sn vyas
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क्या आपने कभी सोचा है कि द्वापर युग में जब महाभारत का युद्ध हुआ, तब श्री कृष्ण की आयु इतनी अधिक होने के बावजूद उनके चेहरे पर वही दिव्य तेज और युवावस्था कैसे बनी रही? जिस श्री कृष्ण ने बचपन में कंस का वध किया, वही कृष्ण वर्षों बाद कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के सारथी बने, लेकिन उनके स्वरूप में वृद्धावस्था का कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता था। और सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि यदि श्री कृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के पूर्णावतार थे, तो फिर उनका अंत एक साधारण शिकारी के बाण से कैसे हुआ? क्या वह वास्तव में मृत्यु थी, या फिर उसके पीछे कोई ऐसी दिव्य लीला छिपी थी, जिसे समझे बिना श्री कृष्ण की अंतिम यात्रा को समझ पाना संभव नहीं? इस रहस्य को जानने के लिए हमें द्वापर युग के उस समय में लौटना होगा, जब श्री कृष्ण ने मथुरा में अपने अत्याचारी मामा कंस का वध किया था।
कंस का वध करने के समय श्री कृष्ण की आयु को लेकर अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, इसलिए इस विषय को एक निश्चित ऐतिहासिक उम्र के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक कथाओं के रूप में समझना चाहिए। लेकिन श्री कृष्ण के जीवन की एक बात हर कथा में विशेष दिखाई देती है—उनका दिव्य तेज और आकर्षण समय के साथ कम नहीं हुआ। बाल्यकाल की उनकी लीलाओं से लेकर द्वारका के राजा और महाभारत के मार्गदर्शक बनने तक, उनका स्वरूप हमेशा असाधारण दिखाई देता है। यही कारण है कि भक्त मानते हैं कि श्री कृष्ण का शरीर सामान्य मनुष्य जैसा नहीं था। वह मानव रूप में अवश्य थे, लेकिन उनके भीतर वही परम चेतना थी, जिसे वैष्णव परंपरा भगवान नारायण का स्वरूप मानती है।
श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा ऋषि दुर्वासा से भी जुड़ी है। ऋषि दुर्वासा अपने कठोर स्वभाव और तीव्र तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। धार्मिक परंपराओं में उन्हें ऐसा ऋषि माना गया है, जिनकी वाणी अत्यंत प्रभावशाली थी। एक बार वे श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी के पास पहुंचे। श्री कृष्ण और रुक्मिणी ने उनका अत्यंत सम्मान किया और उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा ने उनकी परीक्षा लेने के लिए कई ऐसी आज्ञाएं दीं, जिन्हें सामान्य मनुष्य के लिए पूरा करना आसान नहीं था, लेकिन श्री कृष्ण और रुक्मिणी ने बिना किसी शिकायत के उनकी हर आज्ञा का पालन किया। इसी प्रसंग से जुड़ी एक कथा में खीर का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार ऋषि ने श्री कृष्ण और रुक्मिणी से कहा कि खीर तैयार करके उसे श्री कृष्ण के शरीर पर लगाया जाए। यह बात सुनने में जितनी विचित्र लगती है, उस परीक्षा का उद्देश्य भी उतना ही गहरा बताया जाता है।
