sn vyas
576 views 15 hours ago
#🪔जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🦚🌺 #🦚 भगवान श्री कृष्ण की पौराणिक कथाएं 📚 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏जन्माष्टमी Status✨⌛ #💙 मेरे लड्डू गोपाल 🦚 भगवान श्रीकृष्ण जी की बड़ी बहन भगवती योगमाया॥ 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ आज पवित्र भाद्रपद कृष्ण सप्तमी तिथि है। रात तक अष्टमी तिथि का संयोग हो जाएगा जिसे हम "श्री कृष्ण जन्माष्टमी " के नामसे जानते हैं। दैत्य दुराचारी कंस तथा कालयवन, कौरवादि सकल धर्मद्रोहियों के सर्वनाश हेतु पूर्णपुरुषोत्तम श्री भगवान देवदेव नारायण भूलोक में अवतरित हुए थे। श्रीमद्भागवत, हरिवंश पुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मवैवर्तादि पुराणों में भगवान श्री कृष्ण के जन्मकथा का वर्णन है, वहां पर वर्णन किया गया है की एक ही रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म लेने के बाद भगवती जगदंबा योगमाया प्रकट हुई थी, अर्थात अष्टमी तिथि समाप्त होते ही नवमी तिथि के आने पर भगवती योगमाया प्रकट हुई थी । जैसे की हरिवंश पुराण कहते हैं:- "नवम्यामेव संजाता कृष्णपक्षस्यवै तिथौ" लेकिन शास्त्र प्रमाण अनुसार देवी योगमाया का आविर्भाव तिनों तिथि सप्तमी, अष्टमी और नवमी को हुआ था। हरिवंशादि के अनुसार नवमी, देवीभागवत के अनुसार अष्टमी और त्रिपुरारहस्य के अनुसार सप्तमी। इन सभी में त्रिपुरा रहस्य के अनुसार आज सप्तमी तिथि भगवती का प्राकट्य दिवस है, इस पर एक कथा है।। भगवती आदिपराशक्ति ललिता महात्रिपुरा सुंदरी का अपने कलांश से कात्यायनी योगमाया रूप में प्रकट होने का कारण ब्रह्मा और सरस्वती का कलह ही था॥ एकबार पवित्र ब्रह्मलोक में भगवान ब्रह्मा के निकट भगवती सरस्वती बैठी थी। समस्त देवता भगवती सरस्वती की स्तुति करते समय भगवान ब्रह्मा माता का अपमान करने लगे इससे क्रोधित हुई ॥भगवती सरस्वती भगवान ब्रह्मा को शक्तिहीन कहकर अपमान करने लगी, इससे कुपित भगवान ने भगवती सरस्वती को यह श्राप दिया था। की पति की निंदा करने वाली अब मेरे पत्नी होने की योग्यता तुझ में नहीं है, तू मेरे साथ यज्ञ में नहीं बैठेगी। इससे माता सरस्वती क्रोधित होकर ब्रह्मदेव को श्राप दे दी- अगर मैं यज्ञ में आपके साथ बैठने की योग्य नहीं हूं तो नीच शूद्र अभीरकन्या आपके साथ यज्ञ में बैठेगी। इससे चिंतित होकर ब्रह्मा और सरस्वती को समझाने के लिए भगवान शिव विष्णु उन दोनों के श्राप का विधान किए की हे ब्रह्मदेव आपके श्राप के अनुसार भगवती सरस्वती अपने इस शरीर से आपकी यज्ञ में नहीं बैठेगी इस प्रकार देवी सरस्वती आपने भगवान ब्रह्मा को जो श्राप दिया है उसी के अनुरूप आप अपने अंश से शूद्र "अभीर कन्या" के रूप में जन्म लेंगी और ब्रह्मा के साथ यज्ञ में बैठेंगी। इससे ब्रह्मदेव दोबारा कुपित होकर माता को बोलने लगे की- तूने बिना सोचे समझे मुझे यह श्राप दिया है अतः यह शूद्रकन्या तेरे अंश से उत्पन्न होने