sn vyas
496 views 1 days ago
#श्री कृष्ण जन्माष्टमी# #कृष्ण जन्माष्टमी पृथ्वी पर हर वर्ष करोड़ों भक्त जन्माष्टमी का पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाते हैं। मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में झांकियां सजती हैं और आधी रात होते ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव शुरू हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात में ही क्यों हुआ? आखिर ऐसा क्या रहस्य था कि स्वयं भगवान ने अपने अवतरण के लिए दिन के उजाले को नहीं, बल्कि आधी रात के गहरे अंधकार को चुना? इसी रहस्य को जानने के लिए एक दिन माता पार्वती ने कैलाश पर भगवान महादेव से प्रश्न किया। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव समाधि में लीन थे। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी और मंद-मंद हवाएं वातावरण में एक अद्भुत शांति घोल रही थीं। माता पार्वती कुछ समय तक महादेव को देखती रहीं। फिर उन्होंने धीरे से पूछा, “स्वामी, पृथ्वी पर भक्त जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं और आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव करते हैं। लेकिन भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात में ही क्यों हुआ? क्या इसके पीछे कोई ऐसा दिव्य रहस्य है जिसे संसार पूरी तरह नहीं समझ पाया?” महादेव ने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं। उनके मुख पर एक शांत मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “देवी, श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं था। वह धर्म की पुनर्स्थापना का आरंभ था। वह उस वचन की पूर्ति थी जो स्वयं भगवान ने संसार से किया था। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, जब निर्दोषों पर अत्याचार होता है और जब धर्म कमजोर पड़ने लगता है, तब परमात्मा किसी न किसी रूप में अवतरित होकर संतुलन स्थापित करते हैं।” माता पार्वती ने उत्सुक होकर पूछा, “लेकिन स्वामी, उस समय ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी कि भगवान विष्णु को स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर आना पड़ा?” महादेव बोले, “देवी, द्वापर युग में मथुरा पर कंस नाम का एक अत्याचारी राजा शासन करता था। वह अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन उसके हृदय में भय और अहंकार भर चुका था। उसने अपने ही पिता को बंदी बनाकर सिंहासन पर अधिकार कर लिया था। धीरे-धीरे उसका अत्याचार इतना बढ़ गया कि मथुरा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोग भय के साए में जीवन बिताने लगे। न्याय की आवाज दब गई थी और अत्याचारियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।” “लेकिन कंस का सबसे बड़ा भय एक आकाशवाणी थी। आकाशवाणी में कहा गया था कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसके विनाश का कारण बनेगी। यह सुनते ही कंस के मन में भय पैदा हो गया। उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे देवकी की संतानें जन्म लेती गईं, कंस ने उन्हें निर्दयता से उनसे दूर कर दिया। एक के बाद एक छह संतानों का अंत कर दिया गया। सातवीं संतान के रूप में योगमाया की लीला से बलराम जी का गर्भ रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हुआ और फिर आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का समय आया।” महादेव कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “देवी, उस समय केवल देवकी और वसुदेव ही दुखी नहीं थे। पूरी पृथ्वी अधर्म के भार से पीड़ित थी। पृथ्वी माता ने गौ का रूप धारण किया और ब्रह्मा जी के पास पहुंचीं। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की। तब ब्रह्मा जी सभी देवताओं को साथ लेकर क्षीर सागर गए और भगवान विष्णु की आराधना की। देवताओं ने प्रार्थना की कि अब पृथ्वी को अत्याचार के भार से मुक्त करने का समय आ गया है।” “तब भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेंगे। वे देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेंगे और अधर्म की शक्ति को समाप्त करके धर्म की स्थापना करेंगे। लेकिन देवी, इस अवतार की सबसे अद्भुत बात केवल यह नहीं थी कि भगवान जन्म लेने वाले थे। अद्भुत बात यह भी थी कि उन्होंने अपने अवतरण के लिए समय ऐसा चुना जिसे संसार अंधकार का समय मानता है।” माता पार्वती ने तुरंत पूछा, “यही तो मेरा प्रश्न है स्वामी। दिन के समय नहीं, आधी रात में ही क्यों?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “क्योंकि देवी, अंधकार केवल रात में नहीं होता। असली अंधकार मनुष्य के भीतर भी जन्म लेता है। जब मन में भय होता है, तब अंधकार होता है। जब अन्याय बढ़ता है, तब अंधकार होता है। जब अहंकार सत्य पर भारी पड़ता है, तब अंधकार होता है। जब मनुष्य धर्म का मार्ग छोड़ देता है, तब अंधकार होता है। श्रीकृष्ण ने उसी सबसे गहरे अंधकार के बीच प्रकाश बनकर जन्म लिया।” “इसीलिए आधी रात का समय केवल एक घड़ी नहीं था। वह एक संदेश था। संसार को यह बताने का संदेश कि चाहे अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश का जन्म उसी अंधकार के बीच हो सकता है। रात चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, उसके बाद सुबह अवश्य आती है।” माता पार्वती ध्यान से महादेव की बात सुन रही थीं। महादेव आगे बोले, “जब श्रीकृष्ण के जन्म का समय आया, तब मथुरा की कारागार में