जागरूकता दिवस

सुशील मेहता
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1 days ago
विश्व अंगदान दिवस लोगों को अपने बहुमूल्य अंग दान करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 13 अगस्त को विश्व अंग दान दिवस (WODD) मनाया जाता है। हर साल, अंगों की अनुपलब्धता के कारण लगभग 5 लाख लोग अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रत्यारोपण की संख्या और अंग उपलब्ध होने की संख्या के बीच एक व्यापक अंतर है। अंग दान एक ऐसी प्रक्रिया है। अंग दाता अंग ग्राही को अंग दान करता है। दाता जीवित या मृत हो सकता है। दान किए जा सकने वाले अंग गुर्दे, फेफड़े, दिल, आंख, यकृत, पैनक्रिया, कॉर्निया, छोटी आंत, त्वचा के ऊतक, हड्डी के ऊतक, हृदय वाल्व और नस हैं।अंगदान की पहली शर्त है व्यक्ति का स्वस्थ होना। जैसे ब्रेन डेड व्यक्ति, एचआईवी, डायबिटीज, कैंसर, गंभीर संक्रमण, किडनी और हृदय रोगों से पीडि़त न हो। अंगदान दो तरह से किए जा सकते हैं8। 1. लिविंग डोनर: जीवित रहते हुए कोई भी व्यक्ति शरीर के कुछ अंग जैसे किडनी, बोन मैरो (अस्थि मज्जा), लिवर और फेफड़े का कुछ हिस्सा परिजनों को डोनेट कर सकता है। 2. ब्रेन डेड: इसे केडेवर डोनर भी कहते हैं। 18 साल से कम उम्र के युवा पैरेंट्स की अनुमति और इससे अधिक उम्र होने पर अंगदान के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। ब्रेन डेड घोषित होने पर किडनी, लीवर, फेफड़े, पैन्क्रियाज, ओवरी, गर्भाशय, आंखें, हड्डियां और त्वचा का दूसरे शरीर में ट्रांसप्लांट करते हैं।पहला सफल अंग प्रत्यारोपण 1954 में संयुक्त राज्य अमेरिका में किया गया था। डॉक्टर जोसेफ मरे ने 1990 में जुड़वां भाइयों रोनाल्ड और रिचर्ड हेरिक के बीच किडनी प्रत्यारोपण को सफलतापूर्वक करने के लिए फिजियोलॉजी और मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार जीता। अब देश और दुनिया में अंग प्रत्यारोपण बढ़ गए हैं। लोग अंग डोनेट भी कर रहे हैं। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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2 days ago
विश्व हाथी दिवस 'वर्ल्ड एलिफेंट डे' यानी विश्व हाथी दिवस हर साल 12 अगस्त को मनाया जाता है। एलिफेंट रिइंट्रोडक्शन फाउंडेशन और फिल्म निर्माताओं पेट्रीसिया सिम्स और माइकल क्लार्क द्वारा साल 2011 में इस दिवस को मनाने का फैसला किया गया और पहली बार अंतरराष्ट्रीय हाथी दिवस 12 अगस्त 2012 को मनाया गया। दरअसल, एशियाई और अफ्रीकी हाथियों की दुर्दशा के बारे में जागरूकता फैलाने और उनकी तरफ ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से इस दिवस को मनाने की शुरुआत की गई थी। दरअसल, आए दिन हो रही हाथियों की मौत चिंता का विषय बन गई है। कहीं हाथियों को जानबूझ कर मारा जाता है, तो कहीं वे दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। हाथियों की मौत के मामले में केरल को सबसे बदनाम राज्य माना जाता है। अभी पिछले साल की ही घटना है कि केरल में पल्लकड़ जिले के मन्नारकड़ में विस्फोटक से भरा अनानास खाने की वजह से एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई थी, जिससे पूरा देश गुस्से में आ गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाथी को राष्ट्रीय धरोहर के पशु का दर्जा हासिल है। भारत में हर पांच साल में हाथियों की गिनती की जाती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक, साल 2017 में देश में लगभग 23 राज्यों से लिए गए आंकड़ों के अनुसार लगभग 27,312 हाथी थे, जबकि 2012 में इनकी संख्या 29,576 के आसपास थी। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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4 days ago
