महाका

sn vyas
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14 hours ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः बकासुर के वध से राक्षसों का भयभीत होकर पलायन और नगर निवासियों की प्रसन्नता...(दिन 468) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततः स भग्नपाश्र्श्वङ्गो नदित्वा भैरवं रवम् । शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद् बकः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! पसलीकी हड्डियोंके टूट जानेपर पर्वतके समान विशालकाय बकासुर भयंकर चीत्कार करके प्राणरहित हो गया ।। १ ।। तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः । निष्पपात गृहाद् राजन् सहैव परिचारिभिः ।। २ ।। तान् भीतान् विगतज्ञानान् भीमः प्रहरतां वरः । सान्त्वयामास बलवान् समये च न्यवेशयत् ।। ३ ।। न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् । हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ।। ४ ।। जनमेजय ! उस चीत्कारसे भयभीत हो उस राक्षसके परिवारके लोग अपने सेवकोंके साथ घरसे बाहर निकल आये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने उन्हें भयसे अचेत देखकर ढाढ़स बंधाया और उनसे यह शर्त करा ली कि 'अबसे कभी तुमलोग मनुष्योंकी हिंसा न करना। जो हिंसा करेंगे, उनका शीघ्र ही इसी प्रकार वध कर दिया जायगा' ।। २-४ ।। तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत । एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ।। ५ ।। भारत ! भीमकी यह बात सुनकर उन राक्षसोंने 'एवमस्तु' कहकर वह शर्त स्वीकार कर ली ।। ५ ।। ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत । नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ।। ६ ।। भारत! तबसे नगरनिवासी मनुष्योंने अपने नगरमें राक्षसोंको बड़े सौम्य स्वभावका देखा ।। ६ ।। ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम् । द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामानुपलक्षितः ।। ७ ।। तदनन्तर भीमसेनने उस राक्षसकी लाश उठाकर नगर के दरवाजे पर गिरा दी और स्वयं दूसरों की दृष्टिसे अपनेको बचाते हुए चले गये ।। ७ ।। दृष्ट्वा भीमबलोद्भूतं बकं विनिहतं तदा । ज्ञातयोऽस्य भयोद्विग्नाः प्रतिजग्मुस्ततस्ततः ।। ८ ।। भीमसेनके बलसे बकासुरको पछाड़ा एवं मारा गया देख उस राक्षसके कुटुम्बीजन भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भाग गये ।। ८ ।। ततः स भीमस्तं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् । आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ।। ९ ।। उस राक्षसको मारनेके पश्चात् भीमसेन ब्राह्मणके उसी घरमें गये तथा वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिरसे सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ९ ।। ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात् कल्यमेव तु । ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् ।। १० ।। तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ और लोग नगरसे बाहर निकले, तब उन्होंने देखा बकासुर खून से लथपथ हो पृथ्वी पर मरा पड़ा है ।। १० ।। तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् । दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः ।। ११ ।। पर्वत शिखर के समान भयानक उस राक्षस को नगर के दरवाजे पर फेंका हुआ देखकर नगर निवासी मनुष्यों के शरीर में रोमांच हो आया ।। ११ ।। एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे । तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः । ततः सहस्रशो राजन् नरा नगरवासिनः ।। १२ ।। ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् । दैवतान्यर्चयांचक्रुः सर्व एव विशाम्पते ।। १३ ।। राजन् ! उन्होंने एकचक्रा नगरी में जाकर नगरभरमें यह समाचार फैला दिया; फिर तो हजारों नगरनिवासी मनुष्य स्त्री, बच्चों और बूढ़ोंके साथ बकासुरको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय वह अमानुषिक कर्म देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। जनमेजय ! उन सभी लोगों ने देवताओं की पूजा की ।। १२-१३ ।। ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने । ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ।। १४ ।। इसके बाद उन्होंने यह जानने के लिये कि आज भोजन पहुँचाने की किसकी बारी थी, दिन आदि की गणना की। फिर उस ब्राह्मण की बारी का पता लगनेपर सब लोग उसके पास आकर पूछने लगे ।। १४ ।। एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् । उवाच नागरान् सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ।। १५ ।। इस प्रकार उनके बार-बार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पाण्डवोंको गुप्त रखते हुए समस्त नागरिकोंसे इस प्रकार कहा- ।। १५ ।। आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः । ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ।। १६ ।। 'कल जब मुझे भोजन पहुँचानेकी आज्ञा मिली, उस समय मैं अपने बन्धुजनोंके साथ रो रहा था। इस दशामें मुझे एक विशाल हृदयवाले मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणने देखा ।। १६ ।। परिपृच्छ्य स मां पूर्व परिक्लेशं पुरस्य च । अब्रवीद् ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ।। १७ ।। 'देखकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवताने पहले मुझसे सम्पूर्ण नगरके कष्टका कारण पूछा। इसके बाद अपनी अलौकिक शक्तिका विश्वास दिलाकर हँसते हुए-से कहा- ।। १७ ।। प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद् दुरात्मने । मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ।। १८ ।। 'ब्रह्मन् ! आज मैं स्वयं ही उस दुरात्मा राक्षसके लिये भोजन ले जाऊँगा।' उन्होंने यह भी बताया कि 'आपको मेरे लिये भय नहीं करना चाहिये' ।। १८ ।। स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति । तेन नूनं भवेदेतत् कर्म लोकहितं कृतम् ।। १९ ।। 'वे वह भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके वनकी ओर गये। अवश्य उन्होंने ही यह लोक-हितकारी कर्म किया होगा' ।। १९ ।। ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः। वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ।। २० ।। तब तो वे सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित हो आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय उन्होंने ब्राह्मणोंके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव मनाया ।। २० ।। ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति । तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ।। २१ ।। इसके बाद उस अद्भुत घटनाको देखनेके लिये जनपदमें रहनेवाले सब लोग नगरमें आये और पाण्डवलोग भी (पूर्ववत्) वहीं निवास करने लगे ।। २१ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकवधे त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः।। १६३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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9 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणी का स्वयं मरने के लिये उद्यत होकर पति से जीवित रहने के लिये अनुरोध करना...