mahabharata

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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 457) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ रोरूयमाणांस्तान् दृष्ट्वा परिदेवयतश्च सा । कारुण्यात् साधुभावाच्च कुन्ती राजन् न चक्षमे ।। १० ।। राजन् ! उन ब्राह्मण-परिवारके लोगोंको बहुत रोते और विलाप करते देख कुन्ती देवी अत्यन्त दयालुता तथा साधु-स्वभाव के कारण सहन न कर सकीं ।। १० ।। मथ्यमानेन दुःखेन हृदयेन पृथा तदा । उवाच भीमं कल्याणी कृपान्वितमिदं वचः ।। ११ ।। वसाम सुसुखं पुत्र ब्राह्मणस्य निवेशने । अज्ञाता धार्तराष्ट्रस्य सत्कृता वीतमन्यवः ।। १२ ।। उस समय उनका दुःख मानो कुन्तीदेवी के हृदय को मथे डालता था। अतः कल्याणमयी कुन्ती भीमसेन से इस प्रकार करुणायुक्त वचन बोलीं- 'बेटा! हमलोग इस ब्राह्मण के घर में दुर्योधन से अज्ञात रहकर बड़े सुख से निवास करते हैं। यहाँ हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हम अपने दुःख और दैन्य को भूल गये हैं ।। ११-१२ ।। सा चिन्तये सदा पुत्र ब्राह्मणस्यास्य किं न्वहम् । प्रियं कुर्यामिति गृहे यत् कुर्युरुषिताः सुखम् ।। १३ ।। 'इसलिये पुत्र ! मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि इस ब्राह्मणका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ, जिसे किसीके घरमें सुखपूर्वक रहनेवाले लोग किया करते हैं ।। १३ ।। एतावान् पुरुषस्तात कृतं यस्मिन् न नश्यति । यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यादभ्यधिकं ततः ।। १४ ।। 'तात! जिसके प्रति किया हुआ उपकार उसका बदला चुकाये बिना नष्ट नहीं होता, वही पुरुष है (और इतना ही उसका पौरुष- मानवता है कि) दूसरा मनुष्य उसके प्रति जितना उपकार करे, वह उससे भी अधिक उस मनुष्य का प्रत्युपकार कर दे ।। १४ ।। तदिदं ब्राह्मणस्यास्य दुःखमापतितं ध्रुवम्। तत्रास्य यदि साहाय्यं कुर्यामुपकृतं भवेत् ।। १५ ।। 'इस समय निश्चय ही इस ब्राह्मणपर कोई भारी दुःख आ पड़ा है। यदि उसमें मैं इसकी सहायता करूँ तो वास्तविक उपकार हो सकता है' ।। १५ ।। भीमसेन उवाच ज्ञायतामस्य यद् दुःखं यतश्चैव समुत्थितम् । विदित्वा व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ।। १६ ।। भीमसेन बोले- माँ ! पहले यह मालूम करो कि इस ब्राह्मणको क्या दुःख है और वह किस कारणसे प्राप्त हुआ है। जान लेनेपर अत्यन्त दुष्कर होगा, तो भी मैं इसका कष्ट दूर करने के लिये उद्योग करूँगा ।। १६ ।। वैशम्पायन उवाच एवं तौ कथयन्तौ च भूयः शुश्रुवतुः स्वनम् । आर्तिजं तस्य विप्रस्य सभार्यस्य विशाम्पते ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! वे माँ-बेटे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि पुनः पत्नी सहित ब्राह्मण का आर्तनाद उनके कानों में पड़ा ।। १७ ।। अन्तःपुरं ततस्तस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः। विवेश त्वरिता कुन्ती बद्धवत्सेव सौरभी ।। १८ ।। तब कुन्तीदेवी तुरंत ही उस महात्मा ब्राह्मणके अन्तः पुरमें घुस गयीं ठीक उसी तरह जैसे घरके भीतर बँधे हुए बछड़ेवाली गाय स्वयं ही उसके पास पहुँच जाती है ।। १८ ।। ततस्तं ब्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च । दुहित्रा चैव सहितं ददर्शावनताननम् ।। १९ ।। भीतर जाकर कुन्तीने ब्राह्मणको वहाँ पत्नी, पुत्र और कन्याके साथ नीचे मुँह किये बैठे देखा ।। १९ ।। ब्राह्मण उवाच धिगिदं जीवितं लोके गतसारमनर्थकम् । दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रियभागि च ।। २० ।। ब्राह्मणदेवता कह रहे थे- जगत्‌के इस जीवनको धिक्कार है; क्योंकि यह सारहीन, निरर्थक, दुःखकी जड़, पराधीन और अत्यन्त अप्रियका भागी है ।। २० ।। जीविते परमं दुःखं जीविते परमो ज्वरः । जीविते वर्तमानस्य दुःखानामागमो ध्रुवः ।। २१ ।। जीनेमें महान् दुःख है। जीवनकालमें बड़ी भारी चिन्ताका सामना करना पड़ता है। जिसने जीवन धारण कर रखा है, उसे दुःखोंकी प्राप्ति अवश्य होती है ।। २१ ।। आत्मा होको हि धर्मार्थी कामं चैव निषेवते । एतैश्च विप्रयोगोऽपि दुःखं परमनन्तकम् ।। २२ ।। जीवात्मा अकेला ही धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है। इनका वियोग होना भी उसके लिये महान् और अनन्त दुःखका कारण होता है ।। २२ ।। आहुः केचित् परं मोक्षं स च नास्ति कथंचन । अर्थप्राप्तौ तु नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ।। २३ ।। कुछ लोग चारों पुरुषार्थोंमें मोक्षको ही सर्वोत्तम बतलाते हैं, किंतु वह भी मेरे लिये किसी प्रकार सुलभ नहीं है। अर्थकी प्राप्ति होनेपर तो नरकका सम्पूर्ण दुःख भोगना ही पड़ता है ।। २३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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#जय श्री कृष्ण #महाभारत की कथा #महाभारत युद्ध #महाभारत भगवान श्रीकृष्ण ने ली कर्ण की दानशीलता की परीक्षा:: कहा जाता है कि कर्ण के द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। उनके लिए दान केवल धन-संपत्ति देने का नाम नहीं था। दान उनके लिए जीवन का व्रत था। उनका विश्वास था— दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥ भावार्थ: धन की तीन ही गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। जो न स्वयं उसका सदुपयोग करता है और न दूसरों को देता है, उसके धन की अंततः नाश की ओर गति होती है। कर्ण के जीवन में दान इतना महत्वपूर्ण था कि वे अपने प्राणों से भी अधिक अपने वचन को महत्व देते थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ बैठे थे। अर्जुन को अपने धनुष, पराक्रम और युद्ध-कौशल पर गर्व था। किंतु श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण के व्यक्तित्व में एक ऐसी शक्ति है जो उसे संसार के महानतम दानवीरों में स्थान देती है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “पार्थ! संसार में अनेक वीर हैं, अनेक धनवान हैं और अनेक यशस्वी हैं। लेकिन कर्ण जैसा दानी मिलना अत्यंत दुर्लभ है।” अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा— “माधव! क्या कोई व्यक्ति दान में इतना महान हो सकता है कि उसके सामने संसार का कोई दूसरा व्यक्ति टिक ही न सके?” श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा— “किसी मनुष्य की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब उससे वही वस्तु माँगी जाए जिसे देना उसके लिए अत्यंत कठिन हो।” अर्जुन शांत हो गए। तब श्रीकृष्ण ने कर्ण की दानशीलता की परीक्षा लेने का निश्चय किया। कहा जाता है कि एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और कर्ण के महल की ओर चल पड़े। उस