राष्ट्रीय डिवार्मीग दिवस आज नेशनल डीवार्मिंग डे है, यानी कृमि मुक्ति दिवस। यहा उस कृमि या परजीवी की बात हम कर रहे हैं, जो बच्चों के पेट में रहता है और उनके पोषण के संतुलन को बिगाड़ देता है। इस कारण कई तरह की बीमारियां बच्चों में होती है। एनीमिया इनमें सबसे आम बीमारी हो चुकी है। एक सर्वे के मुताबिक देश के हर 10 में से छह बच्चे इसी बीमारी से ग्रस्त हैं और इसका कारण पेट में मौजूद यह कृमि ही है। इसीलिए हर साल 10 फरवरी और 10 अगस्त को कृमि मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है। आपको बता दें कि इस कृमि को सॉइल ट्रांसमिटेड हेल्मिन्थ्स (Soil Transmitted Helminths) कहा जाता है। यानी एसटीएच, जो पेट के इस संक्रमण के लिए जिम्मेदार होता है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) आंकड़े जारी कर कह चुका है कि विश्व में सबसे ज्यादा एसटीएच भारत में हैं जिसकेकारण 1 से 14 वर्ष के 220 मिलियन बच्चों के स्वास्थ्य को खतरा है। इतने बच्चे इस कृमि या परजीवी से पेट का संक्रमण झेल रहे हैं। इस संक्रमण को खत्म करने के उद्देश्य से हर साल इस दिन स्कूलों और आंगनबाड़ियों में बच्चों को एलबेंडाजोल नामक दवाई दी जाती है, जो इस परजीवी को पेट से बाहर निकालने का काम करती है। यह परजीवी पेट तक पहुंचने वाले हर पोषण को खा जाता है और उस पोषण का लाभ संक्रमित बच्चे को नहीं मिल पाता। देश में बच्चों का बड़ा तबका कुपोषण का शिकार है तो एनीमिया के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। ऐसे बच्चों को कृमि मुक्त बनाने के लिए ही राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस की शुरुआत वर्ष 2015 में केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry Of Health And Family Welfare) की ओर से की गई थी, इसके तहत देशभर के 1 से 19 वर्ष आयु के बच्चों को कवर किया जाता है। इस एक दिवसीय कार्यक्रम में पोषण संबंधी स्थिति जानने के साथ बच्चों के समग्र स्वास्थ्य में सुधार के लिए बच्चों को परजीवी आंत्र कृमि संक्रमण से मुक्त करने के लिये दवा उपलब्ध कराई जाती है।नवजात शिशुओं और स्कूली बच्चों को परजीवी कृमि संक्रमण से संरक्षित करने के लिए और इसके प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रत्येक वर्ष 10 फरवरी को नेशनल डीवॉर्मिंग डे के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस का आयोजन संयुक्त रूप से मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Ministry Of Women And Child Development) की ओर से भी सहयोग किया जाता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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4 days ago
डेंगू निरोधक दिवस बारिश का मौसम ही बीमारियों का मौसम होता है. इसी मौसम में सबसे ज्यादा मच्छर और कीड़े पनपते हैं. परिणाम यह होता है कि लोगों को डेंगू जैसी खतरनाक बीमारी हो जाती है. यही कारण है कि प्रतिवर्ष '10 अगस्त' को 'डेंगू निरोधक दिवस' मनाया जाता है। डेंगू वायरस द्वारा होता है, इसे "डेन वायरस" भी कहते हैं. इस रोग का वाहक एडीज मच्छर की दो प्रजातियां हैं- एडीज एजिपटाई (Aedes aegypti) और एडीज एल्बोपेक्टस।डेंगू बुख़ार उस मच्छर के काटने से होता है जिसने पहले से ही किसी डेंगू के मरीज़ को काटा है. यह मच्छर बरसात के मौसम में ज़्यादा फैलते हैं और यह उन जगहों पर तेज़ी से फैलते हैं जहाँ पानी जमा हो। - तेज बुखार के साथ नाक बहना, खांसी, आखों के पीछे दर्द, जोड़ों के दर्द और त्वचा पर हल्के रैश होते हैं। पेट खराब हो सकता है। जी मितला सकता है. उल्टी भी आ सकती है। डेंगू बुख़ार को "हड्डीतोड़ बुख़ार" के नाम से भी जाना जाता है, पीड़ित लोगों को इतना अधिक दर्द हो सकता है। प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है। दूसरा डेंगू शॉक सिंड्रोम है। ब्लड प्रेसर कम हो सकता है। ये इसके मुख्य लक्षण हैं। डेंगू बुखार दिन में काटने वाले दो प्रकार के मच्छरों से फैलता है। ये मच्छर एडिज इजिप्टी तथा एडिज एल्बोपेक्टस के नाम से जाने जाते हैं। Dengue Fever “डेंगू” वायरस के संक्रमण द्वारा होता है इसे “डेन वायरस” भी कहते हैं। डेंगू वायरस चार प्रकार के होते हैं, जिसे डेन-1, डेन-2, डेन-3 और डेन-4 (DEN-1, DEN-2, DEN-3, DEN-4) के नाम से जानते है। DEN 1 और DEN 3 के मुकाबले DEN 2 और DEN 4 कम खतरनाक होते है । डेंगू सभी मच्छर से नहीं फैलता। यह केवल कुछ जाति के मच्छर से ही फैलता है जो की मुख्यतः “फ्लाविविरिडे” परिवार तथा “फ्लाविविरस” जीन का हिस्सा होते है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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4 days ago
वर्ल्ड बायोफ्यूल डे प्रत्येक वर्ष 10 अगस्त को मनाया जाता है ताकि परंपरागत फॉसिल ईंधनों के विकल्प के रूप में गैर-फॉसिल ईंधनों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके, और बायोफ्यूल क्षेत्र में सरकार द्वारा की जाने वाली विभिन्न प्रयासों को हाइलाइट किया जा सके। इस दिन सर रूडोल्फ डीजल द्वारा किए गए अनुसंधान प्रयोगों को भी सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने 1893 में मूँगफली के तेल से एक इंजन को चलाया था। उनके रिसर्च बायोफ्यूल्स के लाभ हैं कि वे कच्चे तेल पर आपूर्ति निर्भरता को कम करते हैं, पर्यावरण को साफ बनाने में मदद करते हैं, किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न करते हैं। जैव ईंधन पर्यावरण के अनुकूल ईंधन हैं और उनके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन की रोकथाम के बारे में वैश्विक चिंताओं का समाधान होगा। जैव ईंधन नवीकरणीय जैव-जन संसाधनों से प्राप्त होते हैं और इसलिए, सतत विकास को बढ़ावा देने और उच्च आर्थिक विकास से जुड़े परिवहन ईंधन के लिए तेजी से बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ भारत की विशाल ग्रामीण आबादी की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को पूरक करने के लिए एक रणनीतिक लाभ प्रदान करते हैं।विश्व जैव ईंधन दिवस गैर-जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता को उजागर करने का एक मंच है। जलवायु परिवर्तन के साथ, वैश्विक ऊर्जा खपत पैटर्न में बदलाव समय की मांग है। इस संबंध में, जैव ईंधन न केवल स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करने में मदद करता है बल्कि अधिक टिकाऊ प्रौद्योगिकियों को अपनाने को भी प्रोत्साहित करता है। जैव ईंधन समाज के एक बड़े वर्ग के लिए आय और रोजगार उत्पन्न करने में भी मदद कर सकता है। ईंधन स्रोतों में कम कार्बन फुटप्रिंट होता है और यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन के लिए प्रभावी प्रतिस्थापन हो सकता है।विश्व जैव ईंधन दिवस का फोकस गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के बढ़ते उपयोग और विकास का आह्वान करना है। इस दिन का उद्देश्य ऐसी प्रौद्योगिकियों के निर्माण पर ध्यान आकर्षित करना भी है जो पर्यावरण पर जैव ईंधन के किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को कम कर सकें।