श्रीमद्भागवत

sn vyas
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5 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३२/२-३ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 आप कभी ज्ञान लेने गए हैं ? गतांक से आगे इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिए शुद्ध वैराग्य संपन्न अंतः करण चाहिए और ऐसा ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरंतर पुरुषार्थ करके मोक्ष प्राप्त करना ही कर्म के नियम का उद्देश्य है । *मृत्यु की कगार पर बैठे परीक्षित जी ने शुकदेव जी से सात दिन तक श्रीमद्भागवत का ज्ञान लेकर मोक्ष प्राप्त किया । श्रीमद्भागवत में ऐसी शक्ति है कि आज भी वह सात दिन में जीव को मोक्ष की प्राप्ति करवा सकता है । किंतु उसे सुनाने वाला शुकदेव जी जैसा ज्ञानी होना चाहिए और उसे सुनने वाला परीक्षित जैसा वैराग्य वान होना चाहिए।* *हम लोग कई बार भागवत सप्ताह में गए हैं और भगवत भी सुनी है , किन्तु आज तक मुझे या आपको मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ , या नहीं होता है। इसका कारण या तो भागवत सुनाने वाला बुद्धू है या सुनने वाला बुद्धू है ।* *आजकल तो भागवत सुनाने वाले अधिकांश शुकदेव जी पाच सौ या हजार रुपए का कॉन्ट्रैक्ट लेकर व्यास पीठ पर बैठे होते हैं , और पूरे दिन भागवत पढ़ते हुए भी उनका मन तो कितने केले आए , कितने नारियल आए , कितने रुपए चढ़ाए गए और उनके लिए कितनी धोती या कपड़े आए ,, इसी में लगा रहता है। ऐसी तो आजकल के शुकदेव जी की दशा है । जबकि परीक्षित जी ( जिसने भागवत कथा का आयोजन किया है उसकी ) दशा उनसे भी बुरी होती है ।* *आधुनिक परीक्षित (आयोजक ) तो आसन लगाकर कथा सुनने के लिए बैठ ही नहीं सकते हैं । वह बेचारे घबराए हुए कितने समधी आए ,, कितनी समधिने आई , कितनी बेटियां हैं ,, कितने दमाद रूठे- मनाए और भोजन में कितना बेसन इस्तेमाल हुआ ,, कितने डिब्बे तेल इस्तेमाल हुआ , और अभी भी ब्राह्मणों को कितनी दक्षिणा देनी पडेगी ,, इसी की चिंता में सात दिन में थक कर चकनाचूर हो जाते हैं।* *आजकल जहां शुकदेव जी (कथाकार) और परीक्षित जी ( आयोजक) की ऐसी दशा है , वहा भला श्रीमद् भागवत कथा किसी को मोक्ष कैसे दिलाएगी , आप ही सोचिए। वरना श्रीमद्भागवत पुराण में तो आज भी इतनी शक्ति है कि वह परीक्षित जैसे जीवो को ही नहीं ,,, अपितु धुंधकारी जैसे भूत प्रेत पिशाच को भी मोक्ष दिला सकता है ।* *ज्ञान प्राप्त होना और उससे सभी संचित कर्मों को भस्मसात् करना , कोई आसान काम नहीं है । इसके लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है।* क्रमश: और कल नए भाग के साथ ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
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10 days ago
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 🌴#भाग_३०/३ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 संचित कर्मों से कैसे मुक्त हो सकते हैं ? 🦚 गतांक से आगे कर्म योग से क्रियमाण कर्मों पर काबू पाया जा सकता है। और भक्ति योग से प्रारब्ध कर्मों को पूर्ण रूप से भोग सकते हैं। इसी तरह ज्ञान योग से अनेक जन्मों के संचित कर्मों को भस्म सात् कर सकते हैं और ऐसा करके कर्म योग ,, भक्ति योग,, ज्ञान योग से जीव मात्र सभी क्रियमाण,, प्रारब्ध और संचित कर्मों से मुक्त होकर इसी जीवन काल के अंत में मोक्ष प्राप्त कर सकता है । संचित कर्मों को ज्ञानाग्नि से जला कर भस्म किया जा सकता है। *भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है कि-----* *यथैधांसि समिद्धोग्नि: भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।* *ज्ञानाग्नि: सर्व कर्माणि भस्मसात कुरुते तथा ॥* *(गीता 4--37 )* *जिस तरह अग्नि में पतली-- मोटी , गीली और सूखी , लंबी और छोटी , हर प्रकार की लकड़ी जल जाती है , उसी तरह ज्ञानाग्नि में डाले गए सभी प्रकार के शुभ अशुभ क्रियमाण,, प्रारब्ध और संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं, तथा जीव को मोक्ष प्राप्त हो जाता है ,, अर्थात जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।* क्रमश कल नया भाग पढ़ेंगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
