sn vyas
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#श्रीमानसजी_में_भेदभक्ति07
🎄भाग -७ (अन्तिम)🎄
🪷श्रीकाकभुशुण्डि जी🪷
"ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर ॥" (७/७८ख/२)
श्रीकाकभुशुण्डि जी नीलशैल (उत्तर दिशा)- से अयोध्या में श्रीरामावतार की बाललीला के समय आकर काकरूप से ही प्रभु का जूँठन-प्रसाद आँगन में लेते हुए कृतार्थ हो रहे थे, उसी समय साधारण बालकों की भाँति श्रीसरकार की माधुर्य-लीला देखकर उन्हें जो मोह हुआ और जिस प्रकार श्रीरघुनाथजी की प्रेरणा से विद्या-माया का संचार होकर उनकी सगुण उपासना (भेदभक्ति) प्रौढ़ हुई, *उसी प्रसंग में यह भेदभक्ति शब्द तीसरी बार आया है।* यह तो ग्रन्थ में ही प्रमाण है कि श्रीकाकजी की अविद्या-माया प्रथम से ही निवृत्त थी । *'ब्यापइ तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत'।* जीव के लिये अविद्या-माया ही दुःखद है *'जा बस जीव परा भवकूपा'* जिसका स्वरूप *'मैं अरु मोर तोर तैं (माया)'* है; विद्या-माया दुःखद नहीं है। इसका स्वरूप *'गो गोचर जहँ लगि मन जाई'* के साथ ही - *एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥* - बतलाया गया है। यही कारण था कि भुशुण्डिजी को यह दुःखद नहीं प्रतीत हुई। *'सो माया न दुखद मोहि काहीं'* दूसरे जीवों की भाँति संसार बढ़ानेवाली न होकर वह विद्या-माया प्रभु की प्रेरणा से भेदभक्ति को बढ़ानेवाली थी *'आन जीव इव संसृति नाहीं'* तथा यह भी सिद्धान्त आगे निश्चित किया गया है कि - *हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥* अर्थात् भगवत्-सेवकों को अविद्या-माया (मैं, मोर, तैं, तोर) व्यापती ही नहीं, उन्हें जब कभी उनके प्रेम की बाधा का कोई संयोग भक्त-रक्षक भगवान् देखते हैं, तो उनके हितार्थ अपनी विद्या-माया को प्रेरित करके सब प्रकार की कोर-कसर दूर कर शुद्ध प्रेमस्वरूपा श्रीभेदभक्ति (निज-सेवा) - को दृढ़ कर देते हैं। अतएव *'तातें नास न होइ दास कर'* इसीसे भक्तों का कदापि पतन नहीं होता। *'कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥'* (श्रीगीताजी ९/३१) उनकी सगुण उपासना (भेदभक्ति) - की सदा वृद्धि होती जाती है। इस प्रसंग में भी भेदभक्ति की महिमा -
*रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।*
*ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥*
- आदिद्वारा ज्ञान की अपेक्षा स्पष्टरूप से ऊँची बतलायी गयी है। दूसरे दोहे में भी *'राकापति षोडस'* से षोडशों प्रकार की उपासना, तारागणसमुदाय से नाना प्रकार के कर्म एवं *'सकल गिरिन्ह दव लाइअ'* से ज्ञानाग्नि को उपमेय बनाकर, कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों से मायारूपी रात्रि की निवृत्ति न होकर श्रीसरकार की भेदभक्ति (हरि-भजन) - को ही रवि का दर्जा देकर जीव के क्लेश की आत्यन्ति की निवृत्ति बतलायी गयी है। क्योंकि यद्यपि मायाकृत नानात्व भेद 'मुधा' (मृषा) है, परन्तु *'बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया'* सिद्धान्त कर रहे हैं। इस वाक्य में भी उसी भगवद्भक्ति की ही उत्कृष्टताका लक्ष्य है। *'ग्यान अखंड एक सीताबर'* इत्यादि प्रसंग से यह सूचित कर रहे हैं कि सगुण उपासकों की अपूर्णता भी भेदभक्ति के ही नाते श्रीसरकार से विद्या-माया के द्वारा पूर्ण की जाती है। उन्हें कदापि पतन का भय नहीं। इस प्रकार श्रीभेदभक्ति में *'साधन सिद्धि राम पद नेहू'* का ही स्वरूप लक्षित है। अर्थात् श्रीअवताररूप सगुण विग्रह की उपासना साधन भेदभक्ति है एवं श्रीअवतारीरूप नित्य सगुण विग्रह की नित्य सेवा (उपासना) सिद्धरूपा भेदभक्ति है जो चारों मुक्तियों से भी उच्च श्रेणी की स्थिति है।
*🙏🏻जय जय सियाराम🙏🏻*
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