2015 से, भारत में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय विश्व जैव ईंधन दिवस मना रहा है। भारत में बायोएथेनॉल, बायोडीजल और बायो-सीएनजी जैसे जैव ईंधन का उपयोग तेजी से किया जा रहा है। चूंकि ऊर्जा स्रोत टिकाऊ और बायोडिग्रेडेबल है, इसलिए केंद्र सरकार देश में इसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई पहल कर रही है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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4 days ago
इस राजसी और साहसी जानवर के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उनकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने के लिए हर साल 10 अगस्त को विश्व शेर दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिछले सौ वर्षों में, दुनिया भर में शेरों की संख्या में लगभग 80% की गिरावट देखी गई है। बड़ी बिल्लियों की इस प्रजाति के संरक्षण और उनके संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाने के कारण कुछ साल पहले इस दिन की शुरुआत हुई। राजसी शेर के संरक्षण और सुरक्षा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए 2013 से विश्व शेर दिवस मनाया जा रहा है।वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के अनुसार , शेर एक समय पूरे अफ्रीका, एशिया और यूरोप में पाए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन महाद्वीपों में उनकी संख्या में काफी गिरावट आई है। साहस, क्रूरता और शक्ति का प्रतीक ये राजसी बिल्लियाँ व्यापक निवास स्थान के नुकसान से खतरे में हैं इस प्रकार, उनकी और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए संबंधित समुदायों और अन्य संगठनों द्वारा उपाय किए जा रहे हैं जहां तक ​​भारत का सवाल है, यह राजसी एशियाई शेर का घर है , जो सासन-गिर राष्ट्रीय उद्यान के संरक्षित क्षेत्र में रहता है। भारत राजसी एशियाई शेरों का घर है, और उनका संरक्षित निवास स्थान गुजरात में गिर राष्ट्रीय उद्यान है एशियाई शेर पुनरुत्पादन परियोजना भारत सरकार द्वारा एशियाई शेर की शेष आबादी को पुनरुत्पादन के माध्यम से देश के अन्य हिस्सों में स्थानांतरित करके संरक्षित करने के लिए शुरू की गई थी।शेर मांसाहारी होते हैं और मनुष्य के अलावा उनका कोई प्राकृतिक शिकारी नहीं होता, जो उन्हें शीर्ष शिकारी या प्रमुख प्रजाति बनाता है। इस प्रकार, यह पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शेरों के विलुप्त होने से संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और विभिन्न अन्य प्रजातियों के अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार, शेरों के लिए एक विशेष दिन चिह्नित करके, अधिकारी स्वस्थ पर्यावरण और जीवन चक्र के लिए दुनिया भर में उनके अस्तित्व और संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाने का इरादा रखते हैं #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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5 days ago