कथा के अनुसार श्री कृष्ण के शरीर पर खीर लगाई गई, लेकिन उनके पैरों के तलवे का एक हिस्सा उससे अछूता रह गया। धार्मिक परंपरा में आगे कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर श्री कृष्ण को आशीर्वाद दिया कि जिन-जिन स्थानों पर खीर लगी है, वे अत्यंत कठोर और अभेद्य हो जाएंगे। लेकिन उनके पैरों का वह हिस्सा, जिस पर खीर नहीं लगी थी, उनके शरीर का कमजोर स्थान बना रहेगा। यही प्रसंग आगे चलकर श्री कृष्ण की अंतिम लीला से जोड़ा जाता है। हालांकि अलग-अलग पुराणों और परंपराओं में इस कथा के विवरण अलग मिलते हैं, इसलिए इसे धार्मिक आख्यान के रूप में ही समझना उचित है।
समय बीतता गया। श्री कृष्ण ने द्वारका में अपना जीवन बिताया। उन्होंने पांडवों का मार्गदर्शन किया, अर्जुन को धर्म और कर्म का ज्ञान दिया और कुरुक्षेत्र के युद्ध में ऐसी भूमिका निभाई, जिसने पूरे भारत के इतिहास और धार्मिक परंपरा को बदल दिया। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद भी श्री कृष्ण की लीला समाप्त नहीं हुई थी। यदुवंश के भीतर धीरे-धीरे विनाश के बीज उभरने लगे। गांधारी के श्राप की कथा भी इसी अंतिम कालखंड से जुड़ी है। अपने पुत्रों के विनाश के बाद गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार कुरुवंश का विनाश हुआ, उसी प्रकार समय आने पर यादव वंश का भी अंत होगा। श्री कृष्ण जानते थे कि समय का चक्र अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। उन्होंने उस श्राप का विरोध नहीं किया, क्योंकि उनकी लीला का अंतिम चरण आरंभ हो चुका था।
समुद्र के किनारे प्रभास क्षेत्र में यादव वंश के भीतर भयंकर संघर्ष हुआ और धीरे-धीरे पूरा यादव कुल विनाश की ओर चला गया। श्री कृष्ण भी इस संसार से अपनी लीला समेटने के लिए एक शांत स्थान की ओर चले गए। कहा जाता है कि वे एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे। उसी समय जरा नाम का एक शिकारी वहां से गुजरा। दूर से उसे श्री कृष्ण का पैर किसी हिरण के शरीर के हिस्से जैसा दिखाई दिया। उसने अपने धनुष से बाण चलाया और वह बाण श्री कृष्ण के पैर में जाकर लगा। जब जरा को अपनी भूल का पता चला, तो वह भयभीत होकर श्री कृष्ण के पास पहुंचा और क्षमा मांगने लगा। लेकिन श्री कृष्ण ने उसे दोष नहीं दिया। उन्होंने उसे सांत्वना दी और बताया कि यह सब भी समय की उसी लीला का हिस्सा है।
यहीं से श्री कृष्ण की अंतिम लीला का सबसे गहरा रहस्य सामने आता है। यदि हम उन्हें केवल एक सामान्य मनुष्य मानें, तो यह घटना एक साधारण मृत्यु जैसी दिखाई दे सकती है। लेकिन भक्त परंपरा में इसे मृत्यु नहीं, बल्कि भगवान के मानव रूप से वापस अपने दिव्य स्वरूप में लौटने की लीला माना गया है। जैसे कोई कलाकार किसी भूमिका को निभाने के बाद मंच से उतर जाता है, वैसे ही श्री कृष्ण ने भी अपने मानव रूप की लीला पूरी करके उसे त्याग दिया। उनका उद्देश्य संसार में अनंत समय तक मानव शरीर में रहना नहीं था। उनका अवतार एक विशेष उद्देश्य के लिए था और जब वह उद्देश्य पूरा हुआ, तब उन्होंने अपने अवतार का समापन किया।
श्री कृष्ण की युवावस्था का रहस्य भी इसी दृष्टि से समझा जाता है। भक्त मानते हैं कि उनका स्वरूप साधारण मनुष्यों की तरह समय के साथ वृद्ध नहीं होता था, क्योंकि वह दिव्य स्वरूप था। उनका शरीर मनुष्य जैसा दिखाई देता था, लेकिन उनके भीतर परमात्मा का स्वरूप माना जाता था। यही कारण है कि श्री कृष्ण की मूर्तियों और चित्रों में उन्हें सदैव दिव्य और युवा स्वरूप में दिखाया जाता है। यह केवल सुंदरता का वर्णन नहीं, बल्कि उनके अविनाशी और सनातन स्वरूप का प्रतीक है। वह शरीर लेकर पृथ्वी पर आए, लेकिन भक्तों के लिए उनका वास्तविक स्वरूप शरीर से कहीं ऊपर था।
