श्यामा
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चेहरा नहीं—एक सम्पूर्ण अन्तःकथा भीग रही है, वर्षा की पारदर्शी सलवटों में चेहरा नहीं—एक सम्पूर्ण अन्तःकथा भीग रही है, नयनों की निस्तब्ध गहराइयों में किसी अनाम प्रतीक्षा की प्रतिध्वनि ठहरी है। अधर मौन हैं, फिर भी अनकहे आख्यानों का स्पंदन शेष है— मानो विरह ने ओस बनकर पलकों पर अपना हस्ताक्षर कर दिया हो। माथे की रक्तिम बिंदी के मध्य अब भी उज्ज्वल है आत्मस्वीकृति— कि कुछ स्त्रियाँ टूटकर भी नहीं बिखरतीं, वे वर्षा की तरह बरसकर और अधिक सम्पूर्ण हो जाती हैं। #❣️Love you ज़िंदगी ❣️ #सिर्फ तुम #💓 मोहब्बत दिल से #🌙 गुड नाईट #🌷शुभ रविवार
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