(दिन 459) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ब्राह्मण्युवाच न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् । न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ।। १ ।। ब्राह्मणी बोली-प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ।। १ ।। अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः । अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ।। २ ।। एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २ ।। भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते। व्यथां जहि सुबुद्धया त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ।। ३ ।। एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम्। प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ।। ४ ।। पत्नी, पुत्र और पुत्री- ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ।। ३-४ ।। तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् । भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ।। ५ ।। पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ।। ५ ।। एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव । अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ।। ६ ।। यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ।। ६ ।। यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि । कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ।। ७ ।। जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ।। ७ ।। समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा । न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ।॥ ८ ॥ इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ।। ८ ।। मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर । कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ।। ९ ।। मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर ! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ।। ९ ।। कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया । मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ।। १० ।। मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ।। १० ।। अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् । अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ।। ११ ।। जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ।। ११ ।। उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः । प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ।। १२ ।। साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः । स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ।। १३ ।। जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय में श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ।। १२-१३ ।। कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम्। पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ।। १४ ।। आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ।। १४ ।। कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् । अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।। आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्‌गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।। इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम्। अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।। जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।। तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्‌गुणैरुपबृंहिताम् । प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।। आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायेंगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।। सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः । अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।। अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती । अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।। ब्रह्मन् ! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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11 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 468) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम् । जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तरम् ।। २४ ।। धनकी इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करनेमें तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धनमें आसक्ति हो गयी है, उसे उस धनका वियोग होनेपर इतना महान् दुःख होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है ।। २४ ।। न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः । पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम् ।। २५ ।। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इस विपत्तिसे छुटकारा पा सकूँ अथवा पुत्र और स्त्रीके साथ किसी निरापद स्थानमें भाग चलूँ ।। २५ ।। यतितं वै मया पूर्व वेत्थ ब्राह्मणि तत् तथा । क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ।। २६ ।। ब्राह्मणी! तुम इस बातको ठीक-ठीक जानती हो कि पहले तुम्हारे साथ किसी ऐसे स्थानमें चलनेके लिये जहाँ सब प्रकारसे अपना भला हो, मैंने प्रयत्न किया था; परंतु उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी ।। २६ ।। इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै । उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयासकृत् ।। २७ ।। मूढमते ! मैं बार-बार तुमसे अन्यत्र चलनेके लिये अनुरोध करता। उस समय तुम कहने लगती थीं- 'यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं बड़ी हुई तथा मेरे पिता भी यहीं रहते थे' ।। २७ ।। स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव । बान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ।। २८ ।। अरी! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता और पहलेके भाई-बन्धु जिसे छोड़कर बहुत दिन हुए स्वर्गलोकको चले गये, वहीं निवास करनेके लिये यह आसक्ति कैसी? ।। २८ ।। सोऽयं ते बन्धुकामाया अशृण्वत्या वचो मम । बन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ।। २९ ।। तुमने बंधु-बान्धवोंके साथ रहनेकी इच्छा रखकर जो मेरी बात नहीं सुनी, उसीका यह फल है कि आज समस्त भाई-बंधुओंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है, जो मेरे लिये अत्यन्त दुःखका कारण है ।। २९ ।। अथवा मद्विनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन । परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत् ।। ३० ।। अथवा यह मेरे ही विनाशका समय है; क्योंकि मैं स्वयं जीवित रहकर क्रूर मनुष्यकी भाँति दूसरे किसी भाई-बंधुका त्याग नहीं कर सकूँगा ।। ३० ।। सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम । सखायं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ।। ३१ ।। प्रिये ! तुम मेरी सहधर्मिणी और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली हो। सदा सावधान रहकर माताके समान मेरा पालन-पोषण करती हो। देवताओंने तुम्हें मेरी सखी (सहायिका) बनाया है। तुम सदा