sn vyas
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#जय शनिदेव
`ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः🙇🏻♂️`
*॥ अथ शनिवज्रपंजर कवचम् ॥*
*ॐ शं शनैश्चराय नमः ⚫*
*`प्रसंग –`*
`श्रीब्रह्माण्डपुराण , ब्रह्मा-नारद संवाद ~`
`नारद जी ने पूछा – "कलियुग में शनि की पीड़ा से रक्षा कैसे हो ?"`
`ब्रह्माजी ने कहा - शनि वज्रपंजर कवच । ये वज्र के पिंजरे जैसा है । जो इसे धारण करेगा उसे शनि की साढ़ेसाती , ढैय्या , महादशा छू भी नहीं सकती ।`
`# ध्यानम् –`
*नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।*
*चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ॥१॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 शनि देव के वस्त्र नीले , शरीर नीला , सिर पर मुकुट , गिद्ध पर सवार , हाथ में धनुष , चार भुजाएं । ऐसे सूर्यपुत्र , वरदायक , शांत शनि देव सदैव मेरी रक्षा करें ।`
*श्रुणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।*
*कवचं शनिराजस्य सौरिदमनुत्तम् ॥२॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 हे ऋषियों ! सुनो । ये शनि की पीड़ा हरने वाला , शनिराज का सर्वश्रेष्ठ कवच है ।`
*व्यासेन कथितं पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ।*
*गुह्याद्गुह्यतरं चैव शनिपीडाहरं नृणाम् ॥३॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 इसे पहले व्यास जी एवं ब्रह्मा जी ने कहा । ये अत्यंत गुप्त तथा मनुष्यों की शनि पीड़ा हरने वाला है ।`
*ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः ।*
*नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ॥४॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 सूर्यपुत्र मस्तक की , छाया के पुत्र नेत्रों की , यम के भाई कानों की रक्षा करें ।`
*नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा ।*
*स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः ॥५॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 वैवस्वत नासिका की , भास्कर मख की , शनि कंधों की , शुभप्रद शनि हाथों की रक्षा करें ।`
*वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा ।*
*नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ॥६॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 यम के भाई वक्ष की , असित उदर/पेट की , ग्रहपति नाभि की , मन्द शनि कटि/कमर की रक्षा करें ।`
*ऊरू पातु महाबाहुः जानुनी पातु मन्दगः ।*
*पादौ पातु सुरेष्ठोऽथ सर्वाङ्गं पातु पिप्पलः ॥७॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 महाबाहु जंघाओं की , मन्दगति घुटनों की , सुरेष्ठ पैरों की , पिप्पलाद ऋषि सम्पूर्ण/समस्त शरीर की रक्षा करें ।`
`# फलश्रुति –`
*इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः ।*
*न तस्य जायते पीड़ा प्रीतो भवति सूर्यजः ॥८॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 जो इस दिव्य कवच का पाठ करेगा उसे पीड़ा नहीं होती , उससे सूर्यपुत्र शनि प्रसन्न होते हैं ।`
*व्याधयो नश्यन्ति रोगाः नश्यन्ति चोपद्रवाः ।*
*शत्रवः पीडयन्ति न कदाचिदपि तं नरम् ॥९॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 रोग , व्याधि , उपद्रव नष्ट होते हैं । उसको शत्रु कभी पीड़ा नहीं दे सकते ।`
*सर्वरोगविनिर्मुक्तः सर्वसम्पद्युतो भवेत् ।*
*दीर्घायुष्यं सदा लब्ध्वा विष्णुलोके महीयते ॥१०॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 सभी रोगों से मुक्ति मिलती है , सभी सम्पदा युक्त होता है , दीर्घायु होता है औऱ अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति करता है ।`
*अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।*
*कवचं पठते नित्यं न पीड़ा जायते क्वचित् ॥११॥*
`श्लोकार्थ 👉🏻 जन्मकुंडली के , द्वितीय , अष्टम , एवं द्वादश भाव में शनि हो तो भी नित्यप्रतिदिन पाठ करनेंसे कभी शनिकृत पीड़ा नहीं होती ।`
*इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्मनारदसंवादे शनिवज्रपंजरकवचं सम्पूर्णम् ॥१२॥*
`— इस प्रकारसे श्रीब्रह्माण्डपुराण में ब्रह्मा-नारद संवाद में शनि वज्रपंजर कवच सम्पूर्ण हुआ ।`
*जय शनिदेव महाराज*
*ॐ शं शनैश्चराय नमः*
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`जय जय शङ्कर🚩`
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