुत संबंधों की है। यह वह गाथा है जहाँ एक देवता ने स्थान पाने के लिए बाल-लीला रची, तो दूसरे ने स्थान देने के लिए सर्वस्व त्याग दिया।📕 🚩1. देवर्षि नारद का व्यंग्य और नारायण का संकल्प🚩 🛐कथा का आरंभ वैकुण्ठ लोक से होता है। एक बार देवर्षि नारद, अपनी वीणा बजाते हुए श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे। नारायण शेषशय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी ने प्रणाम किया, किन्तु उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। उन्होंने कहा, "नारायण! नारायण! प्रभु, आप त्रिलोक के पालनहार हैं, संतों को तप और त्याग का उपदेश देते हैं। किन्तु स्वयं? स्वयं आप यहाँ क्षीरसागर में सुख-सुविधाओं के बीच, लक्ष्मी जी की सेवा का आनंद ले रहे हैं। पृथ्वी का सामान्य मनुष्य आपको देखकर विलासिता तो सीख सकता है, पर तपस्या की प्रेरणा कैसे ले?" नारद जी का यह व्यंग्य तीखा था, परंतु सत्य के निकट था। भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ गए कि नारद उन्हें एक नई लीला का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब एकांत में कठोर तप करेंगे और जगत के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे।🛐 🚩2. हिमालय की खोज और शिव का सुंदर धाम🚩 🧘तपस्या के लिए स्थान खोजने भगवान विष्णु हिमालय की ओर निकले। अलकनंदा नदी के तट पर, नर और नारायण पर्वतों के बीच उन्हें एक अत्यंत रमणीय, शांत और दिव्य स्थान दिखाई दिया। वहां का वातावरण इतना पवित्र था कि मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाए। किन्तु एक समस्या थी। वह स्थान रिक्त नहीं था। वहां एक सुंदर कुटिया थी, जिसके द्वार पर त्रिशूल गड़ा था। यह स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का प्रिय निवास स्थान था। विष्णु जी धर्मसंकट में पड़ गए। शिव जी को वहां से हटाना न तो उचित था और न ही संभव। यदि वे सीधे मांगते, तो शिव मना नहीं करते, लेकिन विष्णु जी इसे 'लीला' के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे।🧘 🚩3. नारायण बने रोता हुआ बालक🚩 🤹भगवान विष्णु ने तत्काल एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। एक ऐसा बालक जिसकी आभा सूर्य के समान थी, पर जो भूख और प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से रो रहा था। वे उसी कुटिया के द्वार पर लेट गए और क्रंदन करने लगे। संयोगवश, शिव और पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। तभी माता पार्वती के कानों में एक नन्हे बालक के रोने की आवाज पड़ी। "स्वामी! सुनिए, इस निर्जन वन में किसी नवजात शिशु के रोने की ध्वनि आ रही है," पार्वती जी व्याकुल हो उठीं। त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! उधर मत जाओ। वह कोई साधारण बालक नहीं है। यह सब माया है। उसे वहीं रहने दो।" परंतु जगत जननी माँ पार्वती का हृदय तो ममता से भरा था। उन्होंने शिव की चेतावनी अनसुनी कर दी और बोलीं, "नाथ! आप कितने कठोर हैं? एक नन्हा सा जीव द्वार पर रो रहा है और आप उसे छोड़ने को कह रहे हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकती।" पार्वती जी दौड़ी-दौड़ी गईं और उस सुंदर बालक को गोद में उठा लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक (विष्णु जी) चुप हो गया और मंद-मंद मुस्कुराने लगा। पार्वती जी उस पर मोहित हो गईं।🤹 🚩4. चतुराई: द्वार बंद और गृह-प्रवेश🚩 🤱पार्वती जी ने बालक को कुटिया के भीतर सुलाया और उसे दुलारने लगीं। कुछ समय पश्चात, उन्होंने शिवजी से कहा, "स्वामी, हम स्नान के लिए तप्तकुंड (गर्म पानी का झरना) चलते हैं, तब तक बालक सो रहा है।" शिवजी ने एक बार फिर समझाया, "देवी, विचार कर लो। हम बाहर जा रहे हैं, कहीं लौटने पर यह हमारा घर ही न रहे?" पार्वती जी ने इसे मजाक समझा। दोनों स्नान के लिए चले गए। इधर, जैसे ही शिव-पार्वती आँखों से ओझल हुए, बाल रूपी विष्णु ने उठकर कुटिया का मुख्य द्वार भीतर से बंद कर लिया। जब शिव और पार्वती स्नान करके लौटे, तो देखा द्वार बंद है। पार्वती जी ने पुकारा, दरवाजा खटखटाया, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। पार्वती जी घबरा गईं, "अरे! बालक ने द्वार बंद कर लिया है, अब हम भीतर कैसे जाएंगे?"