पवित्रा व पुत्रदा एकादशी 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔

sn vyas
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12 घंटे पहले
जय हो.... पवित्रा एकादशी की खुब खुब मंगल बधाई.... #पवित्रा व पुत्रदा एकादशी 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔 #🌷पवित्रा/कामिका एकादशी🙏🕉️ #🌷कामिका/पवित्रा एकादशी🙏 *वर्षोत्सव की भावना* *{ पवित्रोत्सवः }* *"पुष्टिप्रागट्यदिन कैसे मनाए ?* *वर्षोत्सव की भावना* *{ पवित्रोत्सवः }* *या कृता वार्षिकी सेवा सा मूलफलदा मता | प्रत्यहं सूत्ररूपेण सैकीभूतानुभावनात ||१||* जो मैंने एक वर्ष में सेवा की है, वह सेवा मुझे मूल फल (प्रभु प्राप्ति) देने वाली हो, उसी सेवा के प्रतिक रूप (तीनसो साठ) सूत्रों के रूप में एकत्रित कर में सेवा का अनुभावन करता हूँ || *पवित्रं तज्ज्ञापकं हि प्रेषितं हरिणा ततः | अतस् तदारोपणं तु श्रीकृष्णे सन्मतं सदा ||२||* पवित्रा सेवा का ज्ञापक है इसलिए हरी के द्वारा भेजा गया है, अतः पवित्रा के आरोपण से श्री कृष्ण में मेरी सदा सन्मति हो || *तदारोपाद् भक्तिभावा मूले सर्वे समर्पिता: | त्वत्प्रेषितं पवित्रं हि मूलसेवाफलात्मकं ||३||* वह पवित्रा के आरोपण से मूल धर्मी प्रभु में पवित्रा के साथ में समस्त अपने भक्ति भाव समर्पित करता हूँ | आप द्वारा प्रेषित पवित्रा निश्चित ही मूल की सेवा का फल रूप है || *समर्पयामि तत्प्रीतः कृपया अंगीकुरु प्रभो | तत्समर्पणतो भाव-सेवायाः फलरूपता ||४ ||* हे प्रभो प्रीती पूर्वक में पवित्रा समर्पित करता हूँ | आप कृपा कर अंगीकार करे क्योंकि पवित्रा के समर्पण से ही मेरी भाव-सेवा की फल रूपता सिद्ध होगी || *( श्री गोपीनाथ प्रभुचरण कृत वर्षोत्सव की भावना )* श्रीगोपीनाथ प्रभुचरण के अनुसार उक्त पवित्रा का भाव यह है कि यह पवित्रा वैष्णवों द्वारा की गयी वर्षभर की सेवा का प्रतीक है इस लिए यह 360 तारों का होता है. इस पवित्रा के 360 सूत के सूत्र एक वर्ष के अन्तर्गत 360 दिनों के प्रतीक है जो मानसी सेवा जैसे मूल फल को देने वाला है. शास्त्र आज्ञा करते हैं - “न करोति विधानेन पवित्रारोपणं तु यः | तस्य सांवत्सरी पूजा निष्फला मुनि सत्तम |” अर्थात : हे मुनि श्रेष्ठ. जो मनुष्य विधान पूर्वक (श्री प्रभु को) पवित्रा नहीं धराता है तो उसकी वार्षिकी सेवा निष्फल हो जाती है. पवित्रा बनाने के जो विधान शास्त्र में कहे गए हैं उसमें भी अनेक मत हैं. तीन सौ साठ तारों का पवित्रा उत्तम है, दो सौ सत्तर तारों पवित्रा मध्यम है और एक सौ अस्सी तारों का पवित्रा कनिष्ठ है. कुछ आचार्य पवित्रा में लगायी जाने वाली गाँठों के विषय में उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ का प्रकार बतातें हैं जिनमें 24, 12 व 8 गाँठें क्रमशः उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ मानी गयी हैं. हमारे प्रभु तो उत्तम वस्तु के ही भोक्ता हैं अतः उन्हें उत्तम पवित्रा ही धरायें. पवित्रा का उत्तम होने के साथ शोभायमान होना भी अत्यावश्यक है. उसकी ग्रंथियाँ सुन्दर लम्बी गोलाई वाली हों जो प्रभु को चुभें नहीं. पवित्रा सुन्दर उत्तम और सुगन्धित केसर से रंगा होना चाहिए. पवित्रा धरने का फल शास्त्र ने यह बतलाया है - “पवित्रारोपणं विष्णोः भक्तिरत्नप्रदायकम् | स्त्रीपुंकीर्तिप्रदं पुण्यं सुख सम्पद्दनावहम् ||” अर्थात यह पवित्रा समर्पण प्रभु के भक्ति रत्न को देता है, स्त्रियों और पुरुषों को कीर्ति और पुण्य जनक है तथा सुख संपत्ति और धन देता है. (हमें पवित्रा का फल, लौकिक सुख संपत्ति अथवा धनादि नहीं चाहिए, पुष्टिभक्त को तो केवल प्रभु के भक्ति रत्न से ही संतुष्टि मिलती है अतः प्रभु की प्रेमलक्षणा भक्ति की सिद्धि के लिए ही पवित्रा धरायें न कि कोई अन्य लौकिक फल की आकांक्षा से) वैष्णव अपने घर में ठाकुरजी सेवा हो वे शृंगार में ( श्रीजी को धराने के उपरांत ) अपने सेव्य ठाकुरजी को पवित्रा धरा सकते हैं. पवित्रा एकादशी से रक्षाबंधन तक पांच दिन श्रृंगार पश्चात् पवित्रा धराये जाते हैं. किसी कारणवश इन पांच दिवस में पवित्रा नहीं धरे जाएँ तो जन्माष्टमी तक पवित्रा धराये जा सकते हैं और यदि जन्माष्टमी तक भी पवित्रा नहीं धराये जा सकें तो देव प्रबोधिनी तक भी धराये जाने का सदाचार है परन्तु सभी वैष्णवों को अपने ठाकुरजी को पवित्रा धरना अवश्य ही चाहिए अन्यथा सारे वर्ष की सेवा सफल नहीं पवित्रा धराये पश्चात् आज से जन्माष्टमी की नौबत (एक प्रकार का वाध्य) की बधाई बैठती है. इसका कारण यह है कि जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्य जी ने दैवीजीवों के उद्धार हेतु आज के दिन ही डंका बजा कर घोषणा की थी. *"पुष्टिप्रागट्यदिन कैसे मनाए ?* श्रीवल्लभ संप्रदाय के वैष्णवों के लिए पवित्रा एकदशी ओर पवित्रा द्वादशी " पुष्टीप्रागट्यदिन" के नाम से इस पर्व को सब जानते है, ओर श्रद्धा से इस मंगलमय दिन को मनाते है, उसकी पूर्व सब तैयारी करते है वर्ष के ३६० दिनों मे जो जो जो सेवा करने की रह गयी हो वह सेवा ३६० सुतकेधागे का पवित्रा इस दिन अपने हाथों से सिद्ध किया हुआ पवित्रा केसर से रंग में रंगा हुआ सुंदर पवित्रा , पवित्रा एकादशी के दिन अपने घर पर जो अपने निधि अपने निजि उनका जो नाम रखा हो वह स्वरुप को श्रीगार समय में पवित्रा पहिले सुत के धागों से बना पवित्रा बादमे कलाबत्तू के पवित्रा बादमे सिद्ध किये हुए रेशम के पवित्रा अपने प्रिय प्रभु को धराए एवं अपने ही घर पर अपने ही हाथों से सिद्ध की हुई केसरयुक्त मिश्री भोग धराए, पवित्रा धराने के पदगान जैसे भी आए वो गान करे तथा श्रीफल पर कंकु का साथिया बनाकर उसपर यथा इच्छा यथा शक्ति भेंट अपने प्रिय प्रभु को धरे, डंडवत प्रणाम करे, दुसरे दिन पवित्रा द्वादशी के दिन जिन आचार्य पर आसक्ति हो जिनकी कृपा से हमको प्रभु प्राप्त हुए एसे आचार्य महानुभाव को अपने हाथों से तैयार किया हुआ पवित्रा एवं सिद्ध की हुई मिश्री आरोगाए फिर रेशमादि के पवित्रा धराए, चरणस्पर्श करे, यथा इच्छा यथा शक्ति यथा भाव से भेंट धरे। यह दोनो दिन पुष्टिसृष्टि के वैष्णवो के लिए बहोत ही महत्व के दिन है।इस दिन पुरी सेवा करके ही बहार जाय यह सेवा कदापि न छोडे। इसप्रकार यह '"पुष्टिप्रागट्यदिन" सभी आत्मित वैष्णवजन अवश्य ही मनाए। जो इस मंगल अवसरपर यह उत्सव जो भाव प्रेम से मनाता है उसपर वह शीघ्र ही वह परम कृपा का पात्र हो जाता है। इति शुभम् *कीर्तन – (राग : सारंग)* हेरि है आज नंदराय के आनंद भयो l नाचत गोपी करत कुलाहल मंगल चार ठयो ll 1 ll राती पीरी चोली पहेरे नौतन झुमक सारी l चोवा चंदन अंग लगावे सेंदुर मांग संवारी ll 2 ll माखन दूध दह्यो भरिभाजन सकल ग्वाल ले आये l बाजत बेनु पखावज महुवरि गावति गीत सुहाये ll 3 ll हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आँगन बाढ़ी कीच l हसत परस्पर प्रेम मुदित मन लाग लाग भुज बीच ll 4 ll चहुँ वेद ध्वनि करत महामुनि पंचशब्द ढ़म ढ़ोल l ‘परमानंद’ बढ्यो गोकुलमे आनंद हृदय कलोल ll 5 ll श्री गिरिराज धरन की जय॥ श्री वल्लभाधीश की जय॥ श्री गुसाईं जी परमदयाल की जय॥ श्याम सुंदर श्रीयमुने महारानी की जय॥ ...
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1 दिन पहले
#🪔पुत्रदा एकादशी🚩 पवित्रा (पुत्रदा) एकादशी विशेष 〰〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा या पुत्रदा एकादशी के रुप में मनाते हैं। इस वर्ष पवित्रा एकादशी का व्रत 23 अगस्त रविवार को स्मार्त एवं गृहस्थ तथा 24 अगस्त सोमवार के दिन वैष्णव-एवं निम्बार्क सम्प्रदाय द्वारा मनाया जाना है। धर्म ग्रंथों के अनुसर इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है. पवित्रा एकादशी का महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था। पवित्रा एकादशी महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान के कथन अनुसार यदि नि:संतान व्यक्ति यह व्रत पूर्ण विधि-विधान व श्रृद्धा से करता है तो उसे संतान की प्राप्ति होती है. अत: संतान सुख की इच्छा रखने वालों को इस व्रत का पालन करने से संतान की प्राप्ति होती है. पवित्रा एकादशी का श्रवण एवं पठन करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है. वंश वृद्धि होती है तथा समस्त सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है। पवित्रा एकादशी पूजा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इस एकादशी का व्रत रहने वाले लोगों को दशमी से नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसके लिए आपको दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना है। दशमी के दिन प्याज लहसुन न खाएं। 1. रात्रि में शहद, चना तथा मसूर की दाल न खाएं। 2. दशमी के दिन साधारण भोजन करें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि भूलकर भी न लें। 3. जुआ आदि व्यसनों से दूर रहें। 4. ब्रह्मचर्य का पालन करें। 5. दिन के समय में सोएं नहीं। 6. पान नहीं खाना चाहिए। 7. झूठ न बोलें और दूसरों की निंदा न करें। एकादशी के दिन भगवान नारायण की पूजा की जाती है। सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए। सबसे पहले धूप-दीप आदि से भगवान नारायण की अर्चना की जाती है, उसके बाद फल-फूल, नारियल, पान, सुपारी, लौंग, बेर, आंवला आदि व्यक्ति अपनी सामर्थ्य अनुसार भगवान नारायण को अर्पित करते हैं। पूरे दिन निराहार रहकर संध्या समय में कथा आदि सुनने के पश्चात फलाहार किया जाता है इस दिन दीप दान करने का महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान एवं व्रत करना चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ एवं एकादशी कथा का श्रवण एवं पठन करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। पवित्रा एकादशी व्रत की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक बार की बात है, श्री युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? व्रत करने की विधि तथा इसका महात्म्य कृपा करके कहिए। मधुसूदन कहने लगे कि इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। अब आप शांतिपूर्वक इसकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल मिलता है। द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ‍ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है? राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे। एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था। सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो। लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है। उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ। यह वार्ता सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी। राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए। पुत्रदा एकादशी की अन्य कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्राचीन काल में एक नगर में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। राजा के कोई संतान नहीं थी इस बात को लेकर वह सदैव चिन्ताग्रस्त रहते थे। एक दिन राजा सुकेतुमान वन की ओर चल दिए। वन में चलते हुए वह अत्यन्त घने वन में चले गए। वन में चलते-चलते राजा को बहुत प्यास लगने लगी। वह जल की तलाश में वन में और अंदर की ओर चले गए जहाँ उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया। राजा ने देखा कि सरोवर के पास ऋषियों के आश्रम भी बने हुए है और बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे हैं। राजा ने सभी मुनियों को बारी-बारी से सादर प्रणाम किया। ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया, राजा ने ऋषियों से उनके एकत्रित होने का कारण पूछा। मुनि ने कहा कि वह विश्वेदेव हैं और सरोवर के निकट स्नान के लिए आये हैं। आज से पाँचवें दिन माघ मास का स्नान आरम्भ हो जाएगा और आज पुत्रदा एकादशी है। जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है। राजा ने यह सुनते ही कहा हे विश्वेदेवगण यदि आप सभी मुझ पर प्रसन्न हैं तब आप मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद दें। मुनि बोले हे राजन आज पुत्रदा एकादशी का व्रत है। आप आज इस व्रत को रखें और भगवान नारायण की आराधना करें। राजा ने मुनि के कहे अनुसार विधिवत तरीके से पवित्र एकादशी का व्रत रखा और अनुष्ठान किया। व्रत के शुभ फलों द्वारा राजा को संतान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार जो व्यक्ति इस व्रत को रखते हैं उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। संतान होने में यदि बाधाएं आती हैं तो इस व्रत के रखने से वह दूर हो जाती हैं। जो मनुष्य इस व्रत के महात्म्य को सुनता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। पवित्रा पुत्रदा एकादशी मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पवित्रा एकादशी का व्रत 23 अगस्त को सन्यासी (स्मार्त) एवं गृहस्थ द्वारा होगा तथा 24 अगस्त सोमवार के दिन वैष्णव एवं निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायी द्वारा रखा जाएगा। पवित्रा एकादशी का प्रारंभ 👉 22 अगस्त के मध्यरात्रि 02 बजकर 01 मिनट से। पवित्रा एकादशी का समाप्त 👉 23 अगस्त अन्तरात्रि 04:17 पर। पारण (व्रत खोलने का समय) 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 24 अगस्त को पारण (व्रत खोलने का) समय दोपहर 01:40 से सायं 04:15 तक पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय प्रातः 10:48। वैष्णव एकादशी के लिए पारण (व्रत तोड़ने का) समय 25 अगस्त प्रातः 05:55 से 06:20 तक। पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय प्रातः 06:20। श्री भगवान की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ जय जगदीश हरे ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे। जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे। मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे। तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे। तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे। तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे। दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे। विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा। स्वमी पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे। 〰〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स