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सुशील मेहता - Author on ShareChat
सुशील मेहता
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गज़ल #✒ शायरी
छुपा छुपा ही सही, बे-क़रार है कि नहीं ? नज़र उठा के बता, तुझे इक़रार है कि नहीं ? मिटा दिया है ख़ुदी को, तिरी मोहब्बत में, अब इस के बाद भी, कुछ इख़्तियार है कि नहीं ? तमाम उम्र कटी है, ख़िज़ाँ के साये में, वीरान सी फ़ज़ा में, बहार है कि नहीं ? फ़क़ीर बन के ख़ड़ा हूँ , मैं तेरे रस्ते में, तिरि गली में मिरा भी॰ शुमार है कि नहीं ? ಔ घडी का सितम, अब सहा नहीं जाता , नसीब में, कोई क़रार है कि नहीं ? की राह में तन्हा, जो छोड़ते हो मुझे, 3 जफ़ाओं पे अपनी , ग़ुबार है कि नहीं ? भटक रहा है जो ' शाहिद , फ़िराक़ की शब में, उसे नसीब कोई, ग़म-गुसार है कि नहीं ?
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