समय आकाश में घने बादल छाए हुए थे। वर्षा हो रही थी। चारों ओर जल ही जल था। कर्ण अपने महल में बैठे हुए थे। उन्होंने जैसे ही उस वृद्ध ब्राह्मण को अपने द्वार पर देखा, तुरंत उठ खड़े हुए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा— “आइए विप्रवर! आपका मेरे द्वार पर आना ही मेरे लिए सौभाग्य है। कृपया बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?” वृद्ध ब्राह्मण ने कहा— “राजन! मैं अत्यंत आवश्यक कार्य से आया हूँ। मुझे यज्ञ के लिए कुछ विशेष सूखी चंदन की लकड़ियाँ चाहिए।” कर्ण ने तुरंत अपने सेवकों को आदेश दिया— “राजभंडार से उत्तम चंदन की लकड़ियाँ लाओ।” सेवक गए और थोड़ी देर बाद लौटकर बोले— “महाराज! बाहर बहुत वर्षा हो रही है। महल के भंडार में रखी सारी लकड़ियाँ गीली हो चुकी हैं। एक भी लकड़ी ऐसी नहीं है जिसे अभी यज्ञ में जलाया जा सके।” कर्ण ने ब्राह्मण की ओर देखा। ब्राह्मण शांत खड़े थे। उन्होंने कहा— “राजन, यदि सूखी लकड़ी नहीं है तो मैं लौट जाता हूँ।” कर्ण ने कहा— “नहीं विप्रवर! मेरे द्वार से कोई याचक निराश होकर नहीं लौट सकता।” उन्होंने चारों ओर देखा। बारिश लगातार हो रही थी। महल की खिड़कियों और दरवाजों पर सुंदर, सुगंधित चंदन की लकड़ी लगी हुई थी। कर्ण कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने अपनी तलवार उठाई। अर्जुन की आँखों के सामने जैसे कर्ण का पूरा व्यक्तित्व जीवित हो उठा— वह योद्धा जिसने अपना जन्मजात कवच दान कर दिया था… वह पुरुष जिसने अपने जीवन की सबसे प्रिय वस्तुएँ भी याचक को दे दी थीं… और अब वह अपने महल को भी दान करने के लिए तैयार था। कर्ण ने अपनी तलवार से महल के चंदन के दरवाजे और चौखटें काटनी शुरू कर दीं। ठक! एक लकड़ी टूटी। ठक! दूसरी चौखट टूट गई। बारिश बाहर बरस रही थी, लेकिन कर्ण के हाथों में दान का संकल्प अग्नि की तरह प्रज्वलित था। उन्होंने सारी चंदन की लकड़ियाँ एकत्र कर उस ब्राह्मण के सामने रख दीं। कर्ण ने हाथ जोड़कर कहा— “विप्रवर! मेरे पास जो कुछ था, वह मैंने आपको दे दिया। यदि आपको और कुछ चाहिए तो निःसंकोच कहिए।” तब ब्राह्मण का वास्तविक रूप प्रकट हुआ वृद्ध ब्राह्मण मुस्कुराए। अचानक उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। वृद्धावस्था का रूप समाप्त हो गया। सामने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण खड़े थे। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म की दिव्य आभा दिखाई देने लगी। कर्ण कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरंत भूमि पर दंडवत प्रणाम किया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। कर्ण बोले— “प्रभु! आपने मेरी परीक्षा क्यों ली?” श्रीकृष्ण ने कर्ण को उठाया और प्रेमपूर्वक कहा— “राधेय! मैं तुम्हारे दान की परीक्षा लेने नहीं आया था। मैं तो संसार को यह दिखाने आया था कि सच्चा दान क्या होता है।” कर्ण ने सिर झुका लिया। श्रीकृष्ण ने कहा— “जिसके पास बहुत धन हो और वह थोड़ा-सा दे दे, उसे दानी कहना सरल है। लेकिन जिसके पास जो कुछ है, वह उसे भी याचक के चरणों में रख दे—उसका त्याग असाधारण होता है।” दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ जो दान केवल इसलिए दिया जाता है कि देना मेरा कर्तव्य है, जो उचित समय, उचित स्थान और योग्य पात्र को बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के दिया जाए—वह सात्त्विक दान कहलाता है। श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा— “राधेय! तुम्हारे दान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तुम दान के बदले कुछ माँगते नहीं हो।” “तुम्हारे लिए दान सौदा नहीं है।” “तुम्हारे लिए दान तुम्हारे हृदय की स्वाभाविक करुणा है।” कर्ण की आँखों में आँसू आ गए कर्ण ने धीरे से कहा— “प्रभु! मेरे पास ऐसा क्या है जो आपका नहीं है? यह शरीर, यह धन, यह राज्य, यह जीवन—सब तो समय ने मुझे दिया है। यदि मेरे द्वार पर कोई आवश्यकता लेकर आता है, तो मैं उसे कैसे लौटा दूँ?” श्रीकृष्ण कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कर्ण के कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने कहा— “इसीलिए तो तुम कर्ण हो।” कर्ण के दान की महानता केवल इस बात में नहीं थी कि वह बहुत कुछ देता था। उनकी महानता यह थी कि— वह प्रिय वस्तु देता था। वह कठिन समय में देता था। वह बिना बदले की अपेक्षा के देता था। और सबसे बड़ी बात— वह याचक की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता से ऊपर रख देता था। शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः। वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा॥ सैकड़ों में कोई एक वीर मिलता है, हजारों में कोई विद्वान मिलता है, दस हजारों में कोई अच्छा वक्ता मिलता है; लेकिन सच्चा दानी मिले या न मिले, यह निश्चित नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा— “दान की कीमत वस्तु से नहीं, त्याग की भावना से निर्धारित होती है।” “जिस वस्तु को देकर तुम्हें कोई पीड़ा नहीं होती, उसका दान सरल है।” “लेकिन जिसे देने में हृदय काँप उठे और फिर भी तुम उसे किसी जरूरतमंद को दे दो—वही वास्तविक त्याग है।” कर्ण ने भगवान के चरणों में अपना सिर रख दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा— “तुम्हारा जीवन संघर्षों से भरा रहा है, राधेय। तुम्हें संसार ने बहुत कुछ दिया भी और बहुत कुछ छीन भी लिया। लेकिन तुम्हारे भीतर जो दान का प्रकाश है, उसे कोई नहीं छीन सकता।” कर्ण की आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा— “प्रभु! यदि मेरे जीवन में कोई पुण्य है, तो वह केवल इतना है कि मेरे द्वार से कोई निराश होकर न जाए।” श्रीकृष्ण मुस्कुराए। और उस क्षण मानो स्वयं धर्म ने कर्ण के सामने सिर झुका दिया। कर्ण की यह लोकप्रचलित कथा हमें यह नहीं सिखाती कि मनुष्य अपनी सारी संपत्ति बाँट दे। यह हमें इससे कहीं गहरी बात सिखाती है— दान वस्तु का नहीं, हृदय का होता है। किसी भूखे को भोजन देना दान है। किसी दुखी को सहारा देना दान है। किसी निराश व्यक्ति को आशा देना दान है। किसी अज्ञानी को ज्ञान देना दान है। और किसी जरूरतमंद के आँसू पोंछ देना भी दान है। कर्ण की कथा हमें याद दिलाती है— धन से बड़ा दान हृदय का है, वस्तु से बड़ा दान भावना का है, और जीवन का सबसे बड़ा दान है— अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के काम आ जाना। इसीलिए युगों बाद भी जब “दानवीर” शब्द बोला जाता है, तो कर्ण का नाम आदर से लिया जाता है। जय श्रीकृष्ण। 🙏 दानवीर कर्ण को शत-शत नमन। 🙏
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