sn vyas
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#विष्णु पुराण🌹🙏 #विष्णु पुराण गाथा@ #विष्णु भगवान 🙏🏻 #विष्णु भगवान #भगवान विष्णु विष्णु पुराण के तृतीय अंश (अध्याय 7) में यमराज और उनके दूतों के बीच का यह प्रसिद्ध संवाद मिलता है। इस प्रसंग में यमराज स्वयं अपने दूतों को भगवान विष्णु के भक्तों की महिमा बताते हैं और उन्हें स्पष्ट निर्देश देते हैं कि वे किन मनुष्यों को छुएँ भी नहीं। कथा का विस्तार: 1. यमदूत का संशय: एक समय यमराज के एक दूत ने उनसे पूछा— "हे महाराज! आप समस्त प्राणियों के कर्मों का फल देने वाले और दण्डधिकारी हैं। इस सम्पूर्ण संसार में ऐसा कौन है, जो आपके अधिकार क्षेत्र से बाहर है? हम पाश और दण्ड लेकर किन लोगों को यमलोक लायें और किन्हें दूर से ही त्याग दें?" 2. यमराज का उत्तर और श्रीहरि की सर्वोच्चता: यमराज ने अपने दूतों के संशय को दूर करते हुए हाथ जोड़कर भगवान विष्णु का ध्यान किया और कहा: "हे दूतों! तुम मुझे ही सर्वशक्तिमान मत समझो। मैं भी संपूर्ण जगत् के स्वामी, सर्वव्यापक और जगदाधार भगवान विष्णु के अधीन हूँ। जैसे जल का स्वामी समुद्र है, वैसे ही समस्त लोकों के स्वामी श्रीहरि हैं। जो मनुष्य भगवान विष्णु का आश्रय ले चुके हैं, उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं चलता।" 3. किन मनुष्यों के पास यमदूतों को नहीं जाना चाहिए? यमराज ने दूतों को चेतावनी देते हुए कुछ विशेष लक्षण बताए: हरि-स्मरण करने वाले: जो मनुष्य उठते, बैठते, सोते या जागते समय निश्छल मन से भगवान केशव, गोविंद, माधव या वासुदेव का नाम लेते हैं। समभाव रखने वाले: जो किसी से द्वेष नहीं करते, जिनका चित्त शांत है और जो सब प्राणियों में ईश्वर का रूप देखते हैं। पापहीन भक्त: जो पाप कर्मों से दूर रहते हैं और जिनके हृदय रूपी मंदिर में भगवान विष्णु स्थिर रूप से निवास करते हैं। यमराज कहते हैं— "हे दूतों! जो मनुष्य 'नमो वासुदेवाय' का उच्चारण करता है, वह पाप रूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि के समान है। ऐसे भगवद्भक्तों से तुम इतनी दूर रहो जैसे आग से सूखी घास दूर रहती है।" 4. यमदूतों को कड़ा निर्देश: यमराज ने अपने दूतों को ताकीद करते हुए कहा— "तुम केवल उन्हीं मनुष्यों को मेरे पास लाओ जो काम, क्रोध और तृष्णा के वशीभूत हैं, जो नास्तिक हैं, गुरु और शास्त्रों का अपमान करते हैं और जिन्होंने कभी भगवान विष्णु के चरणों में शीश नहीं झुकाया। परंतु जो श्रीहरि के शरणागत हैं, उनके पास जाने की भूल कभी मत करना; अन्यथा वे तो अभय हैं ही, उनका अनादर करने से हम स्वयं पाप के भागी बन जाएँगे।" शिक्षा: यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि सच्चे मन से किया गया भगवन्नाम का स्मरण और निष्काम भक्ति मनुष्य को काल और मृत्यु के भय से पूरी तरह मुक्त कर देती है।
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