#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣1️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिर का युवराजपद पर अभिषेक, पाण्डवों के शौर्य, कीर्ति और बल के विस्तार से धृतराष्ट्र को चिन्ता...(दिन 414)
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वैशम्पायन उवाच
ततः संवत्सरस्यान्ते यौवराज्याय पार्थिव । स्थापितो धृतराष्ट्रण पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १ ।।
धृतिस्थैर्यसहिष्णुत्वादानृशंस्यात् तथार्जवात् । भृत्यानामनुकम्पार्थ तथैव स्थिरसौहृदात् ।। २ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर धृतराष्ट्रने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको धृति, स्थिरता, सहिष्णुता, दयालुता, सरलता तथा अविचल सौहार्द आदि सद्गुणोंके कारण पालन करनेयोग्य प्रजापर अनुग्रह करनेके लिये युवराजपदपर अभिषिक्त कर दिया ।। १-२ ।।
ततोऽदीर्घेण कालेन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । पितुरन्तर्दधे कीर्ति शीलवृत्तसमाधिभिः ।। ३ ।।
इसके बाद थोड़े ही दिनोंमें कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अपने शील (उत्तम स्वभाव), वृत्त (सदाचार एवं सद्व्यवहार) तथा समाधि (मनोयोगपूर्वक प्रजापालनकी प्रवृत्ति) के द्वारा अपने पिता महाराज पाण्डुकी कीर्तिको भी ढक दिया ।। ३ ।।
असियुद्धे गदायुद्धे रथयुद्धे च पाण्डवः । संकर्षणादशिक्षद् वै शश्वच्छिक्षां वृकोदरः ।। ४ ।।
पाण्डुनन्दन भीमसेन बलरामजीसे नित्यप्रति खड्गयुद्ध, गदायुद्ध तथा रथयुद्धकी शिक्षा लेने लगे ।। ४ ।।
समाप्तशिक्षो भीमस्तु द्युमत्सेनसमो बले।
पराक्रमेण सम्पन्नो भ्रातॄणामचरद् वशे ।। ५ ।।
शिक्षा समाप्त होनेपर भीमसेन बलमें राजा द्युमत्सेनके समान हो गये और पराक्रमसे सम्पन्न हो अपने भाइयोंके अनुकूल रहने लगे ।। ५ ।।
प्रगाढदृढमुष्टित्वे लाघवे वेधने तथा । क्षुरनाराचभल्लानां विपाठानां च तत्त्ववित् ।। ६ ।।
ऋजुवक्रविशालानां प्रयोक्ता फाल्गुनोऽभवत् । लाघवे सौष्ठवे चैव नान्यः कश्चन विद्यते ।। ७ ।।
बीभत्सुसदृशो लोके इति द्रोणो व्यवस्थितः ।
ततोऽब्रवीद् गुडाकेशं द्रोणः कौरवसंसदि ।। ८ ।।
अर्जुन अत्यन्त दृढ़तापूर्वक मुट्ठीसे धनुषको पकड़नेमें, हाथोंकी फुर्तीमें और लक्ष्यको बींधनेमें बड़े चतुर निकले। वे क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ नामक ऋजु, वक्र और विशाल अस्त्रोंके संचालनका गूढ़ तत्त्व अच्छी तरह जानते और उनका सफलतापूर्वक प्रयोग कर सकते थे। इसलिये द्रोणाचार्यको यह दृढ़ विश्वास हो गया था कि फुर्ती और सफाईमें अर्जुनके समान दूसरा कोई योद्धा इस जगत्में नहीं है। एक दिन द्रोणने कौरवोंकी भरी सभामें निद्राको जीतनेवाले अर्जुनसे कहा- ।। ६-८ ।।
अगस्त्यस्य धनुर्वेदे शिष्यो मम गुरुः पुरा । अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्मि भारत ।। ९ ।।
तीर्थात् तीर्थं गमयितुमहमेतत् समुद्यतः । तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ।। १० ।।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि । ददता गुरुणा चोक्तं न मनुष्येष्विदं त्वया ।। ११ ।।
भारद्वाज विमोक्तव्यमल्पवीर्येष्वपि प्रभो । त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योऽर्हति त्विदम् ।। १२ ।।
समयस्तु त्वया रक्ष्यो मुनिसृष्टो विशाम्पते ।
आचार्यदक्षिणां देहि ज्ञातिग्रामस्य पश्यतः ।। १३ ।।
'भारत ! मेरे गुरु अग्निवेश नामसे विख्यात हैं। उन्होंने पूर्वकालमें महर्षि अगस्त्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी। मैं उन्हीं महात्मा अग्निवेशका शिष्य हूँ। एक पात्र (गुरु)-से दूसरे (सुयोग्य शिष्य) को इसकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे सर्वथा उद्यत होकर मैंने तुम्हें यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र प्रदान किया, जो मुझे बड़ी तपस्यासे मिला था। वह अमोघ अस्त्र वज्रके समान प्रकाशमान है। उसमें समूची पृथ्वीको भी भस्म कर डालनेकी शक्ति है। मुझे वह अस्त्र देते समय गुरु अग्निवेशजीने कहा था, 'शक्तिशाली भारद्वाज! तुम यह अस्त्र मनुष्योंपर न चलाना। मनुष्येतर प्राणियोंमें भी जो अल्पवीर्य हों, उनपर भी इस अस्त्रको न छोड़ना।' वीर अर्जुन! इस दिव्य अस्त्रको तुमने मुझसे पा लिया है। दूसरा कोई इसे नहीं प्राप्त कर सकता। राजकुमार! इस अस्त्रके सम्बन्धमें मुनिके बताये हुए इस नियमका तुम्हें भी पालन करना चाहिये। अब तुम अपने भाई-बन्धुओंके सामने ही मुझे एक गुरु-दक्षिणा दो' ।। ९-१३ ।।
ददानीति प्रतिज्ञाते फाल्गुनेनाब्रवीद् गुरुः।
युद्धेऽहं प्रतियोद्धव्यो युध्यमानस्त्वयानघ ।। १४ ।।
तब अर्जुनने प्रतिज्ञा की- 'अवश्य दूँगा।' उनके यों कहनेपर गुरु द्रोण बोले- 'निष्पाप अर्जुन ! यदि युद्धभूमि में मैं भी तुम्हारे विरुद्ध लड़ने को आऊँ तो तुम (अवश्य) मेरा सामना करना' ।। १४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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