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#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat