sn vyas
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#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕 श्री कृष्ण, माया देवी (दुर्गा जी), और माया के जाल में फंसे तथा मुक्त होते हुए मनुष्य (जीवात्माएं)। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरी यह त्रिगुणमयी (सत्त्व, रज और तमोगुण से युक्त) अलौकिक माया अत्यंत शक्तिशाली और मोह पैदा करने वाली है। सामान्य मनुष्य के लिए अपने बल पर इस माया के जाल से निकलना असंभव है। लेकिन जो लोग अहंकार और भ्रम को छोड़कर केवल मेरी (भगवान की) शरण में आ जाते हैं, वे इस कठिन माया-सागर को आसानी से पार कर जाते हैं! भक्तिभाव: अहंकार का त्याग: मनुष्य अपनी बुद्धि, बल और ज्ञान के घमंड में माया को नहीं जीत सकता। जब तक जीव 'मैं और मेरा' करता है, वह उलझा रहता है।अनन्य शरणगति: भगवान यह नहीं कहते कि कठिन साधना करो; वे कहते हैं—"मामेव ये प्रपद्यन्ते" (केवल मेरी शरण हो जाओ)। सच्ची भक्ति यही है कि सब कुछ भगवान को समर्पित कर, उन्हीं का आश्रय लिया जाए।कृपा का अनुभव: माया भगवान की ही शक्ति है, इसलिए उसे भगवान की कृपा बिना कोई नहीं हरा सकता। भक्त जब शरणागत होता है, तब भगवान अपनी योगमाया से उसके सारे बंधनों को काट देते हैं और उसे पार लगा देते हैं। 🙏🌹🌻!!जय श्री कृष्ण!!🌻🌹🙏
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