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🌺 मां अन्नपूर्णा की कथा — जब महादेव बने भिक्षुक
एक बार कैलाश पर भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा—
“यह संसार माया है। शरीर, धन और अन्न सब नश्वर हैं। केवल आत्मा ही सत्य है।”
माता पार्वती मुस्कुराईं और बोलीं—
“नाथ! आत्मा सत्य है, पर भूखा शरीर न भक्ति कर सकता है, न तप और न धर्म।”
अपनी बात सिद्ध करने के लिए माता ने संसार से अपनी अन्न और पोषण शक्ति समेट ली।
देखते ही देखते खेत सूख गए, अनाज समाप्त होने लगा, पशु-पक्षी भूखे भटकने लगे और यज्ञ तक बंद हो गए।
पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया।
तब महादेव को अनुभव हुआ कि ज्ञान के साथ अन्न भी आवश्यक है।
उसी समय माता पार्वती काशी में मां अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट हुईं। एक हाथ में अन्न से भरा पात्र और दूसरे में करछी लेकर उन्होंने अन्नक्षेत्र खोला, जहां गरीब-अमीर, साधु-गृहस्थ—सभी को भोजन मिलने लगा।
जब भगवान शिव को यह पता चला, तो वे स्वयं हाथ में भिक्षापात्र लेकर मां के सामने पहुंचे और बोले—
“भिक्षां देहि…”
जिस विश्वनाथ के सामने संसार झुकता है, वही आज मां अन्नपूर्णा से अन्न मांग रहे थे।
मां ने प्रेम से उनके पात्र में भोजन परोसा।
महादेव ने अन्न ग्रहण कर संसार को संदेश दिया—
“अन्न ही जीवन का आधार है। अन्न का अपमान, प्रकृति और जीवन का अपमान है।”
कहते हैं, उसी क्षण धरती फिर हरी-भरी हो गई, नदियां बहने लगीं और संसार में समृद्धि लौट आई।
तभी से मां अन्नपूर्णा को अन्न, पोषण और करुणा की देवी माना जाता है।
इस कथा का सबसे सुंदर संदेश है—
जितना चाहिए उतना लें, अन्न व्यर्थ न करें और संभव हो तो किसी भूखे को भोजन अवश्य कराएं।
क्योंकि जहां किसी भूखे की थाली भरती है, वहीं मां अन्नपूर्णा की सच्ची पूजा होती है।
🚩 जय मां अन्नपूर्णा।
🔱 हर हर महादेव।
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