sn vyas
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱हर हर महादेव #🔱शिवपुराण कथा📖 शिव पुराण की रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में महर्षि मार्कंडेय की अनन्य साधना और जल की अनुपलब्धता में केवल 'अग्नि की लपटों' को भस्म रूप देकर शिव-अर्चन करने की यह अत्यंत पावन और दुर्लभ कथा आती है। 1. महाप्रलय के समय मार्कंडेय की तपस्या प्राचीन काल में जब कल्प का अंत हुआ और संपूर्ण पृथ्वी प्रलय के घोर अंधकार से घिरने लगी, तब महर्षि मार्कंडेय एक वटवृक्ष के नीचे भगवान शिव के ध्यान में लीन थे। प्रलय के वेग से न तो वहाँ जल शेष बचा था और न ही पार्थिव (मिट्टी) शिवलिंग बनाने हेतु पवित्र भूमि। चारों ओर केवल प्रचंड प्रलयाग्नि और गर्जना करती हुई वायु का वेग था। 2. अग्नि-शिखा में शिव-भावना मुनि मार्कंडेय के सामने नियम-पालन का बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया। उन्होंने बिना शिव-पूजा किए जल का एक कण भी ग्रहण न करने का संकल्प लिया था। जब उन्हें शिवलिंग बनाने के लिए मिट्टी या बालू नहीं मिली, तो उन्होंने सामने जल रही प्रलयाग्नि की शिखाओं (लपटों) को ही साक्षात 'अग्नि-लिंग' मान लिया। उन्होंने अपनी आँखों से बहते अश्रुओं और हवा में उड़ती भस्म को मिलाकर उस अग्नि-शिखा पर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करते हुए मानस-अभिषेक किया। 3. साक्षात 'अग्निश्वर' महादेव का प्राकट्य मुनि के इस अद्भुत भाव-बल को देखकर उस जलती हुई अग्नि-शिखा के मध्य से साक्षात भगवान शिव प्रकट हो गए। महादेव के प्राकट्य होते ही प्रलयाग्नि की प्रचंड दाह-शक्ति तुरंत परम शीतल चंदन के समान शांत हो गई। भगवान शिव ने महर्षि मार्कंडेय का हाथ पकड़कर कहा: "हे मार्कंडेय! संसार के लोग पूजा के लिए बाहरी सामग्रियों पर निर्भर रहते हैं, किंतु तुमने प्रलय की अग्नि को भी अपने भाव से मेरा स्वरूप बना दिया। तुम्हारी इस अनन्य निष्ठा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।" 4. 'महामृत्युंजय' सिद्धि और अमरत्व भगवान शिव ने महर्षि मार्कंडेय को अल्पायु (16 वर्ष) के विधान से सर्वथा मुक्त करके कल्पों तक जीवित रहने का 'अमरत्व' प्रदान किया और उन्हें महामृत्युंजय विद्या का पूर्ण आचार्य बनाया। महादेव के आदेश से वह अग्नि-शिखा वहीं 'अग्निश्वर लिंग' के रूप में स्थापित हो गई। 💡 कथा का आध्यात्मिक संदेश यह कथा सिखाती है कि जब साधक के मन में सच्चा भाव और अटल संकल्प होता है, तो विषम से विषम परिस्थिति और विनाशकारी तत्व (अग्नि/प्रलय) भी ईश्वर-प्राप्ति का साधन बन जाते हैं।
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