मेरी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हो ।। ३१ ।। पित्रा मात्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् । वरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत् परिणीय च ।। ३२ ।। तुम्हारे पिता-माताने तुम्हें सदाके लिये मेरे गृहस्थाश्रमकी अधिकारिणी बनाया है। मैंने विधिपूर्वक तुम्हारा वरण करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक तुम्हारे साथ विवाह किया है ।। ३२ ।। कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि । त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् ।। ३३ ।। परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्या नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ।। ३४ ।। बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् । भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ।। ३५ ।। यया दौहित्रजॉल्लोकानाशंसे पितृभिः सह । स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३६ ।। तुम कुलीन, सुशीला और संतानवती हो, सती-साध्वी हो। तुमने कभी मेरा अपकार नहीं किया है। तुम नित्य मेरे अनुकूल चलनेवाली धर्मपत्नी हो। अतः मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये तुम्हें नहीं त्याग सकूँगा। फिर स्वयं ही अपने उस पुत्रका त्याग तो कैसे कर सकूँगा, जो अभी निरा बच्चा है, जिसने युवावस्थामें प्रवेश नहीं किया है तथा जिसके शरीरमें अभी जवानीके लक्षणतक नहीं प्रकट हुए हैं। साथ ही अपनी इस कन्याको कैसे त्याग दूँ, जिसे महात्मा ब्रह्माजीने उसके भावी पतिके लिये धरोहरके रूपमें मेरे यहाँ रख छोड़ा है? जिसके होनेसे में पितरों के साथ दौहित्रजनित पुण्यलोकों को पाने की आशा रखता हूँ, उसी अपनी बालिकाको स्वयं ही जन्म देकर मैं मौतके मुखमें कैसे छोड़ सकता हूँ? ।। ३३-३६ ।। मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः । कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ।। ३७ ।। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पिताका अधिक स्नेह पुत्रपर होता है तथा कुछ दूसरे लोग पुत्रीपर ही अधिक स्नेह बताते हैं; किंतु मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं ।। ३७ ।। यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३८ ।। जिसपर पुण्यलोक, वंशपरम्परा और नित्य सुख- सब कुछ सदा निर्भर रहते हैं, उस निष्पाप बालिका का परित्याग में कैसे कर सकता हूँ ।। ३८ ।। आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः । त्यक्ता होते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ।। ३९ ।। अपनेको भी त्यागकर परलोकमें जानेपर मैं सदा इस बातके लिये संतप्त होता रहूँगा कि मेरे द्वारा त्यागे हुए ये बच्चे अवश्य ही यहाँ जीवित नहीं रह सकेंगे ।। ३९ ।। एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः । आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मया विना ।। ४० ।। इनमेंसे किसीका भी त्याग विद्वानोंने निर्दयतापूर्ण तथा निन्दनीय बताया है और मेरे मर जानेपर ये सभी मेरे बिना मर जायेंगे ।। ४० ।। स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम् । अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धवः । सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ।। ४१ ।। अहो ! मैं बड़ी कठिन विपत्तिमें फँस गया हूँ। इससे पार होनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवनको। हाय! मैं बन्धु-बान्धवोंके साथ आज किस गतिको प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना कदापि उचित नहीं है ।। ४१ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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20 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 450) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच सा तानेवापतत् तूर्ण भगिनी तस्य रक्षसः । अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ।। अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् । अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हिडिम्बा सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेन से बोली। हिडिम्बोवाच अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ।। राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ।।) हिडिम्बाने कहा- (आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ। भीमसेन उवाच स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ।। १ ।। भीमसेन बोले-हिडिम्बे ! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ।। १ ।। युधिष्ठिर उवाच क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्म गोपाय पाण्डव ।। २ ।। यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा- पुरुषसिंह भीम ! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन ! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ।। २ ।। वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् । रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ।। ३ ।। महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ।। ३ वैशम्पायन उवाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ।। ४ ।। आयें जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् । तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ।। ५ ।। 'आयें! स्त्रियोंको इस जगत्‌में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे ! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ।। ५ ।। सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया । सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ।। ६ ।। 'मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ।। ६ ।। मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ।। ७ ।। 'शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्म का परित्याग करके आपके पुत्र पुरुष सिंह भीमसेन को अपना पति चुना है ।। ७ ।। वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ८ ।। 'यशस्विनि ! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थना को ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ।। ८ ।। तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ।। ९ ।। अतः वरवर्णिनि ! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ।। ९ ।। भर्भानेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ।। १० ।। 'महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ।। १० ।। अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ।। पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ।। अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् ।) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ।। ११ ।। पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ।। १२ ।। 'आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ।। ११-१२ ।। आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ।। १३ ।। 'जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ।। १३ ।। आपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तमः व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ।। १४ ।। 'जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️