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21 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/६ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚 🔥 (बुद्धि कर्मानुसारिणी)🔥 *न निर्मित: केन न दृष्टपूर्वं* *न श्रूयते हेम मय कुरंग:।* *तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *सोने का मृग ब्रह्मा की सृष्टि में किसी जगह निर्माण हुआ, किसी ने देखा भी नहीं और सुना भी नहीं । फिर भी उस में भगवान राम को तृष्णा जगी,,, इसलिए कि मारीच रावण और तमाम राक्षसों के विनाश के लिए भगवान राम को ऐसी बुद्धि सूझी।* *केवो हतो रावण तत्व बेत्ता* *नवे ग्रहों निकट मां रहेता।* *हरी सीता कष्ट लह्युं कुबुद्धि* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *(अर्थात् ) -- कैसा था रावण तत्व बेत्ता,, नौ ग्रह उसके निकट रहते थे ,,, सीता का हरण करके कुबुद्धि से कष्ट मोल ले लिया ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि ।* *रावण महान ज्ञानी था ,, तमाम वेदों में वह पारंगत था,, भगवान शंकर का परम भक्त था ,, पुलस्त्य कुल का पवित्र ब्राह्मण था ,, महा शक्तिशाली था,, नौ ग्रह उसकी सेवा में रहते थे । वायु देवता उसके महल में झाड़ू लगाते थे । वरुण देवता उसके महल में पानी भरते थे । ऐसा ज्ञानी और शक्तिशाली राजा होने पर भी उसकी बुद्धि विपरीत हो गई । प्रारब्ध वश होकर उसकी बुद्धि सीता के हरण में नियुक्त हुई ।* *कैसे थे कौरव काल ज्ञानी,, द्वेष के साथ क्रोध से ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि। कौरव मूर्ख नहीं थे ,, गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य थे ,,, युधिष्ठिर-- अर्जुन के साथ पढ़ते थे ,,, धर्म माने क्या ? और अधर्म माने क्या ? उसकी उनको अक्ल थी ,,, खुद दुर्योधन ने महाभारत में कबूल किया है कि ---* *जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:* *जानामि अधर्मंम् न च मे निवृत्ति:।* *केनापि देवेन ह्यदि स्थितेन* *यथा नियुक्तो अस्मि तथा करोमि॥* *धर्म और अधर्म का ज्ञान होने पर भी अंतःकरण में पड़ी हुई कामना और वासना प्रारब्ध भोगने के लिए बुद्धि को उल्टी विपरीत घुमा देती है।* क्रमश: आगे अब सातवां भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙
sn vyas
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27 days ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ 🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 🌺 भाग 1️⃣9️⃣ 🌺 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰कौन से क्रियमाण कर्म संचित में जमा होते नहीं ?🥰 *निम्नलिखित कर्म संचित में जमा होते नहीं-* *(1) अज्ञान अवस्था में किए हुए कर्म।* *(2)अभान अवस्था में किए हुए कर्म ।* *(3)मनुष्य के अलावा योनि में किए हुए कर्म ।* *(4)कर्तापन के अभिमान रहित किए हुए कर्म।* *(5) समष्टि के कल्याण के किए हुए कर्म ।* *(6)निष्काम कर्म।* क्रमश ✍🏽
sn vyas
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1 months ago
# श्रीमद्भागवत - महापुराण अक्रूर जी को यमुना में भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने अक्रूर जी को श्रीकृष्ण और बलराम को वृंदावन से मथुरा लाने के लिए भेजा, तब अक्रूर जी के मन में एक ओर दायित्व था, तो दूसरी ओर प्रभु के दर्शन का अनुपम उत्साह। वे जानते थे कि यह यात्रा उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य बनने वाली है। यात्रा करते-करते जब वे पवित्र यमुना तट पर पहुँचे, तो उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्नान करने का संकल्प लिया। जैसे ही वे यमुना के निर्मल जल में डुबकी लगाकर ध्यानमग्न हुए और नेत्र खोले, उनके सामने ऐसा दिव्य दृश्य प्रकट हुआ जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था। उन्होंने देखा कि स्वयं श्रीहरि विष्णु अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर विराजमान हैं। माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही हैं। चारों ओर वैकुंठ धाम का अलौकिक प्रकाश फैला हुआ था। देवता, ऋषि, सिद्ध और गंधर्व प्रभु की स्तुति में लीन थे। अक्रूर जी ने अनुभव किया कि समस्त ब्रह्मांड, सभी लोक और सम्पूर्ण सृष्टि उसी एक परम दिव्य सत्ता में समाहित है। जब वे यमुना से बाहर आए, तो आश्चर्यचकित रह गए। श्रीकृष्ण और बलराम पहले की भाँति रथ के पास मुस्कुराते हुए खड़े थे। उन्हें लगा