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#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - दैवीं ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया| मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। यह अलौकिक अर्थात्ू अति क्योंकि ಇತ್ತಾ त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; 6 पुरुष केवल ही निरन्तर भजते हैँ, मुझको मायाको उल्लंघन कर जाते हैँ अर्थात् संसारसे तर जाते हैं Il १४Il दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः न मां ^ সানসাপ্সিনা: Il आसुरं माययापहृतज्ञाना چ٨ मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है आसुर-स्वभावको धारण किये हुए मनुष्योंमें नीच  कर्म करनेवाले 767 ఖెగే II 84 Il मूढ़लोग मुझको चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन। आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।  हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी१, आर्त२, जिज्ञासुरै और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मूझको भजते हैँ II १६ Il १० सांसारिक पदार्थोंके लिये भजनेवाला| २. संकट-निवारणके लिये भजनेवाला | ३. मेरेको यथार्थरूपसे जाननेको इच्छासे भजनेवाला श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা दैवीं ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया| मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। यह अलौकिक अर्थात्ू अति क्योंकि ಇತ್ತಾ त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; 6 पुरुष केवल ही निरन्तर भजते हैँ, मुझको मायाको उल्लंघन कर जाते हैँ अर्थात् संसारसे तर जाते हैं Il १४Il दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः न मां ^ সানসাপ্সিনা: Il आसुरं माययापहृतज्ञाना چ٨ मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है आसुर-स्वभावको धारण किये हुए मनुष्योंमें नीच  कर्म करनेवाले 767 ఖెగే II 84 Il मूढ़लोग मुझको चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन। आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।  हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी१, आर्त२, जिज्ञासुरै और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मूझको भजते हैँ II १६ Il १० सांसारिक पदार्थोंके लिये भजनेवाला| २. संकट-निवारणके लिये भजनेवाला | ३. मेरेको यथार्थरूपसे जाननेको इच्छासे भजनेवाला श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat