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#🌐 राष्ट्रीय अपडेट #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🆕 ताजा अपडेट अयोध्या में राम मंदिर के करीब 500 साल के इतिहास में पहली बार विराजमान रामलला अपने महल से निकलकर कुबेर टीला पर झूला विहार के लिए पहुंचे। इस ऐतिहासिक अवसर पर रामलला तीनों अनुजों के साथ झूले पर विराजमान हुए। संतों और श्रद्धालुओं ने भगवान को झूला झुलाया तो भावुक होकर उनकी आंखें नम हो गईं।
झूलनोत्सव के दौरान शास्त्रीय संगीतज्ञों ने मधुर स्वर, अलाप और भजनों से ऐसा माहौल बनाया कि मौजूद श्रद्धालु भक्ति में झूम उठे। इस आयोजन की खास बात यह रही कि मधुर उपासना परंपरा के आचार्यों द्वारा रचे गए अधिकांश पद भगवान श्रीसीताराम की युगल उपासना को केंद्र में रखकर प्रस्तुत किए गए।
श्रीराम जन्मभूमि परिसर में रामलला के तीनों अनुजों के साथ झूले पर विराजमान होने के इस अवसर के लिए विशेष पदों का चयन किया गया था। इन पदों को खोजकर और छांटकर तैयार किया गया। हनुमत निवास के महंत आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने भी पदों में आवश्यक संशोधन कराकर उनका गायन कराया।
संगीतज्ञ सुमधुर शास्त्री के निर्देशन में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में आचार्य राधेश्याम दास, पंडित राम विनोद शरण व्यास और विवेकानंद पाण्डेय ने गायन किया। मृदंग पर पंडित अभयराम दास और वैभव राम दास तथा तबले पर राम प्रिया शरण ने संगत की। शास्त्रीय संगीत और भक्ति पदों की प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
इस ऐतिहासिक झूलनोत्सव के साक्षी राम मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी और निर्मोही अखाड़ा महंत दिनेंद्र, अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन, आमंत्रित सदस्य एवं मणिराम छावनी के महंत कमलनयन दास, राम कथा कुंज के महंत सत्यनारायण दास और श्रीराम वल्लभा कुंज के अधिकारी स्वामी राजकुमार दास समेत कई संत और पदाधिकारी बने।
आयोजन में व्यवस्थापक आचार्य इंद्रदेव मिश्र, आशीष अग्निहोत्री समेत अन्य लोग भी मौजूद रहे। सभी ने रामलला को झूला झुलाने और इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने का अवसर प्राप्त किया।
झूलनोत्सव के दौरान ‘आली थी, राघव जी के रुचिर हिंडोला’, ‘कौशलपुरी सुहावनी, सरि सरयू तीर’, ‘झूलत नवल दशरथ लाल’, ‘सरयू तीर प्रमोद बन में लिए संग सखा बाल’, ‘झूलत नवल हिंडोरे’ और ‘प्रिय प्यारे संग बनी ठनी रामा’ जैसे पदों का गायन किया गया।
रामलला के महल से निकलकर कुबेर टीला पर झूला विहार करने का यह अवसर अयोध्या के धार्मिक इतिहास में विशेष माना जा रहा है। संतों और श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन भक्ति, संगीत और परंपरा का अनूठा संगम बन गया।
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