अगस्त क्रांति भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए तमाम छोटे-बड़े आंदोलन किए गए। अंग्रेजी सत्ता को भारत की जमीन से उखाड़ फेंकने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई थी उसे 'अगस्त क्रांति' के नाम से जाना गया है। इस लड़ाई में गांधी जी ने 'करो या मरो' का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। यही वजह है कि इसे 'भारत छोड़ो आंदोलन' या क्विट इंडिया मूवमेंट भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को हुई थी, इसलिए इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई थी जिसे अगस्त क्रांति मैदान नाम दिया गया। आजादी के इस आखिरी आंदोलन को छेड़ने की भी खास वजह थी। दरअसल जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत से उसका समर्थन मांगा था, जिसके बदले में भारत की आजादी का वादा भी किया था। 9 अगस्त 1942 को इस क्रांति का एलान किया गया जिसके कारण 9 अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे का इतिहास है कि 4 जुलाई 1942 के दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई अधिवेशन में 'भारत छोड़ो आंदोलन' यानी 'अगस्त क्रांति' का प्रस्ताव पारित किया गया। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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8 days ago
हिरोशिमा दिवस: 6 अगस्त, 1945 को, अमेरिका ने सुबह लगभग 8:15 बजे जापानी शहर हिरोशिमा पर परमाणु हथियार, 'लिटिल बॉय' गिराया, तब से, इस दिन को हजारों मौतों पर शोक मनाने और श्रद्धांजलि देने के अवसर के रूप में मनाया जाता है।6 अग॰ 2023) '6 अगस्त' को कहा जाता है। अमेरिका ने 6 अगस्त, 1945 के दिन जापान के हिरोशिमा नगर पर ‘लिटिल बॉय’ नामक यूरेनियम बम गिराया था। इस बम के प्रभाव से 13 वर्ग कि.मी. में तबाही मच गयी थी। हिरोशिमा की 3.5 लाख की आबादी में से एक लाख चालीस हज़ार लोग एक झटके में ही मारे गए। ये सब सैनिक नहीं थे। इनमें से अधिकांश साधारण नागरिक, बच्चे, बूढ़े तथा स्त्रियाँ थीं। इसके बाद भी अनेक वर्षों तक अनगिनत लोग विकिरण के प्रभाव से मरते रहे। अमरीका इतने पर ही नहीं रुका। उसे एक अन्य प्रकार के बम के प्रभावों को अभी और आज़माना था। इसलिए इस अमानवीय विनाश के तीन दिन बाद ही 9 अगस्त को ‘फ़ैट मैन’ नामक प्लूटोनियम बम नागासाकी पर गिराया गया, जिसमें अनुमानित 74 हज़ार लोग विस्फोट व गर्मी के कारण मारे गए। इनमें भी अधिकांश निरीह नागरिक थे।हिरोशिमा को 6 अगस्त, 1945 तक जापान के एक औद्योगिक नगर के रूप में जाना जाता था। दूसरे विश्वयुद्ध के समय जापानी सेना की 5वीं डिविजन का यहाँ मुख्यालय था। यहाँ सैनिक छावनी भी थी और यह सैनिक आपूर्ति मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त से पूर्व इस नगर पर अमरीका ने बमबारी नहीं की थी, ताकि अणुबम से होने वाले नुकसान का सटीक आकलन किया जा सके। विश्व में पहली बार 6 अगस्त, 1945 को जब इस शहर पर 'लिटिल बॉय' नाम का अणुबम गिराया गया, तब जापान सरकार के राशन आपूर्ति के आँकड़ों के अनुसार शहर में कुलआबादी 2,55,000 थी। लेकिन इस शहर में लगातार सैनिक और सहायक मजदूर आ-जा रहे थे। गैर आधिकारिक आंकडों के अनुसार नगर की तत्कालीन आबादी 3,81,000 के आस-पास थी। कमाण्डर कर्नल पॉल टिबेट्स की कमान में 6 अगस्त को अमरीकी सेना के विमान एनोला गे (बी-29) ने दक्षिण प्रशान्त के वायु सैनिक अड्डे 'टिनियन' से दो अन्य बी-29 विमानों के साथ उड़ान भरी। विमान का नाम 'एनोला गे' उसके पायलट पॉल टिबेट्स की माँ के नाम पर रखा गया था। साथ उड़ान भरने वाले विमानों में एक का नाम था- 'ग्रेट आर्टिस्ट'। अणुबम का प्रभाव नापने वाले यंत्रों-उपकरणों से सज्जित इस विमान को मेजर चार्ल्स स्वीनी उड़ा रहे थे। दूसरे अनाम विमान, बाद में जिसका नाम 'नेसेसरी इविल' रखा गया, में दुनिया को अणुबम की संहारक क्षमता और अमरीकी शक्ति के प्रमाण जुटाने के लिये उच्च क्षमता के कैमरे लगेहुए थे, इसके पायलट थे कैप्टन जॉर्ज मैक्वार्ड। टिनियन से उड़ान भरने के बाद तीनों विमानों ने इवोजिमा होते हुए जापान की वायुसीमा में प्रवेश किया। उस वक्त विमान 8,000 फीट की ऊँचाई पर उड़ रहे थे। हिरोशिमा के पास पहुँच कर विमान की ऊँचाई 32,300 फीट हो गयी। उड़ान के दौरान जलसेना के कैप्टन विलियम पार्सन्स ने विमान में 'लिटिल बॉय' को फिट किया और लक्ष्य पर पहुँचने के 30 मिनिट पूर्व उनके सहायक सेकेण्ड लेफ्टिनेंट टेनेण्ट मॉरिस जैप्सन ने उस अणुबम पर लगे सुरक्षा उपकरणों को हटाकर उसे सक्रिय किया।जापान के चेतावनी राडार ने हमले के लगभग एक घण्टे पूर्व दक्षिण जापान की ओर बढ़ रहे इन अमरीकी विमानों को चिह्नित करके सम्भावित हवाई हमले की रेडियो से चेतावनी दे दी थी। सुबह लगभग 8 बजे हिरोशिमा के राडार चालक ने देखा कि विमानों की संख्या केवल तीन ही है, इसलिये उसने माना कि यह टोही विमान हैं और कोई हमला नहीं होने जा रहा। अपने ईंधन और हवाई जहाजों को बचाने की दृष्टि से जापानी वायुसेना ने अमरीकी जहाजों पर प्रतिरोधी हवाई आक्रमण नहीं किया। अगर जापान के राडार पहचान लेते कि ये बमवर्षक विमान हैं तो शायद अधिक गम्भीर प्रयास किये जाते। लक्ष्य पर स्थानीय समय के अनुसार सुबह 8:15 पर बम फैंका गया।17 अगस्त या 18 अगस्त को जापान पर तीसरा अणु हमला होना था। इसी क्रम से सितम्बर में तीन और अक्टूबर में 3 हमले करने की भी योजना थी। उधर जापान के सम्राट स्थिति को तुरन्त काबू में करना चाहते थे, जबकि सोवियत संघ ने भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अन्तत: जापान ने 14 अगस्त को समर्पण कर दिया। इस प्रकार जापान के समर्पण के साथ ही विश्व इतिहास के सर्वाधिक निर्मम आक्रमण और सर्वाधिक संहारक अस्त्र के परीक्षण का पटाक्षेप हुआ। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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11 days ago
मृत दाताओं और उनके परिवारों द्वारा समाज में किए गए योगदान को याद करने के लिए हर साल 27 नवंबर को भारतीय अंग दान दिवस मनाया जाता है। 2023 से, 3 अगस्त 1994 को भारत में पहले सफल मृत हृदय प्रत्यारोपण की स्मृति में 3 अगस्त को यह दिन मनाया जा रहा है। इस दिन का उद्देश्य लोगों के बीच जागरूकता फैलाना और मानव जाति के प्रति किए गए निस्वार्थ प्रयासों को पहचानना और मानवता में विश्वास को फिर से स्थापित करना है। भारत में अंगदान माह राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) ने 8 जुलाई 1994 की स्मृति में जुलाई को अंग दान के महीने के रूप में घोषित किया है, जब मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (टीएचओए), मानव अंगों को हटाने, भंडारण और प्रत्यारोपण का विनियमन प्रदान करने के लिए एक अधिनियम था। चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए और मानव अंगों और ऊतकों में वाणिज्यिक लेनदेन की रोकथाम के लिए भारत में अधिनियमित किया गया था। वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है । देश में प्रति वर्ष किए जाने वाले अंग प्रत्यारोपण की कुल संख्या वर्ष 2013 में 4990 से बढ़कर वर्ष 2022 में 15,561 हो गई है। इसी तरह, अंग दान दर भी 2012-13 की तुलना में लगभग चार गुना बढ़ गई है। अनुमान के मुताबिक, देश में प्रति दस लाख आबादी पर केवल 0.65 अंगदान होते हैं। ऑल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक, सालाना 1.5 से दो लाख लोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। लेकिन करीब 8,000 यानी चार फीसदी लोगों को ही मिल पाता है. इसी तरह, हर साल लगभग 80,000 रोगियों को लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, लेकिन अंततः केवल 1,800 को ही यह मिल