sn vyas
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#स्कंद पुराण #पौराणिक कथा #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱शिवपुराण कथा📖
स्कंद पुराण के 'भागवत/वैष्णव खंड' और श्रीमद्भागवत में महर्षि भृगु द्वारा त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की परीक्षा लेने और भगवान विष्णु की अपार सहनशीलता की अत्यंत प्रसिद्ध कथा मिलती है। यह कथा दर्शाती है कि भगवान विष्णु को 'सत्त्वगुणी' और जगत् का वास्तविक पालनहार क्यों माना जाता है।
1. ऋषियों का संशय और भृगु ऋषि का चयन
एक बार सरस्वती नदी के तट पर परम ज्ञानी ऋषियों और मुनियों का एक महान यज्ञ चल रहा था। यज्ञ के दौरान ऋषियों के बीच एक गूढ़ प्रश्न उठा— "त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) में सबसे श्रेष्ठ, परम शांत और शुद्ध सत्त्वगुणी कौन है, जिनकी पूजा का फल शीघ्र और कल्याणकारी होता है?"
काफी विचार-विमर्श के बाद भी जब कोई निर्णय न हो सका, तब ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को तीनों देवों की परीक्षा लेने का दायित्व सौंपा गया।
2. ब्रह्मा जी और भगवान शिव की परीक्षा
ब्रह्मा जी की परीक्षा (सत्यलोक):
महर्षि भृगु सबसे पहले अपने पिता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। वहाँ जाकर भृगु ने न तो ब्रह्मा जी को प्रणाम किया और न ही उनकी कोई स्तुति की। अपने पुत्र के इस अभद्र व्यवहार को देखकर ब्रह्मा जी अत्यधिक क्रोधित हो गए। यद्यपि उन्होंने अपने संयम से क्रोध को दबा लिया, लेकिन उनके मन में कटुता आ गई। भृगु समझ गए कि ब्रह्मा जी में रजो गुण का प्रभाव है।
भगवान शिव की परीक्षा (कैलाश):
इसके बाद भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने पहुँचे। शिव जी ने अपने भाई भृगु को आता देख सहर्ष आलिंगन (गले लगाने) के लिए अपनी भुजाएँ फैला दीं। लेकिन भृगु ने उन्हें रोकते हुए कहा— "आप शास्त्र-विरुद्ध आचरण करते हैं, शरीर पर भस्म मलते हैं, इसलिए आप मेरे आलिंगन के योग्य नहीं हैं।"
यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत कुपित हो गए और उन्होंने त्रिशूल उठा लिया। तब माता पार्वती ने बीच-बचाव करके शिव जी के क्रोध को शांत किया। भृगु समझ गए कि शिव जी में तमो गुण का प्रभाव शीघ्र आ जाता है।
3. भगवान विष्णु की परीक्षा और 'भृगु-लता'
अंत में महर्षि भृगु बैकुंठ लोक पहुँचे। उस समय भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।
छाती पर लात मारना: भृगु ऋषि ने बैकुंठ में प्रवेश करते ही बिना कुछ कहे सीधे जाकर सोए हुए भगवान विष्णु के वक्षस्थल (छाती) पर अपने दाहिने पैर से ज़ोरदार प्रहार (लात) कर दिया।
भगवान विष्णु की अद्भुत सहनशीलता:
इस घोर अपमान पर क्रोधित होने के बजाय, भगवान विष्णु तुरंत अपनी शय्या से उठे। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से महर्षि भृगु के आगे मस्तक झुकाया और उनके चरण पकड़ लिए।
विष्णु जी के शब्द: भगवान विष्णु ने अति कोमलता से भृगु के चरणों को सहलाते हुए कहा—
"हे महर्षि! आपके आगमन का मुझे ज्ञान न रहा, मुझसे बड़ा अपराध हुआ। आपका यह चरण अत्यंत कोमल है और मेरी छाती वज्र के समान कठोर है। कहीं आपके पाँव में चोट तो नहीं लग गई?"
भगवान विष्णु के इन वचनों और उनकी अपार सहनशीलता, क्षमा और नम्रता को देखकर भृगु ऋषि का हृदय द्रवित हो गया। उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे।
4. परीक्षा का परिणाम और 'भृगु-लता' का चिन्ह
भगवान विष्णु के इस परम शांत और सत्त्वगुणी स्वरूप को देखकर महर्षि भृगु ने हाथ जोड़कर स्तुति की और कहा— "हे प्रभु! आप ही त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ, परम सत्य और जगत् के सच्चे पालनहार हैं। आपके भीतर क्रोध का लेशमात्र भी अंश नहीं है।"
भृगु-लता (श्रीवत्स): भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि के चरण के निशान को अपनी छाती पर सदा के लिए धारण कर लिया, जिसे 'भृगु-लता' या 'श्रीवत्स' कहा जाता है।
लक्ष्मी जी का शाप: हालाँकि, पति की छाती पर लात मारे जाने से माता लक्ष्मी अत्यंत क्रोधित हुईं। उन्होंने ब्राह्मणों (भृगु के वंशजों) को शाप दिया कि वे चंचल धन (लक्ष्मी) के लिए तरसेंगे। इसी कारण भगवान विष्णु ने वचन दिया कि जहाँ भी भक्ति और सत्य होगा, वहाँ लक्ष्मी स्वतः निवास करेंगी।
कथा का आध्यात्मिक संदेश
स्कंद पुराण के अनुसार, यह कथा सिखाती है कि वास्तविक श्रेष्ठता बल या शक्ति में नहीं, बल्कि क्षमा, सहनशीलता और नम्रता में होती है। जो क्रोध पर विजय पा लेता है और अपमान को भी शांत भाव से सह लेता है, वही संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी बनने योग्य है। #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
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