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- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩🏵️क्या भगवान विष्णु ने माता वृन्दा के साथ छल किया था? जानिए सनातन शास्त्रों का वह परम रहस्य जो निंदकों को निरुत्तर कर देगा! 🚩 सनातन धर्म के निंदकों और काम-पिपासा से ग्रस्त कुछ अज्ञानियों द्वारा भगवान श्रीहरि विष्णु पर प्रायः यह अत्यंत निंदनीय आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने असुर जालंधर की पत्नी वृन्दा (तुलसी) के साथ "छल और काम-भोग" किया। जो जीव स्वयं वासना, काम और क्रोध के मलिन गर्त से ऊपर नहीं उठ पाते, वे सर्वेश्वर की अलौकिक और अप्राकृत लीलाओं को भी अपनी उसी मलिन और प्राकृत दृष्टि से तौलने का दुस्साहस करते हैं। आइए, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण, नारायण उपनिषद और श्री सम्प्रदाय के परम दर्शन के आलोक में इस अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करें: 👇 🔶1. भगवद्-विग्रह (भगवान का स्वरूप): हाड़-मांस का पुतला नहीं, 'विशुद्ध सच्चिदानंद' भगवान अपनी 'त्रिपाद विभूति' (शाश्वत, निर्गुण और त्रिगुणातीत वैकुंठ लोक) में सदा स्थित रहते हैं। जब वे ब्रह्मांड की रक्षा और भक्तों के उद्धार के लिए इस 'लीला विभूति' (भौतिक जगत) में अवतरित होते हैं, तो उनका श्रीविग्रह (शरीर) हम साधारण जीवों की भाँति पंचभूतों या हाड़-मांस का नहीं होता। भगवान का विग्रह विशुद्ध 'सत्-चित्-आनंद' और उनकी अपनी 'योगमाया' से निर्मित होता है। जो सर्वेश्वर पूर्णकाम, आत्माराम और ब्रह्मांड का नियंता है, उसे किसी लौकिक जीव के साथ काम-भोग करने की क्या आवश्यकता? ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: रामचरितमानस (अयोध्या काण्ड) गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान के शरीर की दिव्यता का वर्णन करते हुए कहते हैं: चिदानन्दमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ (अर्थात्: हे प्रभु! आपका शरीर हाड़-मांस का नहीं, बल्कि विशुद्ध चित् (ज्ञान) और आनंदमय है। आपमें कोई भी प्राकृत विकार—काम, क्रोध, लोभ, वासना—नहीं है, इस सत्य को केवल अधिकारी (ज्ञानी और भक्त) ही जानते हैं।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (10.14.55) कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (अर्थात्: श्री शुकदेव जी कहते हैं—श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा (परमात्मा) जानो। वे जगत् के कल्याण के लिए अपनी योगमाया से केवल शरीर धारण किए हुए से 'प्रतीत' होते हैं, वास्तव में वे प्राकृत शरीर से सर्वथा परे हैं।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 2. निर्लेप और सर्वथा पवित्र नारायण (श्री सम्प्रदाय और पुराणों का मत) श्री सम्प्रदाय का सर्वोच्च और अकाट्य सिद्धांत है कि भगवान 'निखिल-हेय-प्रत्यनीक' हैं—अर्थात उनमें किसी भी प्रकार के हेय (नीच/प्राकृत) गुणों और दोषों का प्रवेश हो ही नहीं सकता। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: विष्णु पुराण (6.5.79) ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः। भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥ (अर्थात्: सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज—इन छह ऐश्वर्यों से जो पूर्णतः युक्त है और जिसमें 'हेय' (काम-वासना, छल, स्वार्थ आदि मलिन दोष) लेशमात्र भी नहीं हैं, वही 'भगवान' शब्द का वास्तविक अर्थ है।