sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_४८/०१ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 प्रत्येक कर्म क्रिया है , किंतु प्रत्येक क्रिया कर्म नहीं होती है: क्रिया और कर्म , इन दो शब्दों का भेद समझने योग्य है। शारीरिक क्रिया दिखाई देती है , किंतु मानसिक क्रिया दिखाई नहीं देती है । *(1) केवल शारीरिक क्रिया* *(2) केवल मानसिक क्रिया* *(3) मानसिक क्रिया व शारीरिक क्रिया* *(1) केवल शारीरिक क्रिया:* *शारीरिक क्रिया दो प्रकार की होती है* *1-- अनैच्छिक क्रिया,* *2-- ऐच्छिक क्रियाऐ* *अनेक शारीरिक क्रियाएं इच्छा न होने पर भी होती है। उन्हें अनैच्छिक क्रियाएं कहते हैं ,,, उदाहरणार्थ--- आप सांस लेते हैं , आपका दिल धड़कता है , आप की नसों नाडियों में रक्त का संचार होता है , आपके पेट में पाचन क्रिया होती है । आपकी आंखों की पलकें झपकती है ,आदि। यह सब क्रियाएं आपकी इच्छा न होने के बावजूद लगातार होती रहती हैं । इन्हें आप रोक नहीं सकते और अगर रोकने का प्रयास किया तो आप मर जाएंगे।* *कुछ क्रियाऐ शरीर आपकी इच्छा से करता है । उसे ऐच्छिक क्रियाऐ कहते हैं। उदाहरणार्थ --- आप हाथ ऊंचा नीचा करते हैं , पैर लंबे करते हैं , पैर मोड़ते हैं , एक पैर पर खड़े हो जाते हैं , शीर्षासन करते हैं , दौड़ते हैं --- कूदते हैं, आदि । इन सब ऐच्छिक, अनैच्छिक शारीरिक क्रियाओं में आपका मन संलग्न नहीं होता है और मन के राग - द्वेष नहीं होते हैं , इसलिए गीता की भाषा में यह क्रियाऐ कर्म नहीं कहलाती है।* क्रमश: ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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