के बाद भी तू उसको पहचान नहीं पाएगी, इससे माता पुनः ब्रह्मदेव को श्राप दे दी की आप हमेशा कामुक रहेंगे। इसके बाद एक समय ब्रह्माजी ने पवित्र पुष्कर क्षेत्र में रज्ञ करने का आयोजन किए। उस ब्रह्मयज्ञ में देवी सरस्वती का आने में विलम्ब होता देख ब्रह्माजी शूद्रकन्या गायत्री देवी से विवाह किए, उसी समय यह सबकुछ देख क्रोधित होकर मां सरस्वती भयंकर प्रलय मचाने लगी, उन्होंने अपने शरीर से करोड़ों पिशाचों को उत्पन्न कर जगत और देवों को पीड़ा देने लगी, इससे भयभीत होकर देवी लक्ष्मी और पार्वती मां सरस्वती के चरण पकड़ कर स्तुति करने लगे फिर भी सरस्वती शांत नहीं हुई,तब सभी ने परंब्रह्म आदिपराशक्ति माता त्रिपुराम्बिका को स्मरण किए, मां महामाया के आशीर्वाद से सबकुछ शांत होने पर भगवती त्रिपुराम्बा ब्रह्माजी का हीनकुल कन्या से विवाह इत्यादि दोषों के मूल कारण स्वरूप पूर्व वृतान्त बताते हुए कहती हैं । : कौशिकवंशीय हर्यक्ष नामक ब्राह्मण एक बार एक गोप-कन्या का हरण करने से देवर्षि नारदजी ने शूद्र गोप के रुप में जन्म लेने के लिए उस ब्राह्मण को श्राप दिए और प्रार्थना करने पर श्राप के शमन के लिए देवी सावित्री की तपस्या करने के लिए कहा ॥ हर्यक्ष ब्राह्मण के तपस्या से संतुष्ट देवी सावित्री उसे वरदान देकर कहती है॥ " हे वत्स! तुम्हारा जन्म अवश्य अभीर हीन शुद्रकुल कुल में होगा, लेकिन तब मेरे अंश से एक कन्या तुम्हारी पुत्री बनेगी और पुनः और एक जन्म में तुम भगवान विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त कर परम पद को प्राप्त करोगे। इतना बताने के बाद भगवती गायत्री को कोई साधारण न समझे इसलिए भगवती पराम्बा ने सभी देवों से कहने लगी थी । यह मेरी ही अंशजा है मेरी ही कन्या है मैं ही स्वयं गायत्री हूं। तब गायत्री देवी के शरीर में त्रिपुराम्बिका का विलीन होकर अपना ही विराट रूप दिखाते समय वहीं पर समस्त अभीर शूद्र उपस्थित होकर अपने कन्या को हरण करने के अपराध से ब्रह्माजी का विरोध करते समय ब्रह्माजी के बातों से गोप-भूपाल और अन्य अभीर शूद्र देखने लगे की उनकी कन्या स्वयं परंब्रह्म भुवनेश्वरी है। इससे दुखित समस्त शुद्र भगवती से दुखित होकर प्रार्थना करने लगे 👉🏻 हे मां !आप सर्वदेव सेविता स्वयं परंब्रह्म पराशक्ति है यह हमें ज्ञात नहीं था। कृपया हमे क्षमा कर वापिस लौट आइए, तब भगवती महामाया कहती हैं॥ शृणु गोपकुलाऽधीश मां पराऽऽकाशरूपिणीम् । जानीहि त्रिविधाऽऽकारां सावित्र्याद्यात्मना स्थिताम् ॥ तत्राऽहं भारतीरूपा तोषिता तव वेश्मनि । सम्भूताऽस्मि पुनश्चाऽपि गौर्यशेन समुद्भवा ॥ सृष्टयन्तरे भविष्यामि सह भ्रात्रा च विष्णुना । नन्दगोपस्त्वं भविता सर्वोत्तममहीपतिः ॥ तत्राऽहं भविता कन्या कात्यायन्यभिविश्रुता । एषोऽनुजो मम भवेत् साक्षान्नारायणः परः॥ आहरिष्यति ते कीर्ति त्रिलोकविततां शिवाम् । अहं विन्ध्याऽद्रिनिलया भूत्वा कलियुगे ततः॥ जनान् दुःखपरान् सर्वानुद्धरामि पुनः पुनः । गोपीभिः पूजिता तत्र मासं ते विषये शिवा ॥ अर्थात 👉🏻 हे अभीर-गोप-भूपति! सुनो, मुझे पराशक्ति और आकाशरूपिणी मानो। मैं सावित्री , लक्ष्मी , पार्वती आदि तीनों रूपों अवस्थित हूँ॥ भारती रूप में अब मैं तुम्हारे घर जाकर तुम्हें सन्तुष्ट नहीं कर सकती। अतः तुम दुखी मत हो, कल्पान्तर में मैं पुनः पार्वती के अंश से अपने भ्राता भगवान विष्णु के सहित उत्पन्न होकर मैं तुम्हारे घर फिर आऊँगी॥ उस समय तुम सर्वोत्कृष्ट महीपति नन्दगोप के रूप में रहोगे। उस समय मैं कात्यायनी के नाम से तुम्हारी कन्या बनूँगी और तब यह परमदेव श्री नारायण मेरे छोटे भाई बनेंगे और तीनों लोक में तुम्हारी कीर्ति फैलायेंगे॥ फिर मैं कलियुग में विन्ध्याचल में लीन हो जाऊँगी। वहाँ मैं बार-बार दुःखी जनों की रक्षा करूँगी और मास भर गोपियों द्वारा मैं वहाँ पूजित रहूँगी ॥ यहां पर देवी के आविर्भाव तिथि का वर्णन नहीं है। लेकिन कुछ पाठभेद में प्राप्त हुआ॥ त्रिपुरा तापिनी तंत्र में उद्धृत हैं। भगवती देवर्षि नारद को कह रहीं हैं :~ भाद्रपदेऽसितपक्षे सप्तम्यां मध्यरात्रके वैवस्वतऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे नंदगोपगृहे जाता यशोदागर्भसंभवा स्वांशेनकृष्णरक्षार्थं जातोऽहं द्वापरेयुगे॥ अर्थात 👉🏻 भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि की मध्यरात्रि में, वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें महायुग में, मैं नंदगोप के घर में, यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। द्वापर युग में, अपने अंश से श्रीकृष्ण की रक्षा करने के लिए मैं अवतीर्ण हुई थी॥" इस कारण से आज देवी योगमाया का आविर्भाव दिवस है तथा वह श्रीकृष्ण की बड़ी बहन है। अब देवी योगमाया का स्वरूप त्रिपुरा-रहस्य में इस प्रकार है। भगवती यशोदा स्वप्न में भगवती के स्वरूप को दर्शन करते समय ही देवी कन्या को प्रसव की है॥ यशोदा शयनेऽपश्यद्देवीं तां जनितां तदा । कोटिसूर्यसमाभासां त्रिनेत्रां चन्द्रशेखराम् ॥ शूलाऽसिखङ्गपरशुपानपात्रकमण्डलून् । चर्मपाशावष्टभुजैर्दधानां भीमरूपिणीम्॥ कालरात्रिं शिशुं न्यस्य प्रणम्याऽऽनकदुन्दुभिः । बद्धाञ्जलिपुटस्तावत् प्राप्तो ब्रह्मा च शङ्करः ॥ नारायणोऽपि नत्वा तामस्तवीत्त्रिपुरां शिवाम्। अर्थात :~ तब यशोदा देवी ने अपने स्वप्न में उस देवी को देखा जिनको उन्होंने अभी जन्म किया है, उन देवी तेज़ करोड़ सूर्यों के समान प्रखर था, उनके तीन नेत्र थे, और सिर पर चंद्रमा का अलंकरण था। वे अपने आठ भुजाओं में त्रिशूल, तलवार, खड्ग, परशु, पानपात्र, कमण्डलु, चर्म (ढाल) और पाश धारण किए हुए थीं, और उनका रूप अत्यंत भीषण था, उस देवी कालरात्री को रखकर वसुदेव उस कन्या को प्रणाम किए, तभी अनेक दुन्दुभि ढोल नगाड़े चारों ओर बजने लगे, उसी समय हाथ जोड़कर ब्रह्मा और शंकर भी वहाँ आ पहुँचे, और भगवान नारायण ने भी उन्हें प्रणाम करके त्रिपुरा शिवा देवी की स्तुति की॥ साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
13 shares

More like this