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: नारायण उपनिषद नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणः। (अर्थात्: नारायण ही भूत और भविष्य का सब कुछ हैं। वे सर्वथा निष्कलंक (कलंक-रहित), निरंजन (माया और वासना से सर्वथा अछूते), निर्विकल्प और पूर्णतः शुद्ध हैं।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 3. लीला का वास्तविक कारण: वृन्दा की कठोर तपस्या और ईश्वरीय वरदान मलिन बुद्धि वाले निंदक इस प्रसंग में केवल 'छल' देखते हैं, जबकि सत्य यह है कि माता वृन्दा (तुलसी) ने पूर्व जन्मों में भगवान श्रीहरि को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की थी। भगवान ने अपनी उसी परम भक्त को दर्शन देकर यह वरदान और आशीर्वाद दिया था कि, "मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में अवश्य स्वीकार करूँगा।" भगवान कभी अपने भक्तों का संकल्प और अपना वचन अधूरा नहीं छोड़ते। माता वृन्दा को दिए गए उसी वरदान की पूर्ति के लिए भगवान ने यह योगमाया-कृत लीला रची थी। 4. सतीत्व भंग का शास्त्रीय सिद्धांत: काम-क्रीड़ा नहीं, केवल 'आलिंगन मात्र' जिन लोगों का मस्तिष्क केवल लौकिक काम-वासना तक सीमित है, वे सोचते हैं कि सतीत्व भंग करने के लिए भगवान ने कोई प्राकृत शारीरिक कृत्य (काम-भोग) किया होगा। यह उनकी घोर अज्ञानता और अपनी ही मलिन वासना का ईश्वर पर आरोपण है। हमारे सनातन धर्मशास्त्रों का स्पष्ट सिद्धांत है कि किसी भी महान पतिव्रता स्त्री (सती) के लिए किसी 'पर-पुरुष' (दूसरे पुरुष) का केवल स्पर्श या आलिंगन मात्र ही उसका सतीत्व भंग करने के लिए पर्याप्त होता है। जब जालंधर अजेय हो गया, तब भगवान ने अपनी माया से जालंधर का रूप धरकर केवल वृन्दा का आलिंगन (स्पर्श) मात्र किया था। इसी पावन स्पर्श से एक ओर भक्त को दिए गए वरदान की पूर्ति हुई, और दूसरी ओर वह पातिव्रत्य धर्म खंडित हुआ जो जालंधर जैसे क्रूर असुर की रक्षा कर रहा था। भगवान, जो योगमाया से आच्छादित हैं, उन्होंने किसी भी प्रकार की काम-क्रीड़ा नहीं की। यह पूर्णतः विशुद्ध और निर्लेप कृत्य था। 5. निंदकों और अज्ञानियों को शास्त्रों की कड़ी फटकार जो लोग भगवान को साधारण मनुष्य समझकर उन पर अपनी काम-पिपासा थोपते हैं, उनके लिए शास्त्र अत्यंत कठोर चेतावनी देते हैं। श्रीमद्भागवत (10.33.29) में जब राजा परीक्षित ने भगवान की लीलाओं पर शंका की, तो श्री शुकदेव जी ने स्पष्ट उत्तर दिया: "तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।" (अर्थात: जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर और भक्षण करके भी सर्वथा पवित्र और निर्लेप रहती है, वैसे ही परमेश्वर किसी भी लौकिक कर्म से दूषित नहीं होते।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 9, श्लोक 11) अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। (अर्थात्: मूर्ख और अज्ञानी लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूपी 'परम भाव' (परम भगवद्-तत्त्व और योगमाया) को न जानते हुए, मनुष्य जैसा रूप धारण करने वाले मुझ परमात्मा को साधारण मनुष्य समझते हैं और मेरी निंदा करते हैं।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 प्रमाण: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 14) न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। (अर्थात्: कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न ही कर्मफलों में मेरी कोई स्पृहा (वासना) है। जो मनुष्य मुझे इस तत्त्व से जान लेता है, वह कर्म-बंधन में नहीं पड़ता।) ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 💡 निष्कर्ष भगवान श्रीहरि पर कामुकता या दुर्भावनापूर्ण छल का आरोप लगाना केवल सनातन विरोधियों और अज्ञानियों की बौद्धिक दरिद्रता का प्रमाण है। भगवान का श्रीविग्रह अप्राकृत, योगमाया-कृत और चिदानंदमय है। यह प्रसंग किसी असुर को हराने की कोई सांसारिक चाल या काम-भोग नहीं था, बल्कि अपनी 'त्रिपाद विभूति' में स्थित परम शुद्ध परमात्मा द्वारा अपनी एक परम भक्त (वृन्दा) की तपस्या को पूर्ण कर, उसे 'तुलसी' रूप में सदैव के लिए अपने शीश पर धारण करने की परम पावन और दिव्य लीला थी। भगवान ने अपनी भक्त के शाप को सहर्ष स्वीकार कर शालिग्राम रूप धारण किया और यह उद्घोष किया कि बिना तुलसी के उनका कोई भी भोग पूर्ण नहीं होगा। जो इस असीम वात्सल्य और भगवद्-तत्त्व को लौकिक वासना समझता है, वह केवल अपने ही पतन का मार्ग प्रशस्त करता है। 📚 विस्तृत संदर्भ: * श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कन्ध (भगवान के अप्राकृत श्रीविग्रह और निर्लेप लीलाओं का वर्णन) * रामचरितमानस: अयोध्या काण्ड (चिदानन्दमय देह का प्रमाण) * विष्णु पुराण: षष्ठ अंश (हेयगुण-रहित भगवान का पूर्ण स्वरूप) * नारायण उपनिषद: (परमात्मा की पूर्ण शुद्धता और निष्कलंकता) * श्रीमद्भगवद्गीता: (अध्याय 4 और 9: भगवद्-तत्त्व और अवतार का रहस्य) * ब्रह्मवैवर्त पुराण: (प्रकृति खण्ड: तुलसी जी की पूर्व जन्म की तपस्या और भगवद्-वरदान) * शिव पुराण / धर्मशास्त्र: (सतीत्व भंग का शास्त्रीय आधार - पर-पुरुष का स्पर्श और आलिंगन मात्र) 🙏श्रीमते नारायणाय नमः🙏 #SanatanDharma #LordVishnu #TulsiVivah #BhagavadGita #HinduPhilosophy #DivineLeela #SpiritualScience #SrimadBhagavatam 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- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी—ये श्रीराधा की अष्टसखियाँ अथवा परम-प्रेष्ठ सखियाँ कही जाती हैं। १. श्री ललिता सखी — प्रेम की प्रधान संचालिका ललिता सखी को अष्टसखियों में प्रधान माना जाता है। उनका स्वभाव तेजस्वी, स्पष्टवादी, साहसी और अत्यन्त प्रेमपूर्ण है। उज्ज्वलनीलमणि में उन्हें प्रखरा कहा गया है। उनका प्रेम श्रीराधा के प्रति इतना गहरा है कि वे आवश्यकता पड़ने पर श्रीकृष्ण को भी प्रेमपूर्वक उलाहना दे देती हैं। उनका उद्देश्य किसी पक्ष का सांसारिक समर्थन करना नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम को और अधिक मधुर बनाना है। उनकी प्रमुख सेवा में श्रीराधा-कृष्ण की प्रेम-लीला में सहायता करना और अनेक प्रकार की अंतरंग व्यवस्थाएँ करना माना जाता है। एक पूजा-परम्परा में उनकी सेवा ताम्बूल अर्पित करना बताई गई है। “जहाँ श्रीराधा का मान है, वहाँ ललिता जी की प्रेममयी दृढ़ता है।” २. श्री विशाखा सखी — प्रेम-संदेश और चातुर्य की मूर्ति विशाखा जी को श्रीराधा के समान आयु, गुण और रूप की अत्यन्त निकट सखी बताया गया है। वे अत्यन्त बुद्धिमती, चतुर और परिस्थिति के अनुसार प्रेम-व्यवहार करने में कुशल हैं। राधा-कृष्ण के बीच संदेश पहुँचाना, उचित समय पर मिलन की व्यवस्था करना और प्रेम के सूक्ष्म भावों को समझना उनकी प्रमुख भूमिकाओं में माना जाता है। एक वैष्णव पूजा-विधान