sn vyas
580 views • 2 days ago
#जय श्री हनुमान #रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺
हनुमान और जी अहिरावण
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
लंका की वह रात सामान्य रातों जैसी नहीं थी। युद्ध की गर्जना थम चुकी थी, लेकिन लंका की खामोशी किसी आने वाले तूफान की चेतावनी दे रही थी। सोने की नगरी, जो कभी दीपों और उत्सवों से जगमगाती थी, अब धुएं, राख और विनाश के बीच खड़ी थी। राजमहल के सबसे गहरे और अंधेरे कक्ष में रावण अकेला बैठा था। उसके दसों मुख शांत थे, लेकिन भीतर क्रोध और भय का भयंकर तूफान उठ रहा था। कुंभकरण जा चुका था, मेघनाद जैसा पराक्रमी पुत्र भी रणभूमि में गिर चुका था और रावण की विशाल सेना का अधिकांश हिस्सा समाप्त हो चुका था। फिर भी उसका अहंकार हार मानने को तैयार नहीं था। उसे विश्वास था कि अगर कोई असाधारण शक्ति उसके हाथ लग जाए तो वह अभी भी युद्ध की दिशा बदल सकता है। तभी रावण ने अपने सामने रखे एक रहस्यमय काले दर्पण की ओर देखा। उसने एक गुप्त मंत्र का उच्चारण किया। कमरे की अग्नियां अचानक हरी हो गईं और दर्पण की सतह पर जैसे कोई गहरी लहर उठने लगी। कुछ ही क्षणों बाद उस अंधकार से एक भयानक आकृति प्रकट हुई। वह था अहिरावण, पाताल लोक का मायावी स्वामी और रावण का सौतेला भाई। उसकी आंखों में क्रूरता थी और चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसमें विनाश की छाया साफ दिखाई देती थी। रावण ने भारी स्वर में कहा, “अहिरावण, मेरी सेना टूट चुकी है। राम और लक्ष्मण ने मेरे सबसे बड़े योद्धाओं को समाप्त कर दिया है। अब मुझे उनका अंत चाहिए।” अहिरावण ने धीमी हंसी हंसते हुए कहा, “भैया, आपने युद्ध से उन्हें हराने की कोशिश की, लेकिन युद्ध में राम को हराना आसान नहीं। अब उन्हें उस जगह ले जाया जाएगा जहां आपकी सेना भी नहीं पहुंच सकती। मैं उन्हें पाताल लोक ले जाऊंगा और अपनी आराध्या शक्ति के सामने उनकी बलि चढ़ाऊंगा।” रावण की आंखों में पहली बार आशा की चमक दिखाई दी। उसने कहा, “सूर्योदय से पहले यह काम पूरा होना चाहिए।” अहिरावण ने अपनी तलवार उठाई और प्रतिज्ञा की कि रात समाप्त होने से पहले राम और लक्ष्मण पाताल लोक में उसके कब्जे में होंगे। उधर राम की सेना के शिविर में वातावरण अचानक बदल चुका था। पक्षियों की आवाजें बंद हो गई थीं, हवाएं असामान्य रूप से शांत थीं और विभीषण को किसी गहरी मायावी शक्ति की आहट महसूस हो रही थी। वह तुरंत हनुमान जी के पास पहुंचे और बोले, “पवनपुत्र, सावधान रहिए। आज की रात साधारण नहीं है। पाताल की कोई शक्ति हमारी ओर बढ़ रही है।” हनुमान जी ने तुरंत स्थिति को समझ लिया। उन्होंने भगवान राम और लक्ष्मण की सुरक्षा के लिए अपनी पूंछ को चारों ओर फैलाना शुरू किया। देखते ही देखते उनकी विशाल पूंछ ने एक अभेद्य सुरक्षा घेरे का रूप ले लिया। उसके भीतर राम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे और बाहर स्वयं हनुमान जी गदा लेकर पहरा दे रहे थे। हनुमान जी के साथ विभीषण और कुछ प्रमुख वानर योद्धा भी सतर्क थे। आधी रात बीतने लगी। तभी अंधकार में एक अदृश्य शक्ति शिविर के पास पहुंची। वह अहिरावण था। उसने हनुमान की सुरक्षा देखी तो समझ गया कि सीधे बल से अंदर जाना संभव नहीं। उसने अपनी मायावी शक्तियों का सहारा लिया। कभी वह दशरथ का रूप धारण करके आया, कभी कौशल्या का, कभी भरत का। लेकिन हनुमान जी हर बार उसकी माया पहचान लेते। अहिरावण समझ गया कि हनुमान को भावनाओं से नहीं हराया जा सकता। तभी उसके मन में एक और चाल आई। उसने स्वयं को विभीषण के रूप में बदल लिया। वही चेहरा, वही वेश, वही आवाज और वही विनम्रता। नकली विभीषण हनुमान के सामने पहुंचा और बोला, “पवनपुत्र, मैंने नक्षत्रों की गणना की है। अब संकट टल चुका है। मैं प्रभु राम के दर्शन करना चाहता हूं।” हनुमान जी ने सामने खड़े व्यक्ति पर विश्वास कर लिया। क्योंकि वह विभीषण पर पूरा भरोसा करते थे और उसके मुख से राम नाम सुन रहे थे। उन्होंने रास्ता दे दिया। यही वह क्षण था जिसका अहिरावण इंतजार कर रहा था। वह सुरक्षा घेरे के भीतर पहुंचा और अपनी मायावी शक्ति से राम और लक्ष्मण को गहरी निद्रा में डाल दिया। फिर उसने उन्हें अपने जादुई संदूक में रखा और पाताल लोक की ओर निकल गया। कुछ समय बाद असली विभीषण वापस लौटे। हनुमान जी ने उन्हें देखा तो चौंक गए। उन्होंने पूछा, “आप तो अभी अंदर गए थे?” विभीषण का चेहरा बदल गया। उन्होंने कहा, “मैं तो अभी यहां आया हूं। अगर मैं अभी आया हूं तो अंदर कौन गया?” यह सुनते ही हनुमान जी के भीतर बिजली सी कौंध गई। वे तुरंत सुरक्षा घेरे के भीतर पहुंचे, लेकिन वहां राम और लक्ष्मण नहीं थे। उनके आसन खाली थे। पूरा शिविर हाहाकार से भर गया। हनुमान जी ने अपने हृदय पर हाथ रखकर कहा, “मैं अपने प्रभु की रक्षा नहीं कर सका।” लेकिन विभीषण ने उन्हें संभाला और बताया कि यह काम अहिरावण का हो सकता है। उसने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक पहुंचाया होगा, जहां वह उन्हें अपनी देवी के सामने बलि देने की तैयारी कर रहा होगा। यह सुनते ही हनुमान जी की आंखों में दृढ़ता लौट आई। उन्होंने आकाश की ओर देखकर प्रण लिया कि सूर्योदय से पहले वे अपने प्रभु राम और लक्ष्मण को वापस लेकर आएंगे। इसके बाद वे समुद्र में कूद पड़े और पाताल लोक की ओर बढ़ चले। अथाह जल को पार करते हुए हनुमान जी पाताल के द्वार पर पहुंचे। वहां का संसार पृथ्वी से बिल्कुल अलग था। चारों ओर रहस्यमय प्रकाश था, नागमणियों की चमक थी और विचित्र आकार वाले जीव उस अंधकारमय लोक में घूम रहे थे। हनुमान जी ने अपना आकार छोटा किया और गुप्त रूप से पाताल नगरी में प्रवेश किया। लेकिन अहिरावण के महल के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही उन्हें एक विशाल वानर दिखाई दिया। वह देखने में बिल्कुल हनुमान जैसा था। हनुमान जी ने पूछा, “तुम कौन हो?” उस वानर ने कहा, “मैं मकरध्वज हूं। मैं हनुमान का पुत्र हूं और अहिरावण के द्वार का रक्षक हूं।” यह सुनकर हनुमान जी चौंक गए। उन्होंने कहा, “मैं बाल ब्रह्मचारी हूं, मेरा कोई पुत्र कैसे हो सकता है?” मकरध्वज ने तब अपने जन्म की कथा बताई। उसने बताया कि