युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️

PI💞HA
531 views
4 days ago
आज की कहानी :- *अनूठी दोस्ती* 💫💫💫💫💫 एक समय की बात है, किसी घने जंगल में ‘पिंगलक’ नाम का एक प्रतापी शेर राज करता था। उसका एक बहुत ही चतुर और समझदार सलाहकार था—‘संजीवक’ नाम का एक बैल। शेर और बैल की यह अनूठी दोस्ती देखकर जंगल के अन्य जानवर बहुत हैरान थे, लेकिन पिंगलक अपने मित्र संजीवक की बातों पर बहुत भरोसा करता था। ​उसी जंगल में ‘दमनक’ नाम का एक चालाक गीदड़ भी रहता था। दमनक को शेर और बैल की यह गहरी दोस्ती बिल्कुल पसंद नहीं थी, क्योंकि संजीवक के आने के बाद शेर ने दमनक को भाव देना बंद कर दिया था। दमनक ने ठान लिया कि वह किसी भी तरह इन दोनों के बीच फूट डालकर रहेगा। ​एक दिन दमनक चुपके से शेर पिंगलक के पास गया और चेहरे पर चिंता के भाव लाकर बोला, "महाराज! मुझे आपको चेतावनी देते हुए बहुत दुख हो रहा है। आपका मित्र संजीवक आपके खिलाफ षड्यंत्र रच रहा है। वह मन ही मन खुद को इस जंगल का राजा मानने लगा है और सोचता है कि एक दिन आपको मारकर पूरे जंगल पर कब्ज़ा कर लेगा।" ​शेर पहले तो इस बात पर विश्वास नहीं कर सका, लेकिन दमनक ने इतनी सफाई और बनावटी हमदर्दी से झूठ बोला कि पिंगलक के मन में संजीवक के प्रति शक का बीज बोया गया। ​इसके बाद दमनक तुरंत संजीवक बैल के पास पहुंचा। वहां जाकर उसने रोना-धोना शुरू किया और बोला, "मित्र संजीवक! भाग जाओ यहाँ से! महाराज पिंगलक तुमसे बहुत जलने लगे हैं। आज ही उन्होंने मुझसे कहा कि वे तुम्हारे मांस का स्वाद चखना चाहते हैं और जल्द ही तुम पर हमला करने वाले हैं।" ​सीधा-साधा संजीवक दमनक की बातों में आ गया। जब अगली बार संजीवक और पिंगलक आमने-सामने आए, तो दमनक की फैलाई गलतफहमियों के कारण दोनों एक-दूसरे को दुश्मन समझ बैठे। पिंगलक को लगा कि संजीवक हमला करने की नीयत से आ रहा है और संजीवक को लगा कि शेर उसे मारने आ रहा है। ​परिणामस्वरूप, दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अंत में शेर पिंगलक ने संजीवक का वध कर दिया। लेकिन अपने प्रिय मित्र की देह को देखकर शेर का दिल ग्लानि और दुख से भर गया। वहीं दूसरी ओर, चालाक दमनक अपनी चाल सफल होने पर मन ही मन मुस्कुरा रहा था और शेर का पुनः मुख्य सलाहकार बन गया। ​कहानी की सीख: किसी तीसरे व्यक्ति की बातों में आकर कभी भी अपने सच्चे मित्र या शुभचिंतक पर संदेह नहीं करना चाहिए। बिना सोचे-समझे कानों का कच्चा होना अपूरणीय क्षति का कारण बनता है। 🙏 जय गुरुदेव🙏 #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #गायत्री परिवार #गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख
PI💞HA
523 views
7 days ago
आज की कहानी:- *परखने का नजरिया* 📚📚📚📚📚📚 एक समय की बात है, एक प्रसिद्ध शिल्पकार अपने शिष्य के साथ घने जंगल के बीच से गुजर रहा था। रास्ते में शिल्पकार को एक बहुत ही अजीब, आधा टूटा हुआ और टेढ़ा-मेढ़ा पत्थर दिखाई दिया। वह पत्थर किसी काम का नहीं लग रहा था—न तो वह गोल था, न ही सीधा। ​शिष्य ने उस पत्थर को देखते ही ठोकर मारी और कहा, "यह पत्थर कितना व्यर्थ है! रास्ते में बेकार पड़ा है और लोगों के पैरों में लग रहा है।" ​शिल्पकार मुस्कुराया और रुका। उसने पत्थर को उठाकर ध्यान से देखा और अपनी झोली में रख लिया। शिष्य यह देखकर हैरान था कि उसके गुरुजी इस बदसूरत पत्थर का क्या करेंगे। ​अगले कुछ हफ्तों तक शिल्पकार अपनी कार्यशाला में अकेला काम करता रहा। वह सुबह से शाम तक उस पत्थर पर छेनी और हथौड़े की बारीक चोटें करता। आखिरकार एक दिन उसने शिष्य को अंदर बुलाया। ​जब शिष्य ने कमरे में प्रवेश किया, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। सामने एक अत्यंत अद्भुत और अनोखी मूर्ति रखी थी, जिसे देखकर मन में शांति का अहसास होता था। उस मूर्ति में एक ऐसी तरलता और लयबद्धता थी जो किसी सामान्य पत्थर से बनी मूर्तियों में नहीं होती। ​शिष्य ने चकित होकर पूछा, "गुरुदेव! आपने ऐसा चमत्कारिक पत्थर कहाँ से प्राप्त किया? मैंने आज तक ऐसी आकृति नहीं देखी!" ​शिल्पकार ने नम्रता से उत्तर दिया, "यह वही टेढ़ा-मेढ़ा पत्थर है जिसे तुमने रास्ते में व्यर्थ समझकर ठोकर मारी थी। इस पत्थर में खामी नहीं थी, बस इसकी बनावट बाकी पत्थरों से अलग थी। सामान्य आँखें इसमें केवल एक बेढंग पत्थर देख रही थीं, लेकिन मैंने इसके अंदर छिपी हुई अनोखी मूर्ति को देखा। मैंने केवल इसके फालतू हिस्सों को तराशकर अलग कर दिया, और जो इसकी असल सुंदरता थी, वह बाहर आ गई।" ​जीवन की सीख: हम अक्सर लोगों, परिस्थितियों या स्वयं को केवल इसलिए बेकार या कमजोर मान लेते हैं क्योंकि वे समाज के तय मानकों और सांचों में फिट नहीं बैठते। प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक अद्वितीय क्षमता और सुंदरता छिपी होती है। आवश्यकता बस इस बात की है कि हम किसी को परखने का नजरिया बदलें और धैर्यपूर्वक उसके भीतर की सर्वश्रेष्ठ संभावना को तराशें। 🙏 जय गुरुदेव🙏 #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #गायत्री परिवार #गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख
PI💞HA
526 views
10 days ago
आज की कहानी:- *सच्चा धन: ईमानदारी* 👌👌👌👌👌👌👌 ​एक गाँव में रामू नाम का एक छोटा सा बालक रहता था। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों से प्रभावित उसके माता-पिता ने उसे बचपन से ही उत्तम संस्कार दिए थे। ​एक दिन रामू अपने स्कूल से लौट रहा था। रास्ते में उसे एक पुराना चमड़े का बटुआ गिरा हुआ मिला। जब उसने बटुआ खोलकर देखा, तो उसमें कई सारे नोट और कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ थे। एक पल के लिए रामू के मन में विचार आया कि इन पैसों से वह अपने लिए खिलौने और नई किताबें खरीद सकता है। लेकिन तुरंत ही उसे अपने गुरुदेव और माता-पिता की सीख याद आ गई—"पराया धन मिट्टी के समान है और ईमानदारी ही मनुष्य का सच्चा धन है।" ​रामू ने बटुए में मिले एक कागज़ पर लिखे पते को पढ़ा और सीधे उस व्यक्ति के घर पहुँच गया। बटुए के मालिक एक वृद्ध सज्जन थे, जो अपना बटुआ खो जाने से बेहद दुखी और परेशान थे। जब रामू ने उनका मुस्कुराते हुए