में उनकी सेवा चन्दन अर्पित करना बताई गई है। “ललिता जहाँ प्रेम की दृढ़ता हैं, विशाखा वहीं प्रेम की सूक्ष्म बुद्धि हैं।” ३. श्री चम्पकलता सखी — सेवा, पाक-कला और विनोद चम्पकलता जी का नाम ही चम्पक-पुष्प की सुगन्ध और कोमलता का स्मरण कराता है। वे सेवा-कुशल और व्यवहार-कुशल सखी मानी जाती हैं। विभिन्न परम्परागत वर्णनों में उन्हें वन से फल-फूल आदि एकत्र करने तथा श्रीराधा-कृष्ण के लिए विविध प्रकार के व्यंजन तैयार करने में निपुण बताया गया है। उनकी विशेषता यह है कि वे केवल वस्तुएँ उपलब्ध नहीं करातीं—प्रेम से की गई छोटी-से-छोटी सेवा को भी मधुर बना देती हैं। एक पूजा-विधान में उनकी सेवा चँवर (चामर) सेवा बताई गई है। “भक्ति में प्रेम हो तो साधारण सेवा भी दिव्य बन जाती है—चम्पकलता इसका सुंदर उदाहरण हैं।” ४. श्री चित्रा सखी — कला और सौन्दर्य की विशेषज्ञ चित्रा सखी का व्यक्तित्व कला, सौन्दर्य और सूक्ष्म निरीक्षण से जुड़ा हुआ माना जाता है। परम्परागत वर्णनों में उन्हें अनेक कलाओं, सज्जा, उद्यान-विन्यास तथा संगीत आदि में निपुण बताया गया है। उज्ज्वलनीलमणि के वर्णन में चित्रा को कोमल स्वभाव की दक्षिणा सखी कहा गया है। उनकी सेवा में श्रीराधा-कृष्ण के वस्त्र एवं श्रृंगार की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। “प्रेम जब सौन्दर्य को छूता है, तब वह चित्रा सखी की कला बन जाता है।” ५. श्री तुंगविद्या सखी — संगीत और विद्याओं की अधिष्ठात्री तुंगविद्या जी विद्या, संगीत, नृत्य और कलाओं में अत्यन्त निपुण मानी जाती हैं। वे गायन, वादन और विभिन्न कलाओं के माध्यम से श्रीराधा-कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं। एक परम्परागत पूजा-विधान में उनकी सेवा संगीत अर्पित करना बताई गई है। उज्ज्वलनीलमणि के वर्णन में उन्हें दक्षिणा और प्रखरा कहा गया है तथा उनके वस्त्रों का वर्णन श्वेत रूप में मिलता है। “जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ तुंगविद्या की वीणा प्रेम को बोलने लगती है।” ६. श्री इन्दुलेखा सखी — सौन्दर्य, सज्जा और तीव्र प्रेमभाव इन्दुलेखा जी को अत्यन्त चतुर, तीक्ष्ण बुद्धि वाली और प्रेम-व्यवहार में कुशल सखी माना जाता है। उनका स्वभाव अपेक्षाकृत प्रखर है। उज्ज्वलनीलमणि में उन्हें वाम और प्रखरा भाव वाली सखी के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी सेवा में श्रीराधा-कृष्ण के वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार से संबंधित कार्यों का वर्णन मिलता है; एक परम्परा में नृत्य-सेवा का भी उल्लेख है। “इन्दुलेखा जी की सेवा में प्रेम के साथ चतुराई और तत्परता का अद्भुत मेल है।” ७. श्री रंगदेवी सखी — हास्य, सुगन्ध और उल्लास रंगदेवी जी का व्यक्तित्व उत्साह, हास्य-विनोद और चपलता से युक्त माना जाता है। वे श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम-विहार में वातावरण को उल्लासमय बनाने वाली सखियों में मानी जाती हैं। उनके विषय में सुगन्ध, श्रृंगार तथा चँवर आदि सेवाओं का उल्लेख मिलता है। उज्ज्वलनीलमणि में रंगदेवी को भी वाम और प्रखरा भाव वाली सखी कहा गया है। “रंगदेवी के आने से प्रेम-लीला में हास्य, उल्लास और सुगन्ध का रंग भर जाता है।” ८. श्री सुदेवी सखी — कोमल सेवा और प्रकृति-संरक्षण सुदेवी जी को रंगदेवी की निकट सम्बन्धिनी/बहन के रूप में वर्णित किया जाता है। उनका स्वभाव मधुर और सेवा-प्रधान