लंका दहन के बाद जब हनुमान जी समुद्र में पहुंचे थे, तब उनके शरीर से पसीने की एक बूंद समुद्र में गिरी थी। एक विशाल मछली ने उस बूंद को निगल लिया और उसी से उसका जन्म हुआ। हनुमान जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य पहचान लिया। सामने खड़ा योद्धा वास्तव में उनका पुत्र था। लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि पिता और पुत्र को मिलन के साथ ही युद्ध करना पड़ा। मकरध्वज ने कहा, “पिताजी, मैं आपका सम्मान करता हूं, लेकिन मैं इस द्वार का रक्षक हूं। जब तक आप मुझे पराजित नहीं करेंगे, मैं आपको अंदर नहीं जाने दूंगा।” हनुमान जी ने उसे समझाया कि अहिरावण अधर्म कर रहा है, लेकिन मकरध्वज अपने कर्तव्य से पीछे हटने को तैयार नहीं था। दोनों के बीच भयंकर मल्लयुद्ध हुआ। मकरध्वज ने अपने बल और कौशल से हनुमान जी को प्रभावित कर दिया, लेकिन अंततः हनुमान जी ने अपनी पूंछ से उसे बांध दिया और सम्मानपूर्वक एक ओर रख दिया। उन्होंने कहा, “पुत्र, तुम्हारी स्वामीभक्ति ने मुझे प्रसन्न किया है, लेकिन आज राम का कार्य सबसे ऊपर है।” इसके बाद हनुमान जी महल के भीतर पहुंचे। वहां उन्हें एक नागकन्या मिली जिसने अपना नाम चंद्रसेना बताया। उसने बताया कि अहिरावण राम और लक्ष्मण को देवी के सामने बलि देने की तैयारी कर रहा है। लेकिन उसे मारना आसान नहीं था। उसकी प्राणशक्ति पांच अलग-अलग दीपकों में सुरक्षित थी। वे पांचों दीपक पाताल की अलग-अलग दिशाओं में जल रहे थे। जब तक पांचों दीपक एक साथ नहीं बुझते, अहिरावण का अंत नहीं हो सकता था। हनुमान जी ने यह रहस्य सुना तो उन्हें समझ आया कि साधारण युद्ध से विजय संभव नहीं होगी। उधर मंदिर में अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को वेदी के पास रखा हुआ था। वह अपनी विजय पर गर्व कर रहा था और उन्हें बलि देने के लिए तैयार था। हनुमान जी ने पहले बुद्धि का प्रयोग किया। उन्होंने देवी की मूर्ति के पीछे छिपकर अपनी आवाज बदल ली और ऐसा भ्रम पैदा किया कि स्वयं देवी उससे बात कर रही हैं। अहिरावण उस माया में फंस गया। उसने राम और लक्ष्मण को बंधन से मुक्त किया और उन्हें मूर्ति के पास रख दिया। यही हनुमान जी का अवसर था। वे अचानक अपने विशाल रूप में प्रकट हुए और राम तथा लक्ष्मण को सुरक्षित अपने पास कर लिया। अहिरावण ने अपनी सेना को आदेश दिया और चारों ओर से असुरों ने आक्रमण कर दिया। हनुमान जी ने अकेले ही उस विशाल सेना का सामना किया। लेकिन अहिरावण बार-बार उनके प्रहारों से बच निकलता। तभी हनुमान जी को चंद्रसेना द्वारा बताए गए पांच दीपकों का रहस्य याद आया। उन्होंने समझ लिया कि अहिरावण का अंत तभी होगा जब पांचों दीपक एक साथ बुझेंगे। एक ही शरीर से पांच दिशाओं तक पहुंचना संभव नहीं था। तब हनुमान जी ने अपने आराध्य श्री राम का स्मरण किया और उनकी दिव्य शक्ति जागृत हुई। उनका रूप बदलने लगा और वे पंचमुखी हनुमान के अद्भुत स्वरूप में प्रकट हुए। उनके पांच मुख पांच दिशाओं की ओर केंद्रित थे। एक मुख हनुमान का, दूसरा गरुड़ का, तीसरा वराह का, चौथा नरसिंह का और