sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३७
जितनी स्वतंत्रता उतनी जिम्मेदारी
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स्वतंत्रता दो मुखी नहीं है। आप क्रियमाण कर्म करने में स्वतंत्र हो और उसकी जिम्मेदारी लेने से मुक्त हो , यह दो तरीके नहीं हो सकते । यदि आप कर्म करने में पूर्ण रुप से स्वतंत्र हैं, तो उसके फल-- परिणाम भोगने के लिए भी उतने ही परतंत्र है , इसका आपको ज्ञान होना चाहिए।
*इसलिए भगवान ने गीता में स्पष्टता की है कि--*
*" कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् "*
*साथ ही साथ यह स्पष्ट कर दिया है कि आप जो कर्म करते हैं उनमें मेरी किसी भी प्रकार की कोई जिम्मेदारी या भागीदारी नहीं है ।*
*आप कर्म करने में पूर्णतया स्वतंत्र हैं , किंतु उसका जो परिणाम आएगा , उसका बंधन तो आप को स्वीकार करना ही पड़ेगा । आप पाप करें और दुख भोगे, भगवान क्यों भोगे ? आप पुन्य करें और सुख भोगे, भगवान को आपके द्वारा किए गए पुण्य का फल नहीं चाहिए , उनके पास उनका अपना अपरिगण्य पुण्य स्टॉक में है ।*
*आप हत्या करें और आपके पिता को फांसी हो , यह न्याय नहीं हो सकता ।भीमसेन खाए और मामा शकुनि को दस्त हो जाए , यह न्याय शायद कौरवों के राज्य में होगा , किन्तु परमात्मा के राज्य में नहीं ।*
*कर्म मात्र बंधन है , यह आपको ठीक से समझ लेना चाहिए । कर्म करने से पहले कैसा कर्म करना है , इसका निर्णय लेने के लिए आप पूर्णता स्वतंत्र है।*
*एक बार कर्म करने के बाद उसका जो भी परिणाम आएगा, वह आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा।*
*इसलिए गीता में भगवान ने स्पष्ट आज्ञा दी है कि--*
*1 कर्मणि एव अधिकारस्ते।*
*अर्थात कर्म पर ही तेरा अधिकार है अर्थात तू कर्म करने के लिए स्वतंत्र है किंतु--*
*2 मा फलेषु कदाचन्*
*फल पर तेरा कोई अधिकार नहीं है , अर्थात फल भोगने के लिए तू परतंत्र है।*
*और तीसरी आज्ञा सुनो*
*मा कर्मफल हेतु भु:।*
*अर्थात फल मिले तो ही कर्म करूं, इस भावना से कर्म मत करो।*
क्रमश: ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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