बटुआ लौटाया, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने बटुए की जाँच की तो एक-एक पैसा और सारा सामान सुरक्षित था। ​सज्जन ने रामू की ईमानदारी से खुश होकर उसे इनाम के रूप में कुछ पैसे देने चाहे, लेकिन रामू ने नम्रता से हाथ जोड़कर मना कर दिया और कहा, "काकाजी, यह तो मेरा कर्तव्य था। दूसरों की मदद करना और ईमानदारी से रहना ही मुझे सिखाया गया है।" ​उन सज्जन ने रामू के सिर पर हाथ रखकर बहुत आशीर्वाद दिया और अगले दिन उसके स्कूल जाकर प्रधानाचार्य के सामने उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की। रामू को पूरी चेतना सभा में उसकी निष्ठा और अच्छे संस्कारों के लिए पुरस्कृत किया गया। ​कहानी की सीख: सामयिक लाभ के लिए अपनी ईमानदारी और संस्कारों से समझौता नहीं करना चाहिए। ईमानदारी से मिला संतोष और सम्मान दुनिया के किसी भी भौतिक धन से कहीं अधिक बड़ा होता है। 🙏 जय गुरुदेव🙏 #🙏प्रातः वंदन #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #गायत्री परिवार #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र
PI💞HA
546 views
1 months ago
आज की कहानी:- यहाँ जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सिखाती हुई एक सुंदर और विचारणीय कहानी प्रस्तुत है: *​अनुभव का अदृश्य तराज़ू* 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 ​बहुत समय पहले की बात है, एक दूर-दराज़ के राज्य में सोमदेव नाम का एक युवा चित्रकार रहता था। वह अपनी कला में बेहद निपुण था। उसकी बनाई तस्वीरें इतनी सजीव लगती थीं कि देखने वाला दंग रह जाए। लेकिन सोमदेव के भीतर एक बड़ी कमी थी—उसमें धैर्य का अभाव था और वह हमेशा अपनी कला का श्रेय केवल अपनी उंगलियों की सफाई और अपनी प्रतिभा को ही देता था। ​एक दिन, राज्य के राजा ने घोषणा की कि जो भी कलाकार दरबार की मुख्य दीवार पर ऐसी पेंटिंग बनाएगा जो देखने वाले के मन को परम शांति दे सके, उसे राज्य का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार दिया जाएगा। ​सोमदेव ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। उसने तीन महीनों तक बिना सोए, बिना आराम किए दिन-रात मेहनत की। उसने पहाड़ों, नदियों, उड़ते पक्षियों और ढलते सूरज का एक ऐसा अद्भुत दृश्य उकेरा कि राजा सहित पूरा दरबार उसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहा था। ​वृद्ध शिल्पी की चुनौती ​तभी दरबार में वृद्ध शिल्पी रामनाथ आए, जो वर्षों से पत्थरों को तराशकर मूर्तियाँ बनाते थे। उन्होंने पेंटिंग को ध्यान से देखा और मुस्कुराते हुए राजा से कहा: ​"महाराज, चित्रकार की उंगलियों में जादू है। दृश्य सुंदर है, लेकिन इसमें 'प्राण' नहीं हैं। यह आँख को तो भाता है, लेकिन आत्मा को स्पर्श नहीं करता।" ​यह सुनकर सोमदेव का अहंकार आहत हो गया। उसने गुस्से में कहा, "वृद्ध महाशय! आपने जीवन भर सिर्फ़ कठोर पत्थरों को तोड़ा है। आप रंगों की कोमलता और मेरी महीनों की मेहनत का मोल क्या जानें?" ​राजा ने स्थिति को संभालते हुए कहा, "यदि ऐसा है, तो हम एक परीक्षा लेते हैं। सोमदेव, तुम