पांचवां हयग्रीव का था। अब वे एक साथ पांचों दिशाओं को देख सकते थे। पांचों मुखों से निकली दिव्य शक्ति ने पाताल की पांचों दिशाओं में जल रहे प्राणदीपों को एक ही क्षण में बुझा दिया। जैसे ही पांचों दीपक एक साथ बुझ गए, अहिरावण की शक्ति समाप्त हो गई। उसका अभेद्य शरीर कमजोर पड़ गया और हनुमान जी ने एक ही निर्णायक प्रहार में उसका अंत कर दिया। अहिरावण के मरते ही पाताल लोक की सारी माया समाप्त होने लगी। राम और लक्ष्मण को होश आया। उन्होंने अपने सामने हनुमान जी को देखा तो उनके चेहरे पर करुणा और प्रेम की मुस्कान फैल गई। हनुमान जी ने अपने प्रभु को सुरक्षित देखा तो उनकी आंखों में आनंद के आंसू आ गए। उन्होंने मन ही मन कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी विजय कोई राक्षस का वध नहीं, बल्कि अपने प्रभु की सेवा पूरी करना है। इसके बाद हनुमान जी ने मकरध्वज को मुक्त किया और उसे अपने सामने बुलाया। राम जी ने पूछा, “पवनपुत्र, अब पाताल का राजा कौन होगा?” हनुमान जी ने मकरध्वज की ओर देखा और कहा, “प्रभु, इसने अपने स्वामी के लिए अपने पिता तक के सामने कर्तव्य निभाया है। इसके भीतर साहस भी है और निष्ठा भी। यदि आपकी आज्ञा हो तो इसे पाताल का राजा बनाया जाए।” श्रीराम ने मकरध्वज को आशीर्वाद दिया और उसे पाताल लोक का राजा घोषित किया। मकरध्वज ने अपने पिता के चरणों में सिर झुका दिया। उस क्षण पिता और पुत्र के बीच का वह अद्भुत संबंध पूर्ण हुआ, जो युद्ध के बीच जन्मा था लेकिन धर्म और कर्तव्य से मजबूत हुआ। इसके बाद हनुमान जी ने राम और लक्ष्मण को अपने साथ लिया और पाताल लोक से बाहर निकल आए। जब वे वापस वानर सेना के शिविर में पहुंचे तो पूरी सेना में खुशी की लहर दौड़ गई। सुग्रीव, अंगद, जामवंत और विभीषण ने अपने प्रभु को सुरक्षित देखकर राहत की सांस ली। हनुमान जी शांत खड़े रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उनके लिए यह कोई चमत्कार नहीं था। यह तो उनके प्रभु के प्रति सेवा थी। राम जी ने हनुमान जी की ओर देखकर कहा कि संसार में बल, बुद्धि और पराक्रम की कमी नहीं, लेकिन जिस शक्ति के पीछे निष्काम भक्ति हो, उसे कोई मायावी शक्ति पराजित नहीं कर सकती। हनुमान जी ने सिर झुका लिया और उनके मुख से केवल एक ही शब्द निकला—जय श्री राम। उस रात लंका में रावण की एक और आशा समाप्त हो चुकी थी। अहिरावण की माया टूट चुकी थी, पाताल की शक्ति पराजित हो चुकी थी और राम तथा लक्ष्मण सुरक्षित लौट चुके थे। लेकिन इस पूरी घटना की सबसे बड़ी सीख यही थी कि अधर्म चाहे कितना भी मायावी क्यों न हो, सत्य और भक्ति के सामने उसकी कोई स्थायी शक्ति नहीं होती। हनुमान जी ने यह सिद्ध कर दिया कि केवल बाहुबल ही पर्याप्त नहीं होता। सही समय पर बुद्धि, धैर्य, निष्ठा और प्रभु के प्रति अटूट समर्पण ही असंभव दिखाई देने वाले कार्य को भी संभव बना देता है। यही कारण है कि जब भी संकट की घड़ी आती है, भक्त के हृदय से सबसे पहले वही नाम निकलता है—जय बजरंगबली, जय श्री राम।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
12 shares