🤱 🚩5. महादेव का महात्याग🚩 🕉️शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। उन्होंने कहा, "उमा! मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था। वह बालक कोई और नहीं, स्वयं नारायण हैं। उन्हें यह स्थान भा गया है और वे अब यहाँ तपस्या करना चाहते हैं।" पार्वती जी अवाक रह गईं। उन्होंने पूछा, "तो अब हम क्या करेंगे? क्या हम बलपूर्वक भीतर जाएं?" तब महादेव ने जो कहा, वह उनके 'भोलेनाथ' होने का प्रमाण है। उन्होंने कहा, "नहीं प्रिये! यदि मेरे आराध्य ने छल से ही सही, मेरा स्थान माँगा है, तो मैं उन्हें यह दे देता हूँ। अब यह स्थान 'बद्रीनाथ' कहलाएगा। हम यहाँ से चलते हैं।" पार्वती जी ने पूछा, "किन्तु हम रहेंगे कहाँ?" शिवजी ने केदारखंड की ओर संकेत करते हुए कहा, "हम उस ऊँचे और दुर्गम शिखर पर अपना वास बनाएंगे, जहाँ एकांत और भी गहरा है।"और इस प्रकार, भगवान शिव ने अपना बसा-बसाया घर, अपनी प्रिय कुटिया विष्णु जी के लिए छोड़ दी और स्वयं केदारनाथ चले गए।🕉️ 🌺 कथा का आध्यात्मिक सार 🌺 📕यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं—📕 🚩* विष्णु का मार्ग (लीला): जहाँ लक्ष्य प्राप्ति के लिए युक्ति और चतुराई का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उद्देश्य लोक- कल्याण होता है। 🚩* शिव का मार्ग (त्याग): जहाँ अपनी प्रिय वस्तु भी यदि कोई मांग ले, तो बिना द्वेष के उसे सौंप दिया जाता है। इसीलिए आज भी मान्यता है कि बद्रीनाथ (विष्णु धाम) की यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाती, जब तक भक्त केदारनाथ (शिव धाम) के दर्शन न कर ले। क्योंकि जहाँ नारायण का निवास है, वह भूमि महादेव के त्याग की नींव पर ही टिकी है।🚩 🙏।। जय बद्रीविशाल ।।🙏 🙏।। जय बाबा केदार ।।🙏
sn vyas
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6 months ago
#🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल 🏔️ बद्रीनाथ धाम की दिव्य उत्पत्ति: नारायण की लीला और महादेव का महात्याग 🔱 यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि 'हर' (शिव) और 'हरि' (विष्णु) के बीच के अद्भुत संबंधों की है। यह वह गाथा है जहाँ एक देवता ने स्थान पाने के लिए बाल-लीला रची, तो दूसरे ने स्थान देने के लिए सर्वस्व त्याग दिया। 1. देवर्षि नारद का व्यंग्य और नारायण का संकल्प कथा का आरंभ वैकुण्ठ लोक से होता है। एक बार देवर्षि नारद, अपनी वीणा बजाते हुए श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे। नारायण शेषशय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी ने प्रणाम किया, किन्तु उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। उन्होंने कहा, "नारायण! नारायण! प्रभु, आप त्रिलोक के पालनहार हैं, संतों को तप और त्याग का उपदेश देते हैं। किन्तु स्वयं? स्वयं आप यहाँ क्षीरसागर में सुख-सुविधाओं के बीच, लक्ष्मी जी की सेवा का आनंद ले रहे हैं। पृथ्वी का सामान्य मनुष्य आपको देखकर विलासिता तो सीख सकता है, पर तपस्या की प्रेरणा कैसे ले?" नारद जी का यह व्यंग्य तीखा था, परंतु सत्य के निकट था। भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ गए कि नारद उन्हें एक नई लीला का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब एकांत में कठोर तप करेंगे और जगत के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे। 2. हिमालय की खोज और शिव का सुंदर धाम तपस्या के लिए स्थान खोजने भगवान विष्णु हिमालय की ओर निकले। अलकनंदा नदी के तट पर, नर और नारायण पर्वतों के बीच उन्हें एक अत्यंत रमणीय, शांत और दिव्य स्थान दिखाई दिया। वहां का वातावरण इतना पवित्र था कि मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाए। किन्तु एक समस्या थी। वह स्थान रिक्त नहीं था। वहां एक सुंदर कुटिया थी, जिसके द्वार पर त्रिशूल गड़ा था। यह स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का प्रिय निवास स्थान था। विष्णु जी धर्मसंकट में पड़ गए। शिव जी को वहां से हटाना न तो उचित था और न ही संभव। यदि वे सीधे मांगते, तो शिव मना नहीं करते, लेकिन विष्णु जी इसे 'लीला' के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे। 