#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
दशाधिकशततमोऽध्यायः
कुन्ती को दुर्वासा से मन्त्र की प्राप्ति, सूर्यदेव का आवाहन तथा उनके संयोग से कर्ण का जन्म एवं कर्ण के द्वारा इन्द्र को कवच और कुण्डलों का दान...(दिन 335)
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मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत । एवमुक्त्वा स भगवान् कुन्तिराजसुतां तदा ।। १७ ।।
प्रकाशकर्ता तपनः सम्बभूव तया सह । तत्र वीरः समभवत् सर्वशस्त्रभृतां वरः । आमुक्तकवचः श्रीमान् देवगर्भः श्रियान्वितः ।। १८ ।।
'रानी! मेरी कृपासे तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा।' कुन्तिराजकुमारी कुन्तीसे यों कहकर प्रकाश और गरमी उत्पन्न करनेवाले भगवान् सूर्यने उसके साथ समागम किया। इससे उसी समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने जन्मसे ही कवच पहन रखा था और वह देवकुमारके समान तेजस्वी तथा शोभासम्पन्न था ।। १७-१८ ।।
सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ।
अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।। १९ ।।
जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यात है ।। १९ ।।
प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः।
दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ।। २० ।।
उत्तम प्रकाश वाले भगवान् सूर्य ने कुली को पुनः कन्यात्व प्रदान किया। तत्पश्चात् तपने वालों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य देवलोक में चले गये ।। २० ।।
दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वाष्र्णेयी दीनमानसा ।
एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ।। २१ ।।
उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुलीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा ।। २१ ।।
गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात् तदा ।
उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ।। २२ ।।
उस समय कुटुम्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीने महाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया ।। २२ ।।
तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः ।
पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ।। २३ ।।
जलमें छोड़े हुए उस नवजात शिशुको महायशस्वी सूतपुत्र अधिरथने, जिसकी पत्नीका नाम राधा था, ले लिया। उसने और उसकी पत्नीने उस बालकको अपना पुत्र बना लिया ।। २३ ।।
नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तायुभौ।
वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति ।। २४ ।।
उन दम्पतिने उस बालकका नामकरण इस प्रकार किया; यह वसु (कवच-कुण्डलादि धन) के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिये वसुषेण नाम से प्रसिद्ध हो ।। २४ ।।
स वर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेपूद्यतोऽभवत् ।
आ पृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ।। २५ ।।
वह बलवान् बालक बड़े होनेके साथ ही सब प्रकारकी अस्त्रविद्यामें निपुण हुआ। पराक्रमी कर्ण प्रातःकालसे लेकर जबतक सूर्य पृष्ठभागकी ओर न चले जाते, सूर्योपस्थान करता रहता था ।। २५ ।।
तस्मिन् काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः ।
नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् किंचिद् वसु महीतले ।। २६ ।।
उस समय मन्त्र-जपमें लगे हुए बुद्धिमान-वीर कर्णके लिये इस पृथ्वीपर कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे सके ।। २६ ।।
(ततः काले तु कस्मिंश्चिचत् स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत् ।
आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम ।।
प्रभातायां रजन्यां त्वामागमिष्यति वासवः । न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति ।।
निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा।
अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मर्तासि वचनं मम ।।
किसी समयकी बात है, सूर्यदेवने ब्राह्मणका रूप धारण करके कर्णको स्वप्नमें दर्शन दिया और इस प्रकार कहा- 'वीर ! मेरी बात सुनो- आजकी रात बीत जानेपर सबेरा होते ही इन्द्र तुम्हारे पास आयेंगे। उस समय वे ब्राह्मण-वेषमें होंगे। यहाँ आकर इन्द्र यदि तुमसे भिक्षा माँगें तो उन्हें देना मत। उन्होंने तुम्हारे कवच और कुण्डलोंका अपहरण करनेका निश्चय किया है। अतः मैं तुम्हें सचेत किये देता हूँ। तुम मेरी बात याद रखना।'
कर्ण उवाच
शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज ।
कथं चास्मै न दास्यामि यथा चास्म्यवबोधितः ।। विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम् । तं देवदेवं जानन् वै न शक्नोम्यवमन्त्रणे ।।
कर्णने कहा- ब्रह्मन् ! इन्द्र यदि ब्राह्मणका रूप धारण करके सचमुच मुझसे याचना करेंगे, तो मैं आपकी चेतावनीके अनुसार कैसे उन्हें वह वस्तु नहीं दूँगा। ब्राह्मण तो सदा अपना प्रिय चाहनेवाले देवताओंके लिये भी पूजनीय हैं। देवाधिदेव इन्द्र ही ब्राह्मणरूपमें आये हैं, यह जान लेनेपर भी मैं उनकी अवहेलना नहीं कर सकूँगा।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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