पाता है। प्रतिवर्ष लगभग एक लाख रोगियों को कॉर्निया या नेत्र प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, लेकिन आधे से भी कम लोगों को यह मिल पाता है। यहां तक ​​कि हृदय प्रत्यारोपण के लिए जिन 10,000 लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, उनमें से केवल 200 ही दानदाताओं से मेल खाते हैं। भारत में केवल तीन प्रतिशत पंजीकृत अंग दाता हैं। कोविड-19 महामारी के कारण भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में अंग दान में काफी गिरावट आई है। इतने कम अंग दान के पीछे मुख्य कारण अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया के बारे में लोगों में जानकारी की कमी है। गैर सरकारी संगठन और सार्वजनिक संगठन जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य स्तर पर राज्य अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एसओटीटीओ), क्षेत्रीय स्तर पर क्षेत्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (आरओटीटीओ) और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के माध्यम से अंग दान, संग्रह और प्रतिस्थापन का नेटवर्क। .दान और प्रत्यारोपण पर वैश्विक डेटाबेस आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त अंग दान और प्रत्यारोपण में गतिविधियों से संबंधित दुनिया भर के डेटा के साथ-साथ कानूनी और संगठनात्मक पहलुओं पर जानकारी का अब तक का सबसे व्यापक स्रोत दर्शाता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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13 days ago
हर साल 1 अगस्त को मनाया जाता है और यह 2012 से उसी तारीख को मनाया जाता है। यह पहली बार इसलिए मनाया गया था कि इस घातक बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इस पर और अधिक शोध करने के लिए उत्साह पैदा किया जा सके, ताकि इस बीमारी के आसपास की असमर्थता को दूर किया जा सके। विश्व फेफड़ों के कैंसर दिवस 2023 के लिए थीम का  अभी तय नहीं किया गया है। विश्व लंग कैंसर दिवस का अभियान 2012 में शुरू किया गया था, यद्यपि पहले कुछ वर्षों में उसकी मांग बढ़ी थी। इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटिज़ के मंच ने इस अभियान का आयोजन किया था, जो अंतर्राष्ट्रीय फेफड़ों के अध्ययन संघ और अमेरिकी चेस्ट चिकित्सा कॉलेज के साथ सहयोग में हुआ था। तब से फेफड़ों के कैंसर के बारे में जागरूकता में तेजी से वृद्धि हुई है और लोग फेफड़ों के कैंसर के संकेतों और लक्षणों के बारे में अधिक जागरूक हुए हैं। कैंसर की तुलना में अधिक तेजी से फैलता है। यह दिन हमें इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने और जल्द से जल्द पहचान और उपचार की महत्वता को समझाने में मदद करता है। लंग कैंसर को एक अत्यंत घातक कैंसर के रूप में पहचाना जाता है और मेयो क्लिनिक के डॉक्टरों के अनुसार, लंग कैंसर उस समय शुरू होता है जब फेफड़ों में कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, और जिन लोगों की सिगरेट पीने की आदत है, उन्हें लंग कैंसर होने का अधिक खतरा होता है, लेकिन इससे प्रभावित होने का संभावना उन लोगों के लिए भी होती है जिन्होंने कभी भी सिगरेट नहीं पी। लंग कैंसर के होने वाले लोगों में से अधिकतर 80% लोग अक्सर सिगरेट पीते हैं। दूसरे हाथ की धूम्रपान, रेडन, वायु प्रदूषण और परिवार का लंग कैंसर के इतिहास से भी कैंसर के होने के कारण हो सकते हैं और इसमें दिखाई देने वाले लक्षण शामिल हैं: स्थायी खांसी, सांस लेने में परेशानी, खूनी खांसी, सीने में दर्द और थकान। #जागरूकता दिवस