है। उनकी प्रमुख सेवाओं में श्रीराधा-कृष्ण के लिए जल की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। उनका सम्बन्ध ब्रज की प्रकृति, पशु-पक्षियों और वातावरण की देखभाल जैसी सेवाओं से भी जोड़ा जाता है। “सुदेवी की सेवा हमें सिखाती है कि प्रेम केवल भाव नहीं—निरन्तर देखभाल भी है।” अष्टसखियों का सबसे रहस्य: अष्टसखियों को केवल आठ अलग-अलग व्यक्तित्व समझना पर्याप्त नहीं है। गौड़ीय वैष्णव दर्शन में वे श्रीराधा के प्रेम-स्वरूप और उनकी अंतरंग सेवा-शक्ति से संबंधित दिव्य पार्षद मानी जाती हैं। श्रीचैतन्य-चरितामृत में भी राधारानी के विभिन्न अंतरंग रूपों/सहचरियों में ललिता, विशाखा आदि का उल्लेख मिलता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनका अपना सुख श्रीराधा-कृष्ण के सुख में ही है। वे अपने लिए कुछ नहीं चाहतीं; उनका जीवन ही युगल सरकार की प्रसन्नता है। यही कारण है कि उन्हें परम-प्रेष्ठ सखी कहा जाता है। अष्टसखियों की आठ सेवाओं को सरलता से ऐसे समझें: सखी प्रमुख भाव/सेवा: ललिता। नेतृत्व, प्रेम की दृढ़ता, ताम्बूल सेवा विशाखा चातुर्य, संदेश-व्यवस्था, चन्दन सेवा चम्पकलता सेवा-कुशलता, फल-फूल एवं भोजन की व्यवस्था चित्रा। कला, सज्जा और वस्त्र-व्यवस्था तुंगविद्या संगीत, गायन, वादन और विद्या इन्दुलेखा श्रृंगार, सज्जा और चतुर सेवा रंगदेवी हास्य-विनोद, सुगन्ध एवं उल्लास सुदेवी जल-सेवा, प्रकृति एवं देखभाल इन सेवाओं के विवरण अलग-अलग वैष्णव ग्रन्थों और परम्पराओं में कुछ भिन्न मिल सकते हैं; इसलिए ऊपर का विवरण मुख्यतः गौड़ीय वैष्णव परम्परा के अनुसार है। अष्टसखियों की सूची भी विभिन्न वैष्णव परम्पराओं में कभी-कभी अलग मिलती है। और एक अत्यन्त सुंदर बात—श्रीराधाकुण्ड के चारों ओर इन अष्टसखियों के नाम से आठ दिव्य कुञ्जों का वर्णन मिलता है, जिनमें प्रत्येक सखी की अपनी सेवा और भाव की विशिष्टता मानी जाती है। श्रीश्री अष्टसखी प्रणाम:: कारुण्य कल्पलतिके! ललिते नमस्ते। राधा-समान-गुणचातुरिके! विशाखे।। त्वां नैमि चम्पकलतेऽच्युत चित्त-चौरे। वन्दे विचित्र चरिते! सखि! चित्रलेखे।। श्रीरंग देवि! दयिते! प्रणयाग्ररंगे। तुभ्यं नमोऽस्तु सुखदे! दयिते सुदेवि।। विद्याविनोद-सदनेऽपि च तुंगविद्यो। पूर्णेन्दु खण्ड नखरे सुमुखीन्दुलेखे।। भावार्थ हे कारुण्य की कल्पलता, श्रीमती ललिता देवी! तुम्हें नमस्कार है। हे राधा के समान गुणों और चतुराई से सम्पन्न विशाखा देवी! तुम्हें प्रणाम है। हे श्रीकृष्ण के चित्त को चुरा लेने वाली चम्पकलता! मैं तुम्हें नमन करता हूँ। हे विचित्र चरित्र वाली सखी चित्रलेखे! मैं तुम्हें वन्दन करता हूँ। हे श्रीरंग देवी! हे श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम-रंग में रंगी हुई देवी! तुम्हें प्रणाम है। #🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #👏भगवान विष्णु😇 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🤗जया किशोरी जी🕉️ हे सुख प्रदान करने वाली सुदेवी! तुम्हें नमस्कार है। हे विद्या और विनोद की धाम तुङ्गविद्या देवी! तुम्हें नमन है। हे पूर्णचन्द्र के खण्ड के समान सुन्दर नखों वाली, सुन्दर मुख वाली इन्दुलेखा देवी! तुम्हें प्रणाम है। ~राधे राधे ~ #sanatandharma #nonfollowersviewers #babitasrivastava #krishnaconsciousness #vrindavan #krishna #radheradhe #ashtsakhiyan2115
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