देवकी और वसुदेव बंदी थे। बाहर कंस का भय था और भीतर अपने बच्चे को लेकर माता-पिता की चिंता। लेकिन जैसे ही वह दिव्य क्षण आया, पूरी कारागार एक अलौकिक प्रकाश से भर गई।” “भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के सामने दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए। उनके मुख पर अद्भुत तेज था। देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा अवतरित हुए हैं। भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनका जन्म किसी सामान्य उद्देश्य के लिए नहीं हुआ है। उन्होंने धर्म की रक्षा और अधर्म के अंत का संकल्प लिया है।” “फिर भगवान ने उन्हें निर्देश दिया कि उन्हें तुरंत गोकुल ले जाया जाए। उसी क्षण वसुदेव की बेड़ियां खुल गईं। कारागार के विशाल द्वार स्वयं खुल गए और पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए। यह सब किसी सामान्य घटना की तरह नहीं, बल्कि एक दिव्य लीला की तरह घटित हुआ।” वसुदेव ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा और आधी रात के अंधकार में मथुरा से गोकुल की ओर चल पड़े। बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी। आकाश में बादल गरज रहे थे और यमुना का जल तेज बहाव के साथ बह रहा था। एक पिता के लिए वह यात्रा भय से भरी हो सकती थी, लेकिन वसुदेव के साथ स्वयं भगवान थे। वसुदेव जैसे ही यमुना के किनारे पहुंचे, नदी का जल ऊंचा था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे बालक को लेकर इस प्रचंड जलधारा को कैसे पार करेंगे। तभी शेषनाग ने प्रकट होकर अपने विशाल फनों से बालक श्रीकृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। तेज बारिश के बीच भी बालक कृष्ण सुरक्षित रहे। यमुना की धारा भी मानो स्वयं भगवान के चरणों का स्पर्श करने के लिए आगे बढ़ी और फिर वसुदेव को मार्ग मिल गया। वसुदेव यमुना पार करके गोकुल पहुंचे। वहां नंद बाबा के घर उसी समय योगमाया ने जन्म लिया था। भगवान श्रीकृष्ण को वहां छोड़कर वसुदेव योगमाया को लेकर वापस मथुरा की कारागार में लौट आए। जैसे ही वे कारागार पहुंचे, सब कुछ फिर पहले जैसा दिखाई देने लगा। दरवाजे बंद हो गए, बेड़ियां फिर बंध गईं और पहरेदारों की नींद खुल गई। माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा, “स्वामी, तो क्या यही कारण है कि आज भी भक्त जन्माष्टमी की पूजा आधी रात को करते हैं?” महादेव ने गंभीर लेकिन प्रेमपूर्ण स्वर में कहा, “हां देवी, भक्त आधी रात को केवल श्रीकृष्ण के जन्म का स्मरण नहीं करते। वे उस दिव्य संदेश को याद करते हैं कि जब जीवन में अंधकार सबसे अधिक दिखाई दे, तब भी आशा को जन्म दिया जा सकता है। श्रीकृष्ण का जन्म हमें यह विश्वास देता है कि अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, सत्य अंततः अपना मार्ग बना लेता है।” “देवी, ध्यान रखना, श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ जब चारों ओर भय था। लेकिन उनके आने के साथ ही आशा का जन्म हुआ। जहां निराशा थी वहां विश्वास आया। जहां अत्याचार था वहां न्याय की उम्मीद जगी और जहां अंधकार था वहां प्रकाश का संदेश आया।” माता पार्वती ने हाथ जोड़कर कहा, “अब मैं समझ गई स्वामी। जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं है। यह उस दिव्य सत्य का उत्सव है कि धर्म कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। जब अधर्म अपनी सीमा पार करता है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में संसार का मार्गदर्शन करने अवश्य आते हैं।” महादेव मुस्कुराए और बोले, “और यही श्रीकृष्ण की लीला का सबसे सुंदर संदेश है। मनुष्य को अपने जीवन के अंधकार से डरना नहीं चाहिए। उसे अपने भीतर विश्वास का दीप जलाए रखना चाहिए। क्योंकि जिस क्षण मनुष्य सच्चे धर्म, प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलता है, उसी क्षण उसके भीतर श्रीकृष्ण के प्रकाश का जन्म होना शुरू हो जाता है।” उस दिन से जन्माष्टमी केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं रही। यह करोड़ों भक्तों के लिए विश्वास का पर्व बन गई। आधी रात होते ही मंदिरों में घंटियां बजती हैं, शंखनाद होता है, “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारे गूंजते हैं और भक्त बाल गोपाल के जन्म का उत्सव मनाते हैं। क्योंकि उस आधी रात में केवल एक बालक का जन्म नहीं हुआ था, बल्कि मानवता के लिए एक संदेश जन्मा था—अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश का आगमन निश्चित है। इसलिए जब अगली बार आप जन्माष्टमी की रात आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं, तो केवल उनकी बाल छवि को निहारकर रुक मत जाइए। उस आधी रात के संदेश को भी अपने हृदय में उतारिए। अगर आपके जीवन में कोई कठिनाई है, अगर परिस्थितियां अंधकार जैसी लग रही हैं, तो याद रखिए—कृष्ण का जन्म भी अंधकार के बीच हुआ था। रात के सबसे गहरे क्षण में ही आशा का सबसे उज्ज्वल प्रकाश प्रकट हुआ था। यही जन्माष्टमी का सबसे सुंदर रहस्य है—जब संसार को लगता है कि अब प्रकाश कहीं दिखाई नहीं दे रहा, उसी समय ईश्वर अपने प्रकाश के साथ आने का मार्ग बना रहे होते हैं। इसलिए विश्वास रखिए, धर्म का मार्ग मत छोड़िए, प्रेम बनाए रखिए और श्रीकृष्ण का स्मरण करते रहिए। क्योंकि अंधकार की सबसे बड़ी हार उसी क्षण शुरू हो जाती है, जब हृदय में भगवान के नाम का एक छोटा सा दीप जल उठता है। जय श्री कृष्ण।
17 likes
14 shares

More like this