PI💞HA
आज की कहानी:-
यहाँ जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सिखाती हुई एक सुंदर और विचारणीय कहानी प्रस्तुत है:
*अनुभव का अदृश्य तराज़ू*
🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷
बहुत समय पहले की बात है, एक दूर-दराज़ के राज्य में सोमदेव नाम का एक युवा चित्रकार रहता था। वह अपनी कला में बेहद निपुण था। उसकी बनाई तस्वीरें इतनी सजीव लगती थीं कि देखने वाला दंग रह जाए। लेकिन सोमदेव के भीतर एक बड़ी कमी थी—उसमें धैर्य का अभाव था और वह हमेशा अपनी कला का श्रेय केवल अपनी उंगलियों की सफाई और अपनी प्रतिभा को ही देता था।
एक दिन, राज्य के राजा ने घोषणा की कि जो भी कलाकार दरबार की मुख्य दीवार पर ऐसी पेंटिंग बनाएगा जो देखने वाले के मन को परम शांति दे सके, उसे राज्य का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार दिया जाएगा।
सोमदेव ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। उसने तीन महीनों तक बिना सोए, बिना आराम किए दिन-रात मेहनत की। उसने पहाड़ों, नदियों, उड़ते पक्षियों और ढलते सूरज का एक ऐसा अद्भुत दृश्य उकेरा कि राजा सहित पूरा दरबार उसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहा था।
वृद्ध शिल्पी की चुनौती
तभी दरबार में वृद्ध शिल्पी रामनाथ आए, जो वर्षों से पत्थरों को तराशकर मूर्तियाँ बनाते थे। उन्होंने पेंटिंग को ध्यान से देखा और मुस्कुराते हुए राजा से कहा:
"महाराज, चित्रकार की उंगलियों में जादू है। दृश्य सुंदर है, लेकिन इसमें 'प्राण' नहीं हैं। यह आँख को तो भाता है, लेकिन आत्मा को स्पर्श नहीं करता।"
यह सुनकर सोमदेव का अहंकार आहत हो गया। उसने गुस्से में कहा, "वृद्ध महाशय! आपने जीवन भर सिर्फ़ कठोर पत्थरों को तोड़ा है। आप रंगों की कोमलता और मेरी महीनों की मेहनत का मोल क्या जानें?"
राजा ने स्थिति को संभालते हुए कहा, "यदि ऐसा है, तो हम एक परीक्षा लेते हैं। सोमदेव, तुम और रामनाथ जी, दोनों को दो हफ़्ते का समय दिया जाता है। सोमदेव अपनी इस पेंटिंग को और बेहतर बनाएँ, और रामनाथ जी इस दीवार के ठीक सामने वाली दीवार पर अपनी कला का प्रदर्शन करें। दो हफ़्ते बाद फ़ैसला होगा।"
दो अलग-अलग दिशाएँ
अगले ही दिन से काम शुरू हुआ:
सोमदेव का तरीका: उसने तुरंत नए और महंगे रंग मँगवाए। वह दिन-रात पेंटिंग में और बारीकियाँ जोड़ने लगा—कही सुनहरी किरणें, तो कहीं पानी की बूँदें। वह रंगों से उस चित्र को भर देने में जुट गया।
रामनाथ जी का तरीका: दूसरी तरफ़, वृद्ध रामनाथ ने कोई रंग या ब्रश नहीं उठाया। उन्होंने बस एक सूती कपड़ा, कुछ पानी और पॉलिश करने का पत्थर लिया। वे दिन भर सामने वाली पुरानी, धूल-भरी और खुरदरी दीवार को घिसकर साफ़ करते रहते।
सोमदेव मन ही मन उनका मज़ाक उड़ाता कि "ये बूढ़ा आदमी सिर्फ़ दीवार साफ़ कर रहा है, यह भला क्या कला दिखाएगा?"
निर्णय का दिन
दो सप्ताह पूरे हुए। राजा और पूरा दरबार निर्णय के लिए उपस्थित हुआ।
पर्दा सबसे पहले सोमदेव की पेंटिंग से हटाया गया। चित्र वाकई पहले से कहीं अधिक भव्य और चमकदार लग रहा था। सबने उसकी प्रतिभा की जमकर प्रशंसा की।
इसके बाद, राजा रामनाथ जी की दीवार की ओर मुड़े। वहाँ कोई चित्र नहीं बना था। लेकिन जैसे ही रामनाथ जी ने उस दीवार पर पड़ा पर्दा हटाया, पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
सामने वाली दीवार इतनी साफ़, समतल और शीशे की तरह पारदर्शी हो चुकी थी कि उसमें सोमदेव की पेंटिंग का प्रतिबिंब (Reflection) दिखाई दे रहा था। लेकिन वह केवल एक साधारण प्रतिबिंब नहीं था।
दीवार की गहराई और उसकी असीम स्वच्छता के कारण, उसमें दिख रही पेंटिंग के रंग और भी गहरे, जीवंत और शांत महसूस हो रहे थे।
सोमदेव के चित्र की हर एक छोटी सी कमी दूर हो चुकी थी और उसमें ढलते सूरज की रोशनी ऐसी लग रही थी मानो सचमुच सामने कोई दिव्य सवेरा हो रहा हो।
दृश्य इतना अलौकिक था कि देखने वालों का मन स्वतः ही शांत और आनंदित हो गया।
कहानी की सीख
सोमदेव का सिर शर्म से झुक गया। उसने वृद्ध शिल्पी के पैर छू लिए और पूछा, "मैंने दिन-रात रंग भरे, लेकिन आपने बिना कोई रंग छुए मेरे चित्र को मुझसे भी अधिक सुंदर कैसे बना दिया?"
रामनाथ जी ने मुस्कुराकर कहा:
"बेटा, तुमने केवल बाहर रंग बिखेरे, जबकि मैंने सामने के दर्पण को साफ़ किया। हमारा मन भी इस दीवार की तरह है। जब तक मन में अहंकार, जल्दबाज़ी और घमंड की धूल जमी रहती है, तब तक ज्ञान के रंग भी धुंधले दिखते हैं। लेकिन जब मन साफ़ और शांत हो जाता है, तो वह सृष्टि की हर सुंदरता को उसके वास्तविक और दिव्य रूप में दर्शाने लगता है।"
ज्ञान: जीवन में केवल अपनी कुशलताओं और ज्ञान को इकट्ठा करना (रंग भरना) ही सब कुछ नहीं है; अपने मन और विचारों को साफ़ (निर्मल) रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। एक निर्मल मन ही जीवन के सच्चे सौंदर्य को प्रतिबिंबित कर सकता है।
🙏 जय गुरुदेव🙏 #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #गायत्री परिवार #🙏प्रातः वंदन