मानो अभी जो देखा वह स्वप्न था। सत्य जानने के लिए वे पुनः यमुना में उतरे। इस बार भी वही दिव्य वैकुंठ, वही श्रीहरि का विराट स्वरूप और वही अलौकिक दर्शन उनके सामने प्रकट हो गए। अब अक्रूर जी का सारा संशय मिट चुका था। उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि वृंदावन के नंदलाल कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म, जगत के पालनकर्ता और समस्त लोकों के स्वामी हैं। प्रेम, श्रद्धा और भक्ति से उनका हृदय भर उठा। उनकी आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान को बार-बार प्रणाम किया और उनकी महिमा का गुणगान किया। उस एक दिव्य दर्शन ने अक्रूर जी के जीवन को सदा के लिए प्रभु-भक्ति में समर्पित कर दिया। ✨ इस दिव्य लीला से शिक्षा: जब मन निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और सच्ची भक्ति के साथ भगवान की शरण में जाता है, तब प्रभु स्वयं अपने दिव्य स्वरूप का अनुभव कराते हैं। जिनका हृदय निर्मल और समर्पित होता है, वे हर कण में परमात्मा की अनंत महिमा का दर्शन कर सकते हैं।
sn vyas
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1 months ago
# श्रीमद्भागवत - महापुराण द्रोपदी चीरहरण "यदि कृष्ण सर्वशक्तिमान थे, तो उन्होंने द्रौपदी का चीरहरण होने ही क्यों दिया?" यह प्रश्न पूछने से पहले एक और प्रश्न पूछो यदि कृष्ण सर्वशक्तिमान थे, तो उन्होंने दुर्योधन को पैदा ही क्यों होने दिया? यदि ईश्वर हर अन्याय को पहले ही रोक दे, तो मनुष्य की स्वतंत्रता कहाँ बचेगी? यदि हर अपराध होने से पहले ईश्वर हस्तक्षेप कर दे, तो कर्म का सिद्धांत समाप्त हो जाएगा। वेदांत कहता है— परमात्मा कठपुतली का मालिक नहीं है। वह तुम्हें चेतना देता है, लेकिन चुनाव तुम्हारा होता है। दुर्योधन को भी वही चेतना मिली थी जो अर्जुन को मिली थी। लेकिन एक ने उसे अहंकार में बदल दिया, दूसरे ने उसे जागरण में। यही जीवन का रहस्य है। कुछ लोग कहते हैं— "कृष्ण ने द्रौपदी को पहले क्यों नहीं बचाया?" द्रौपदी का अपमान केवल दुःशासन ने नहीं किया था। उस दिन पूरी सभा ने किया था। भीष्म का मौन, द्रोण की चुप्पी, धृतराष्ट्र की अंधता, विदुर की विवशता— सब मिलकर चीरहरण कर रहे थे। दुःशासन तो केवल हाथ था। अपराधी पूरी व्यवस्था थी। जब समाज अन्याय के सामने मौन हो जाता है, तब ईश्वर नहीं मरता, मनुष्य की चेतना मर जाती है। कृष्ण उस दिन सभा में उपस्थित नहीं थे, लेकिन उनका प्रश्न आज भी उपस्थित है— जब द्रौपदी का अपमान हो रहा था, तब भीष्म क्यों मौन थे? क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा पाप अन्याय करना नहीं है। सबसे बड़ा पाप है— अन्याय को होते हुए देखकर भी चुप रह जाना। वेदांत कहता है— परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है। और स्वतंत्रता के साथ भूल करने की संभावना भी आती है। दुर्योधन उसी संभावना का परिणाम था। लेकिन द्रौपदी भी उसी संभावना का परिणाम थी। जब तक द्रौपदी अपने बल, अपने पतियों, अपने गुरुओं, अपनी सभा पर भरोसा करती रही, सहायता नहीं आई। कथा का प्रतीकात्मक अर्थ यह है— जब सारे सहारे टूट जाते हैं, तब मनुष्य पहली बार अस्तित्व के सामने पूर्ण समर्पण में खड़ा होता है। और उसी क्षण भीतर का कृष्ण प्रकट होता है। ध्यान रहे— कृष्ण ने चीरहरण नहीं होने दिया। कृष्ण ने पूरी मानवता को दिखाया कि जहाँ सत्ता मौन हो जाए, जहाँ ज्ञान मौन हो जाए, जहाँ धर्माचार्य मौन हो जाएँ, वहाँ धर्म का पतन शुरू हो चुका है। द्रौपदी का चीरहरण एक स्त्री का अपमान नहीं था। वह पूरी सभ्यता की परीक्षा थी। और उस परीक्षा में केवल दुःशासन नहीं हारा था। भीष्म भी हारे थे। द्रोण भी हारे थे।l धृतराष्ट्र भी हारे थे। पूरी व्यवस्था हार गई थी। इसलिए कृष्ण की दृष्टि में प्रश्न यह नहीं है “द्रौपदी को किसने बचाया?" प्रश्न यह है— जब द्रौपदी पुकार रही थी, तब इतने महान लोग मौन क्यों थे? क्योंकि अधर्म की वास्तविक शक्ति उसके हाथों में नहीं होती। अधर्म की असली शक्ति सज्जनों की चुप्पी में होती है।यह उत्तर गीता, वेदांत में है जहाँ ईश्वर को कोई हस्तक्षेप करने वाला जादूगर नहीं, बल्कि चेतना, स्वतंत्रता और कर्म के नियमों का आधार माना जाता है। इस दृष्टि से द्रौपदी का प्रसंग "चमत्कार" से ज्यादा "मौन समाज की विफलता" का प्रतीक बन जाता है। 🔥⚔️🔥जय श्री राम🔥⚔️🔥