और रामनाथ जी, दोनों को दो हफ़्ते का समय दिया जाता है। सोमदेव अपनी इस पेंटिंग को और बेहतर बनाएँ, और रामनाथ जी इस दीवार के ठीक सामने वाली दीवार पर अपनी कला का प्रदर्शन करें। दो हफ़्ते बाद फ़ैसला होगा।" ​दो अलग-अलग दिशाएँ ​अगले ही दिन से काम शुरू हुआ: ​सोमदेव का तरीका: उसने तुरंत नए और महंगे रंग मँगवाए। वह दिन-रात पेंटिंग में और बारीकियाँ जोड़ने लगा—कही सुनहरी किरणें, तो कहीं पानी की बूँदें। वह रंगों से उस चित्र को भर देने में जुट गया। ​रामनाथ जी का तरीका: दूसरी तरफ़, वृद्ध रामनाथ ने कोई रंग या ब्रश नहीं उठाया। उन्होंने बस एक सूती कपड़ा, कुछ पानी और पॉलिश करने का पत्थर लिया। वे दिन भर सामने वाली पुरानी, धूल-भरी और खुरदरी दीवार को घिसकर साफ़ करते रहते। ​सोमदेव मन ही मन उनका मज़ाक उड़ाता कि "ये बूढ़ा आदमी सिर्फ़ दीवार साफ़ कर रहा है, यह भला क्या कला दिखाएगा?" ​निर्णय का दिन ​दो सप्ताह पूरे हुए। राजा और पूरा दरबार निर्णय के लिए उपस्थित हुआ। ​पर्दा सबसे पहले सोमदेव की पेंटिंग से हटाया गया। चित्र वाकई पहले से कहीं अधिक भव्य और चमकदार लग रहा था। सबने उसकी प्रतिभा की जमकर प्रशंसा की। ​इसके बाद, राजा रामनाथ जी की दीवार की ओर मुड़े। वहाँ कोई चित्र नहीं बना था। लेकिन जैसे ही रामनाथ जी ने उस दीवार पर पड़ा पर्दा हटाया, पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। ​सामने वाली दीवार इतनी साफ़, समतल और शीशे की तरह पारदर्शी हो चुकी थी कि उसमें सोमदेव की पेंटिंग का प्रतिबिंब (Reflection) दिखाई दे रहा था। लेकिन वह केवल एक साधारण प्रतिबिंब नहीं था। ​दीवार की गहराई और उसकी असीम स्वच्छता के कारण, उसमें दिख रही पेंटिंग के रंग और भी गहरे, जीवंत और शांत महसूस हो रहे थे। ​सोमदेव के चित्र की हर एक छोटी सी कमी दूर हो चुकी थी और उसमें ढलते सूरज की रोशनी ऐसी लग रही थी मानो सचमुच सामने कोई दिव्य सवेरा हो रहा हो। ​दृश्य इतना अलौकिक था कि देखने वालों का मन स्वतः ही शांत और आनंदित हो गया। ​कहानी की सीख ​सोमदेव का सिर शर्म से झुक गया। उसने वृद्ध शिल्पी के पैर छू लिए और पूछा, "मैंने दिन-रात रंग भरे, लेकिन आपने बिना कोई रंग छुए मेरे चित्र को मुझसे भी अधिक सुंदर कैसे बना दिया?" ​रामनाथ जी ने मुस्कुराकर कहा: ​"बेटा, तुमने केवल बाहर रंग बिखेरे, जबकि मैंने सामने के दर्पण को साफ़ किया। हमारा मन भी इस दीवार की तरह है। जब तक मन में अहंकार, जल्दबाज़ी और घमंड की धूल जमी रहती है, तब तक ज्ञान के रंग भी धुंधले दिखते हैं। लेकिन जब मन साफ़ और शांत हो जाता है, तो वह सृष्टि की हर सुंदरता को उसके वास्तविक और दिव्य रूप में दर्शाने लगता है।" ​ज्ञान: जीवन में केवल अपनी कुशलताओं और ज्ञान को इकट्ठा करना (रंग भरना) ही सब कुछ नहीं है; अपने मन और विचारों को साफ़ (निर्मल) रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। एक निर्मल मन ही जीवन के सच्चे सौंदर्य को प्रतिबिंबित कर सकता है। 🙏 जय गुरुदेव🙏 #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #गायत्री परिवार #🙏प्रातः वंदन