3. नारायण बने रोता हुआ बालक भगवान विष्णु ने तत्काल एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। एक ऐसा बालक जिसकी आभा सूर्य के समान थी, पर जो भूख और प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से रो रहा था। वे उसी कुटिया के द्वार पर लेट गए और क्रंदन करने लगे। संयोगवश, शिव और पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। तभी माता पार्वती के कानों में एक नन्हे बालक के रोने की आवाज पड़ी। "स्वामी! सुनिए, इस निर्जन वन में किसी नवजात शिशु के रोने की ध्वनि आ रही है," पार्वती जी व्याकुल हो उठीं। त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! उधर मत जाओ। वह कोई साधारण बालक नहीं है। यह सब माया है। उसे वहीं रहने दो।" परंतु जगत जननी माँ पार्वती का हृदय तो ममता से भरा था। उन्होंने शिव की चेतावनी अनसुनी कर दी और बोलीं, "नाथ! आप कितने कठोर हैं? एक नन्हा सा जीव द्वार पर रो रहा है और आप उसे छोड़ने को कह रहे हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकती।" पार्वती जी दौड़ी-दौड़ी गईं और उस सुंदर बालक को गोद में उठा लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक (विष्णु जी) चुप हो गया और मंद-मंद मुस्कुराने लगा। पार्वती जी उस पर मोहित हो गईं। 4. चतुराई: द्वार बंद और गृह-प्रवेश पार्वती जी ने बालक को कुटिया के भीतर सुलाया और उसे दुलारने लगीं। कुछ समय पश्चात, उन्होंने शिवजी से कहा, "स्वामी, हम स्नान के लिए तप्तकुंड (गर्म पानी का झरना) चलते हैं, तब तक बालक सो रहा है।" शिवजी ने एक बार फिर समझाया, "देवी, विचार कर लो। हम बाहर जा रहे हैं, कहीं लौटने पर यह हमारा घर ही न रहे?" पार्वती जी ने इसे मजाक समझा। दोनों स्नान के लिए चले गए। इधर, जैसे ही शिव-पार्वती आँखों से ओझल हुए, बाल रूपी विष्णु ने उठकर कुटिया का मुख्य द्वार भीतर से बंद कर लिया। जब शिव और पार्वती स्नान करके लौटे, तो देखा द्वार बंद है। पार्वती जी ने पुकारा, दरवाजा खटखटाया, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। पार्वती जी घबरा गईं, "अरे! बालक ने द्वार बंद कर लिया है, अब हम भीतर कैसे जाएंगे?" 5. महादेव का महात्याग शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। उन्होंने कहा, "उमा! मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था। वह बालक कोई और नहीं, स्वयं नारायण हैं। उन्हें यह स्थान भा गया है और वे अब यहाँ तपस्या करना चाहते हैं।" पार्वती जी अवाक रह गईं। उन्होंने पूछा, "तो अब हम क्या करेंगे? क्या हम बलपूर्वक भीतर जाएं?" तब महादेव ने जो कहा, वह उनके 'भोलेनाथ' होने का प्रमाण है। उन्होंने कहा, "नहीं प्रिये! यदि मेरे आराध्य ने छल से ही सही, मेरा स्थान माँगा है, तो मैं उन्हें यह दे देता हूँ। अब यह स्थान 'बद्रीनाथ' कहलाएगा। हम यहाँ से चलते हैं।" पार्वती जी ने पूछा, "किन्तु हम रहेंगे कहाँ?" शिवजी ने केदारखंड की ओर संकेत करते हुए कहा, "हम उस ऊँचे और दुर्गम शिखर पर अपना वास बनाएंगे, जहाँ एकांत और भी गहरा है।" और इस प्रकार, भगवान शिव ने अपना बसा-बसाया घर, अपनी प्रिय कुटिया विष्णु जी के लिए छोड़ दी और स्वयं केदारनाथ चले गए। 🌺 कथा का आध्यात्मिक सार 🌺 यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं— * विष्णु का मार्ग (लीला): जहाँ लक्ष्य प्राप्ति के लिए युक्ति और चतुराई का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उद्देश्य लोक-कल्याण होता है। * शिव का मार्ग (त्याग): जहाँ अपनी प्रिय वस्तु भी यदि कोई मांग ले, तो बिना द्वेष के उसे सौंप दिया जाता है। इसीलिए आज भी मान्यता है कि बद्रीनाथ (विष्णु धाम) की यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाती, जब तक भक्त केदारनाथ (शिव धाम) के दर्शन न कर ले। क्योंकि जहाँ नारायण का निवास है, वह भूमि महादेव के त्याग की नींव पर ही टिकी है। ।। जय बद्रीविशाल ।। ।। जय बाबा केदार ।।