sn vyas
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#श्रीमानसजी_में_भेदभक्ति03
🎄भाग -३🎄
🪷श्रीशरभंग जी🪷
श्री शरभंगजी तभी से दिन-रात बाट जोह रहे थे। अब आज प्रभु का दर्शन पाकर हृदय शीतल हो गया। हे नाथ! मैं सर्वसाधनहीन दीन हूँ। हे जनों के मन को चुरानेवाले! आपने अपने प्रणतपाल विरद को पालन करने के लिये ही इस जन (दास) पर कृपा की है। अब थोड़ी देर आप ठहर जायँ, जिससे कि मैं आपमें लीन होकर सायुज्यमुक्ति को प्राप्त हो जाऊँ । श्रीशरभंगजी ब्रह्मविद् योगिराज थे और योग की सिद्ध-दशा को प्राप्त होकर आप सायुज्य-मुक्ति (ब्रह्म में लीन होने)- की तैयारी में थे। इसी से विरिंचिलोक (ब्रह्मधाम) जा रहे थे।
श्रीशरभंगजी इसी सायुज्य-मुक्ति के अधिकारी थे और इसीकी प्राप्ति के लिये भगवान् श्रीरामचन्द्रजी को ठहराकर लीन हो जानेपर तत्पर थे। परन्तु जब उस सगुण स्वरूप की रूपमाधुरी की अनुपम छटाने अपना प्रभाव डालकर योगिराज, ब्रह्मज्ञानी श्रीशरभंगजी के हृदय में ऐसी स्फुरणा उत्पन्न कर दी जैसा कि श्रीमद्भागवतजी में भगवान् कपिलदेवजी ने कहा है कि-
*सालोक्यसाष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत !*
*दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः !!* (३/२९/१३)
ऐसे निष्काम भक्त, दिये जाने पर भी, मेरी सेवा को छोड़कर *सालोक्य* (भगवान् के नित्यधाम में निवास), *सार्ष्टि* (भगवान् के समान ऐश्वर्यभोग), *सामीप्य* (भगवान् की नित्य समीपता), *सारूप्य* (भगवान् का-सा रूप) और *सायुज्य* (ब्रह्मरूप प्राप्त कर लेना) मोक्ष तक नही लेते।
उसी सर्वोच्च परम लाभ के विचार से चतुरशिरोमणि श्रीशरभंगजी ने सायुज्य-मुक्ति (लीन होने) के बदले *'भेदभगति'* के वर को प्राप्त किया। यथा- *जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा ॥*
*ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ ॥*
इसका कारण यह है कि-
*जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥*
*तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥*
*अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥* (७/११८ ख/३-४)
तात्पर्य यह कि इस जीव को जब नित्यलोक श्रीपादविभूति में नित्यकैंकर्य प्राप्त होता है तो सायुज्य आदि चारों मुक्तियों का सुख तो अपने-आप उसके पासँग में ही मिलता रहता है। उस दिव्यधाम में रहकर ही भक्ति (सेवा) प्राप्त है, अतः सालोक्यमुक्ति का सुख हुआ। सेवा समीप रहकर होती है अतः सामीप्यमुक्ति का सुख हुआ, भगवत्पार्षद सब चतुर्भुज भगवान् के ही स्वरूपानुरूप रहकर सेवा करते हैं अतः सारूप्यमुक्ति का सुख हुआ और बिना स्पर्श के सेवा कैसे हो? अतः सायुज्यमुक्ति का सुख मिला। इस प्रकार नित्यभक्तिवाले को चारों मोक्षों का सुख भी प्राप्त है एवं नित्यधाम से पुनरावृत्ति का तो भय है ही नहीं। श्रीभगवान् की सेवा जो चारों प्रकार से मुक्त जीवों को भी दुर्लभ है, भेदभगति वालों को अधिक मिल रही है। ऐसा विचारकर जो *'परम सयाने'* जन हैं वे मुक्तियों को न चाह (निरादर) कर भक्ति के लिये ही लुभाते हैं। यही श्रीशरभंगजी ने किया।
क्रमशः......
*🙏🏻जय जय सियाराम🙏🏻*
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