और अब उस बाण की ओर लौटते हैं, जिसने श्री कृष्ण के पैर को स्पर्श किया था। धार्मिक कथा के अनुसार ऋषि दुर्वासा से जुड़े प्रसंग में उनके पैरों का वही हिस्सा कमजोर बताया गया था। इसलिए जरा का बाण उसी स्थान पर लगना केवल संयोग नहीं माना जाता, बल्कि इसे श्री कृष्ण की लीला का हिस्सा माना गया। वहीं दूसरी ओर गांधारी का श्राप भी यादव वंश के विनाश से जुड़ा था। इन दोनों कथाओं को साथ रखकर देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्री कृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान की घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि श्री कृष्ण किसी साधारण शक्ति से पराजित हो गए थे। धार्मिक दृष्टि से तो यह उनकी अपनी इच्छा से लीला समाप्त करने का प्रसंग है।
श्री कृष्ण के प्रस्थान के बाद उनका शरीर भी सामान्य मनुष्य की तरह नहीं समझा गया। अनेक धार्मिक परंपराएं मानती हैं कि श्री कृष्ण ने अपना दिव्य स्वरूप धारण किया और वैकुंठ लौट गए। यही कारण है कि उनके जीवन की अंतिम घटना को भक्त मृत्यु कहने के बजाय देह त्याग या दिव्य प्रस्थान कहते हैं। जिस कृष्ण ने कंस के अत्याचार का अंत किया, जिस कृष्ण ने पांडवों को धर्म का मार्ग दिखाया, जिस कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान दिया और जिस कृष्ण ने अधर्म के सामने खड़े होकर धर्म की स्थापना में भूमिका निभाई, उनके लिए एक शिकारी का बाण अंत नहीं था। वह तो उनकी पृथ्वी पर निभाई गई लीला का अंतिम अध्याय था।
शायद यही श्री कृष्ण के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। संसार उनकी उम्र गिनता रहा, लेकिन भक्त उनके भीतर की दिव्यता देखते रहे। संसार उनके शरीर को देखता रहा, लेकिन भक्त उनके भीतर नारायण के दर्शन करते रहे। संसार ने जरा के बाण को देखा, लेकिन भक्तों ने उसके पीछे छिपी हुई उस लीला को देखा, जिसमें भगवान स्वयं अपने अवतार का पटाक्षेप करते हैं। इसलिए श्री कृष्ण की कहानी हमें यह सिखाती है कि दिव्यता को केवल शरीर से नहीं समझा जा सकता। शरीर समय के साथ बदलता है, लेकिन आत्मा और परम सत्य को समय की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता।
आज भी जब हम श्री कृष्ण का नाम लेते हैं, तो हमारे सामने उनका वही मुस्कुराता हुआ चेहरा आता है, हाथों में बांसुरी, सिर पर मोरपंख और आंखों में असीम करुणा। वह स्वरूप किसी एक उम्र का नहीं है। वह बालकृष्ण भी हैं, गोपाल भी हैं, द्वारकाधीश भी हैं और अर्जुन के सारथी भी। उनकी पूरी लीला हमें यही बताती है कि भगवान जब पृथ्वी पर आते हैं तो मनुष्य के रूप में दिखाई जरूर देते हैं, लेकिन उनकी लीला मनुष्य की सीमाओं से कहीं आगे होती है। और शायद इसी कारण श्री कृष्ण की कथा हजारों वर्षों बाद भी उतनी ही जीवंत है। उनकी उम्र समाप्त हुई, उनका मानव शरीर समाप्त हुआ, लेकिन उनका नाम, उनका संदेश और उनकी भक्ति आज भी करोड़ों हृदयों में जीवित है। अगर आप भी श्री कृष्ण को केवल एक देवता नहीं, बल्कि अपने जीवन के मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं, तो मन से एक बार कहिए—राधे राधे, जय श्री कृष्ण।
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